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लीटर या गैलन नहीं, हमेशा 'बैरल' में ही क्यों नापा जाता है कच्चा तेल? पढ़िए 160 साल पुरानी वह ऐतिहासिक कहानी जिसने तय किया दुनिया का पैमाना

Barrel History : हर दिन सुबह उठकर जब हम अखबार पढ़ते हैं या टीवी देखते हैं, तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार की खबरों में एक वाक्य जरूर सुनने को मिलता है कि कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में इतने डॉलर प्रति बैरल का उछाल आया या क्रूड ऑयल इतने डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है।

जब हम अपनी कार या बाइक लेकर पेट्रोल पंप पर जाते हैं, तो वहां पेट्रोल या डीजल लीटर में नाप कर हमारी गाड़ी में डाला जाता है। आपके घर में आने वाला दूध लीटर में आता है, पानी की बोतल लीटर में आती है, यहां तक कि दुनिया भर में तरल पदार्थों को नापने की सबसे लोकप्रिय इकाई लीटर या गैलन ही है।

लेकिन, जब बात उस 'काले सोने' की आती है जिस पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था टिकी है, तो पैमाना अचानक बदल जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का व्यापार कभी लीटर, गैलन या किलो में नहीं होता; यह हमेशा 'बैरल' (Barrel) में ही नापा और बेचा जाता है।

आखिर यह 'बैरल' है क्या?

दुनिया के सबसे आधुनिक और हाई-टेक ऊर्जा बाजार में आज भी इस पुरानी इकाई का इस्तेमाल क्यों हो रहा है? इसकी कहानी 160 साल से भी ज्यादा पुरानी है। यह कहानी शुरू होती है अमेरिका के दलदली रास्तों, शराब के खाली ड्रमों और 15वीं सदी के एक ब्रिटिश राजा के अजीबोगरीब फरमान से। आइए, इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं कच्चे तेल को बैरल में नापने की पूरी कहानी।

पेंसिल्वेनिया का 'ऑयल रश' और खाली ड्रमों की तलाश

 कच्चे तेल के आधुनिक इतिहास और इस 'बैरल' की कहानी की शुरुआत 27 अगस्त 1859 को अमेरिका के पेंसिल्वेनिया राज्य के टाइटसविले (Titusville) नाम के एक छोटे से कस्बे से हुई। यहीं पर कर्नल एडविन ड्रेक (Edwin Drake) ने दुनिया का पहला व्यावसायिक तेल कुआं सफलतापूर्वक खोदा था। ड्रेक के कुएं से जैसे ही 'काला सोना' उबलकर बाहर आना शुरू हुआ, अमेरिका में 'ऑयल रश' (Oil Rush) मच गया। लोग रातों-रात अमीर बनने के सपने लेकर पेंसिल्वेनिया की तरफ दौड़ पड़े। हर तरफ कुएं खोदे जाने लगे और बेतहाशा तेल निकलने लगा।

लेकिन, जल्द ही इन तेल उत्पादकों के सामने एक बहुत बड़ी और व्यावहारिक समस्या आ खड़ी हुई। तेल तो जमीन से निकल रहा था, लेकिन उसे स्टोर करने और मीलों दूर रिफाइनरी तक पहुंचाने के लिए कोई बर्तन नहीं था। उस जमाने में आज की तरह लोहे के विशालकाय स्टोरेज टैंक, स्टील के कंटेनर या हजारों किलोमीटर लंबी अंडरग्राउंड पाइपलाइन नहीं हुआ करती थीं।

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ऐसे में वहां के लोगों और तेल व्यापारियों ने तेल भरने के लिए हर उस चीज का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया जो उनके हाथ लगी। शुरुआत में शराब (व्हिस्की), बीयर, खाने का तेल, सिरका, नमक और मछलियां रखने वाले लकड़ी के ड्रमों (जिन्हें अंग्रेजी में बैरल कहा जाता है) को खाली करके उनमें कच्चा तेल भरा जाने लगा। स्थिति यह हो गई कि पेंसिल्वेनिया में लकड़ी के ड्रम बनाने वाले कारीगरों (Coopers) की मांग आसमान छूने लगी।

कई बार तो एक खाली लकड़ी के बैरल की कीमत, उसके अंदर भरे कच्चे तेल की कीमत से भी ज्यादा हो जाती थी! घोड़ा-गाड़ियों, खच्चरों और छोटी नावों के जरिये इन्हीं लकड़ी के ड्रमों में भरकर तेल को रिफाइनरियों और बाजारों तक पहुंचाया जाने लगा।

