कथक यानी कथा कहे सो कथक! यही तथ्य कथक नृत्य की प्राचीनता के इतिहास को पूर्णता से दर्शाता है। इतिहास में इन्हें विभिन्न नामों से जैसे नट, ग्रंथिक, कुशीलव, चारण, भाट, धवला आदि के नामों से जाना गया।
इसी के क्रमिक उत्तरोत्तर विकास में कथावाचन एक कला के रूप में विकसित और स्थापित हुआ। इस विशिष्ट कला के हेतु कथक का अलग वर्ग विकसित हुआ। समय और घटनाक्रम के साथ चलते हुए यह कला कथक के रूप में समाज के सरोकारों के साथ विकसित होती चली गई। कथक सिर्फ धार्मिक और मिथकीय आख्यानों तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि आज के सामाजिक प्रसंगों से भी जुड़ा है। इसके साथ नवाचारों ने भी कथक को एक नया और स्वीकार्य रूप दिया है।
समीक्षित पुस्तक कथक नृत्य और कला समीक्षक की वर्षोंपर्यंत साधना का पुस्तकीय रूप है। सही अर्थों में, विशिष्ट ज्ञान और अनुभव से अनुप्राणित व्यक्ति जब पुस्तक को मूर्त रूप देता है, तो वैशिष्ट्य का आना स्वाभाविक ही है। कथक नृत्य, कला-समीक्षा और कलाओं के अंतः संबंधों पर लेखन और अनेक प्रकार से जुड़ी हुई लेखिका ने प्रस्तुत पुस्तक में कथक के शीर्ष व्यक्तित्व पंडित बिरजू महाराज तथा सितारा देवी से लेकर आज तक के सक्रिय समकालीन अनेक पुरुष एवं स्त्री कथक नृत्यकारों और कला समीक्षकों के समकालीन व्यक्तित्वों से बातचीत को एक जीवंत साक्षात्कार के रूप में सम्मिलित किया है।
पुस्तकों में एक रोचक जानकारी यह है कि कथक गुरुओं के नाम से पहले 'महाराज' उपाधि लगाने की परंपरा ब्रिटेन की महारानी के भारत में आगमन और कोलकाता दरबार में पंडित बिंदादीन द्वारा कथक नृत्य की नयनाभिराम प्रस्तुति के बाद शुरू हुई। महारानी उनकी प्रस्तुति से मोहित हो गईं, और तब पंडित बिंदादीन को 'महाराज' की उपाधि दी गई। पाठक एक कथक संसार की यात्रा पर निकलता है। कथक की परिभाषा से लेकर कथक की समीचीन संदर्भों और स्थिति तक कई सोपानों और कौतूहलपूर्ण तथ्यों से अवगत होता है।
यह पुस्तक कथक के पूर्वजों, पुरोधाओं, पुजारियों, नृत्यकारों और कला समीक्षकों के परिचय और साक्षात्कारों से सराबोर है। यह पुस्तक संपादन कला का भी एक श्रमसाध्य नज़ीर है। तिस पर भी, पुस्तक में पद्मश्री डॉक्टर उमा शर्मा, जो कथक की सशक्त साक्षात्कार हैं और खुशवंत सिंह जैसी विभूति की पैनी कलम में रहीं, उनका साक्षात्कार पुस्तक को एक अनुपम आयाम देता है और पाठकों को कथक के और पास लाने में निःसंदेह एक पुल साबित होता है।
पुस्तक : कथक का सौंदर्य गुरुमुख से लेखिका : चित्रा शर्मा प्रकाशक : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत पृष्ठ : 200 मूल्य : रु. 280.