अलग-अलग आकार के ड्रम और धोखाधड़ी का माहौल

चूंकि ये लकड़ी के ड्रम अलग-अलग चीजों (जैसे शराब, मछली, बीयर) को रखने के लिए बनाए गए थे, इसलिए इनका आकार भी एक समान नहीं था। कोई ड्रम 30 गैलन (Gallon) का होता था, कोई 40 गैलन का, कोई 42 का तो कोई 50 गैलन तक का विशाल ड्रम होता था।

जैसे-जैसे कच्चे तेल का व्यापार बढ़ा, इन अलग-अलग आकार के ड्रमों ने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया। खरीददारों को हमेशा यह शिकायत रहने लगी कि उन्हें पैसे ज्यादा देने पड़ रहे हैं लेकिन तेल कम मिल रहा है। कोई व्यापारी 40 गैलन का ड्रम बेचता था और कोई 45 गैलन का, लेकिन कीमत अक्सर एक जैसी मांग ली जाती थी। बाजार में अविश्वास और धोखाधड़ी का माहौल बन गया। खरीदार और विक्रेता अक्सर इस बात पर झगड़ते रहते थे कि एक 'बैरल' में आखिर कितना तेल होना चाहिए। तेल उद्योग के लिए यह स्पष्ट हो गया कि अगर उन्हें इस व्यापार को पूरे देश और दुनिया में फैलाना है, तो उन्हें तेल नापने का एक फिक्स और सर्वमान्य स्टैंडर्ड (मानक) तय करना ही होगा।

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अगस्त 1866 की वह ऐतिहासिक बैठक

इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म करने और बाजार में पारदर्शिता लाने के लिए, अगस्त 1866 में अमेरिका के कुछ सबसे बड़े और स्वतंत्र तेल उत्पादकों ने पेंसिल्वेनिया के टाइटसविले में ही एक अहम बैठक बुलाई। इस बैठक का एकमात्र एजेंडा था- कच्चे तेल की नाप-तौल का एक ऐसा मानक तय करना, जिसे पूरा बाजार मान सके।

काफी बहस और चर्चा के बाद उत्पादकों ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया। उन्होंने घोषणा की कि कच्चे तेल के हर गैलन के लिए जो कीमत तय होगी, हम उसी कीमत पर तेल बेचेंगे, लेकिन हम कच्चे तेल को गैलन के हिसाब से बेचने की प्रथा को खत्म कर रहे हैं। आज से कच्चे तेल का व्यापार केवल 'बैरल' के हिसाब से होगा और एक बैरल का मतलब 42 गैलन (42 Gallons) तय किया जाता है।

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आखिर 42 गैलन का ही मानक क्यों चुना गया ?

अब सबसे दिलचस्प सवाल यह उठता है कि इन तेल उत्पादकों ने 40, 45 या 50 गैलन की बजाय बिल्कुल '42 गैलन' के ड्रम को ही स्टैंडर्ड क्यों बनाया? इसके पीछे 15वीं सदी के इंग्लैंड का एक ऐतिहासिक कानून छिपा हुआ है।

दरअसल, इंग्लैंड के राजा एडवर्ड चतुर्थ (King Edward IV) ने सन 1482 में एक फरमान जारी किया था। उस समय इंग्लैंड में हेरिंग (Herring) नाम की मछली का बहुत बड़ा व्यापार होता था। राजा एडवर्ड ने धोखाधड़ी रोकने के लिए आदेश दिया था कि मछलियों को पैक करने वाले लकड़ी के हर बैरल का आकार फिक्स होना चाहिए और उसमें बिल्कुल 42 गैलन मछलियां ही आनी चाहिए। धीरे-धीरे यही 42 गैलन का लकड़ी का बैरल पूरे यूरोप और अमेरिका में वाइन (Wine), साबुन, मक्खन और अन्य चीजों को नापने और ट्रांसपोर्ट करने का एक भरोसेमंद पैमाना बन गया।

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पेंसिल्वेनिया के तेल उत्पादकों ने देखा कि 42 गैलन का लकड़ी का ड्रम बहुत ही व्यावहारिक था। यह न तो इतना छोटा था कि ट्रांसपोर्टेशन महंगा पड़े और न ही इतना बड़ा कि इसे घोड़ा-गाड़ी या रेलवे वैगन पर चढ़ाने-उतारने में मजदूरों को परेशानी हो।

42 गैलन के इस ड्रम का वजन (तेल भरने के बाद) करीब 136 से 140 किलो के आसपास होता था, जिसे दो मजबूत मजदूर आसानी से रोल करके (लुढ़का कर) गाड़ी पर चढ़ा सकते थे। साथ ही, उस समय की नावों और रेलवे की मालगाड़ियों में ये ड्रम बहुत अच्छी तरह से फिट बैठते थे। इसी ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारण से 42 गैलन वाले ड्रम को कच्चे तेल का आधिकारिक 'बैरल' मान लिया गया।

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40+2 का रोचक गणित: 2 गैलन की अतिरिक्त छूट

1866 की उस बैठक में तय किए गए मानक का एक और बेहद रोचक पहलू था। उस समय पेंसिल्वेनिया की सड़कें बहुत कच्ची, पथरीली और दलदली हुआ करती थीं। जब लकड़ी के ड्रमों को घोड़ा-गाड़ियों में लादकर मीलों दूर ले जाया जाता था, तो झटके लगने से अक्सर लकड़ी के जोड़ों में से थोड़ा बहुत तेल रिस जाता था या गर्मी के कारण भाप बनकर उड़ जाता था।

खरीददारों को इस लीकेज का नुकसान न उठाना पड़े, इसलिए तेल उत्पादकों ने एक समझदारी भरा फैसला लिया। उन्होंने ग्राहकों से पैसे तो 40 गैलन तेल के ही लिए, लेकिन उन्हें जो ड्रम (बैरल) दिया गया, उसमें 42 गैलन तेल भरा जाता था। यानी 2 गैलन (करीब 7.5 लीटर) तेल बिल्कुल मुफ्त या 'अतिरिक्त छूट' के तौर पर दिया जाता था, ताकि सफर में छलकने या रिसने से होने वाले नुकसान की पूरी भरपाई हो सके और ग्राहक को रिफाइनरी पहुंचने पर पूरा 40 गैलन तेल मिल जाए। यही नियम आगे चलकर एक पक्की परंपरा बन गया।

स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी और 'bbl' (ब्लू बैरल) की कहानी

1866 में मानक तय होने के कुछ ही साल बाद, जॉन डी. रॉकफेलर (John D. Rockefeller) ने 1870 में 'स्टैंडर्ड ऑयल' (Standard Oil) नाम की कंपनी बनाई, जिसने देखते ही देखते अमेरिका के पूरे तेल उद्योग पर एकाधिकार जमा लिया। रॉकफेलर ने 42 गैलन के इस मानक बैरल को पूरी सख्ती से लागू किया।

अपनी कंपनी के बैरल को दूसरों से अलग दिखाने के लिए स्टैंडर्ड ऑयल ने अपने लकड़ी के ड्रमों को नीले रंग (Blue color) से पेंट करना शुरू कर दिया। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आज भी जब कच्चे तेल की मात्रा लिखी जाती है, तो उसे 'bbl' (जैसे- 100 bbls) लिखा जाता है। कई इतिहासकारों का मानना है कि यह 'bbl' स्टैंडर्ड ऑयल के इसी नीले रंग के ड्रम यानी 'Blue Barrel' का संक्षिप्त रूप है। 1872 में अमेरिका के पेट्रोलियम प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ने भी 42 गैलन के इस बैरल को आधिकारिक तौर पर अपना लिया।

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आधुनिक दौर : बैरल गायब, पैमाना कायम

आज की तारीख में अगर आप दुनिया की किसी भी रिफाइनरी या तेल बंदरगाह पर जाएं, तो आपको कच्चे तेल से भरा लकड़ी का एक भी बैरल दिखाई नहीं देगा। 19वीं सदी के अंत तक ही लकड़ी के ड्रमों की जगह स्टील के बड़े टैंकों, अंडरग्राउंड पाइपलाइनों और समुद्र में तैरते विशालकाय सुपरटैंकरों ने ले ली थी। आज कच्चे तेल का एक सुपरटैंकर एक बार में 20 लाख बैरल से ज्यादा तेल ले जा सकता है।

लकड़ी के ड्रम यानी भौतिक रूप से 'बैरल' भले ही आज इतिहास का हिस्सा बन गए हों, लेकिन कच्चे तेल को नापने की, व्यापार करने की और कीमतें तय करने की इकाई आज भी वही 42 गैलन का 'बैरल' ही है। आज के मीट्रिक सिस्टम के हिसाब से एक गैलन में 3.785 लीटर होते हैं, इस प्रकार एक मानक बैरल (42 गैलन) में 158.98 लीटर (मोटे तौर पर 159 लीटर) कच्चा तेल होता है। दुनिया का कोई भी देश जब कच्चा तेल खरीदता या बेचता है, तो उसका बिल इसी 159 लीटर वाले आभासी 'बैरल' के हिसाब से बनता है।

एक बैरल 'काले सोने' का पूरा पोस्टमार्टम (क्या-क्या निकलता है?)

एक मानक बैरल (जिससे 170 लीटर उत्पाद बनते हैं) को जब रिफाइन किया जाता है, तो उससे मुख्य रूप से निम्नलिखित चीजें प्राप्त होती हैं :

पेट्रोल (Gasoline) :एक बैरल का सबसे बड़ा हिस्सा पेट्रोल के रूप में निकलता है। कुल उत्पाद का करीब 45 से 46 प्रतिशत (लगभग 73 से 75 लीटर) हिस्सा पेट्रोल होता है, जो हमारी कारों और बाइकों को दौड़ाता है।

डीजल (Diesel/Distillate fuel oil) : दूसरे नंबर पर डीजल का उत्पादन होता है। एक बैरल से करीब 25 से 26 प्रतिशत (लगभग 40 से 42 लीटर) डीजल निकलता है। यही डीजल देश के ट्रकों, बसों, ट्रैक्टरों और रेलवे के इंजनों की जीवनरेखा है।

विमान ईंधन (Aviation Turbine Fuel - ATF) : हवाई जहाजों को उड़ाने के लिए इस्तेमाल होने वाला हाई-ग्रेड फ्यूल यानी एटीएफ एक बैरल से करीब 9 से 10 प्रतिशत (लगभग 15 से 16 लीटर) निकलता है।

भारी ईंधन तेल (Heavy Fuel Oil) : यह करीब 3 से 4 प्रतिशत (लगभग 6 लीटर) निकलता है। इसका इस्तेमाल पानी के बड़े जहाजों (कार्गो शिप) और बड़ी फैक्ट्रियों की भट्टियों को चलाने में किया जाता है।

एलपीजी और अन्य गैसें (LPG & Natural Gas) : रिफाइनिंग के दौरान सबसे ऊपरी हिस्से से गैसें निकलती हैं। इसमें प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी गैसें होती हैं, जिनसे हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाला एलपीजी सिलेंडर भरता है। यह कुल उत्पाद का करीब 2 से 3 प्रतिशत होता है।

डामर और तारकोल (Asphalt/Bitumen) :रिफाइनिंग के बाद जो सबसे गाढ़ा और भारी मलबा नीचे बच जाता है, उसका इस्तेमाल सड़कें बनाने (डामर) और छतों की वाटरप्रूफिंग के लिए किया जाता है।

पेट्रोकेमिकल्स (लुब्रिकेंट्स, मोम और प्लास्टिक) : कच्चे तेल का एक भी कतरा बेकार नहीं जाता। इससे बचे हुए रसायनों से इंजन ऑयल (लुब्रिकेंट्स), पैराफिन वैक्स (मोमबत्ती), वैसलीन, कॉस्मेटिक्स का सामान, दवाइयां, सिंथेटिक रबर और यहां तक कि प्लास्टिक भी बनाया जाता है।

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आपकी जेब और भारतीय अर्थव्यवस्था से 'बैरल' का सीधा कनेक्शन

अब यह समझना जरूरी है कि सात समंदर पार बनी इस 160 साल पुरानी इकाई का हमारी और आपकी जिंदगी पर क्या असर पड़ता है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन हम अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक विदेशों पर निर्भर हैं। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की खपत का करीब 85 फीसदी हिस्सा खाड़ी देशों, रूस और अमेरिका से आयात करता है। यह सारा आयात इसी 'बैरल' के हिसाब से होता है।

जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव या उत्पादन में कटौती के कारण एक 'बैरल' कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो भारत का आयात बिल (Import Bill) भारी भरकम हो जाता है। इसका सीधा नतीजा यह होता है कि भारत में तेल कंपनियों को पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने पड़ते हैं।

चूंकि हमारे देश में माल ढुलाई (ट्रांसपोर्टेशन) पूरी तरह से ट्रकों यानी डीजल वाहनों पर निर्भर है, इसलिए डीजल महंगा होते ही माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। इसका सीधा असर यह होता है कि खेत से मंडी तक आने वाली सब्जियां, फैक्टरियों से दुकानों तक पहुंचने वाला राशन और रोजमर्रा की हर जरूरत की चीज महंगी हो जाती है। यानी, पेंसिल्वेनिया के जंगलों में जिस 'बैरल' का जन्म हुआ था, आज वह भारत के आम आदमी की रसोई का बजट और देश की महंगाई तय करता है।

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