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न इंसान, न कैमरा और न सच से वास्ता. 30 मिनट में 'झूठ' तैयार कर रहे 'फेसलेस AI चैनल', जानिए इस 'फेक न्यूज फैक्टरी' की इनसाइड स्टोरी

Faceless AI YouTube Channels : क्या आपने कभी सोचा है कि इंटरनेट और यूट्यूब पर जो शानदार वीडियो, ब्रेकिंग न्यूज या सनसनीखेज खबरें आप रोज देख रहे हैं, उन्हें किसी इंसान या पत्रकार ने नहीं, बल्कि एक मशीन (AI) ने बनाया है?

आज भारत के डिजिटल स्पेस में ‘फेसलेस एआई (Artificial Intelligence) चैनलों’ की बाढ आई हुई है। ये ऐसे चैनल हैं जिनका संचालन कोई इंसान कैमरे के सामने आकर नहीं करता। इनके पास न कोई दफ्तर है, न कोई रिपोर्टर ग्राउंड पर जाता है और न ही खबरों की सत्यता (फैक्ट-चेक) की कोई व्यवस्था है।

चंद एआई टूल्स की मदद से महज आधे घंटे के भीतर फर्जी खबरें और डीपफेक वीडियो तैयार कर यूट्यूब पर धडल्ले से परोसे जा रहे हैं। बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के चल रहा फेक न्यूज का यह मायाजाल न केवल समाज और लोकतंत्र के लिए, बल्कि जमीनी स्तर की असली पत्रकारिता के लिए भी एक बहुत बडा और गंभीर खतरा बन चुका है।

चमकती क्रिएटर इकॉनमी और उसका डार्क साइड

यूट्यूब आज भारत में जानकारी और मनोरंजन का सबसे बडा माध्यम बन चुका है। ‘ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स’ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यूट्यूब के क्रिएटर इकोसिस्टम ने भारत की जीडीपी में 16,000 करोड रुपये से अधिक का भारी-भरकम योगदान दिया है। इतना ही नहीं, इस प्लेटफॉर्म ने देश भर में लगभग 9.3 लाख फुल-टाइम नौकरियों के बराबर रोजगार के अवसर भी पैदा किए हैं। रिपोर्ट बताती है कि यूट्यूब से कमाई करने वाले 63 प्रतिशत क्रिएटर्स के लिए यह उनकी आय का प्राथमिक साधन है।

यूट्यूब के सीईओ नील मोहन के मुताबिक, भारत में करोडों चैनलों ने अपना कंटेंट अपलोड किया है। एक तरफ यह चमकती हुई डिजिटल इकॉनमी है, जो युवाओं को रोजगार दे रही है, लेकिन दूसरी तरफ इसी इकॉनमी की आड में बिना चेहरे वाले एआई चैनलों की एक काली दुनिया भी बेहद तेजी से पनप रही है, जो चंद रुपयों के लालच में भ्रामक और खतरनाक सामग्री फैला रही है।

कैसे काम करता है ‘फेसलेस चैनलों’ का यह सिंडिकेट?

आजकल इंटरनेट पर ऐसे कई ट्यूटोरियल और ऑनलाइन कोर्स बेचे जा रहे हैं, जो युवाओं को ‘यूट्यूब ऑटोमेशन’ के जरिए घर बैठे लाखों कमाने का लालच दे रहे हैं। इन चैनलों पर कंटेंट बनाने की प्रक्रिया अब बेहद आसान, तेज और लगभग मुफ्त हो गई है। इसका एक पूरा सेट पैटर्न है:

स्क्रिप्टिंग : सबसे पहले एआई टूल को कोई भी सनसनीखेज या विवादास्पद विषय (प्रॉम्प्ट) दिया जाता है, जिससे वह कुछ ही सेकंड में एक पूरी स्क्रिप्ट लिख देता है।

आवाज (वॉयसओवर) : इसके बाद इस स्क्रिप्ट को ‘इलेवन लैब्स’ (ElevenLabs) जैसे एआई वॉयस टूल में डाला जाता है, जो इसे बिल्कुल एक पेशेवर न्यूज एंकर या किसी आम इंसान की आवाज में बदल देता है।

दृश्य और संपादन : अंत में एआई टूल्स की मदद से इस आवाज के ऊपर फर्जी तस्वीरें या वीडियो क्लिप लगा दिए जाते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में मात्र 30 मिनट का समय लगता है। आजकल 20 से 22 साल के युवा अपने घर के एक कमरे में लैपटॉप खोलकर एक साथ 10-10 ऐसे चैनल चला रहे हैं और महीने के 40 से 50 हजार रुपये आसानी से कमा रहे हैं। उनका मकसद खबर देना नहीं, बल्कि एल्गोरिदम को चकमा देकर ज्यादा से ज्यादा ‘व्यूज’ और पैसे बटोरना है।

न्यूजगार्ड की चौंकाने वाली रिपोर्ट

इन फेसलेस चैनलों का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि ये भ्रामक जानकारी (Misinformation) फैलाने के सबसे बडे अड्डे बन गए हैं। सूचनाओं की विश्वसनीयता पर काम करने वाली वैश्विक संस्था ‘न्यूजगार्ड’ (NewsGuard) की रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाले आंकडे पेश करती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय इंटरनेट पर सैकडों पूरी तरह से एआई-जनरेटेड न्यूज साइट्स और चैनल काम कर रहे हैं, जिन पर अलग-अलग भाषाओं में बिना किसी इंसानी देखरेख (Human Oversight) के खबरें पब्लिश हो रही हैं। जांच में पाया गया कि टॉप एआई चैटबॉट विवादास्पद विषयों पर कई मामलों में पूरी तरह से गलत जानकारी और फर्जी दावे पेश करते हैं। एआई के गलतियां करने की दर लगातार बढ रही है। इसका सबसे बडा कारण यह है कि एआई मॉडल्स अब किसी सवाल का जवाब देने से मना नहीं करते, बल्कि वे आत्मविश्वास के साथ गलत जवाब दे देते हैं। इन्हीं चैटबॉट्स से कंटेंट उठाकर ये फेसलेस चैनल यूट्यूब पर डाल रहे हैं, जिससे करोडों लोगों तक सरासर झूठ पहुंच रहा है।

डीपफेक का आतंक और दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

फर्जी खबरों के अलावा डीपफेक (Deepfake) इन एआई चैनलों का दूसरा सबसे बडा हथियार है। किसी भी मशहूर चेहरे और आवाज की हूबहू नकल उतारकर ये चैनल रातों-रात कोई भी फर्जी वीडियो वायरल कर देते हैं। भारत में इसके कई गंभीर मामले सामने आ चुके हैं:

रजत शर्मा डीपफेक मामला : यह मामला डीपफेक के दुरुपयोग का एक बडा उदाहरण बनकर उभरा। वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा की शक्ल और आवाज का इस्तेमाल कर यूट्यूब और फेसबुक पर कई फर्जी वीडियो चलाए गए। इन वीडियो में असली दिखने वाले ‘इंडिया टीवी’ के लोगो (Logo) का इस्तेमाल किया गया था और लोगों को फर्जी निवेश योजनाओं में पैसा लगाने की सलाह दी जा रही थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए गूगल को इन चैनलों को हटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने इसे व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों का घोर उल्लंघन माना। इसके साथ ही गूगल को इन चैनलों के मालिकों की जानकारी और कमाई का ब्यौरा भी सौंपने का निर्देश दिया गया।

शहबाज शरीफ का फर्जी वीडियो : भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे कूटनीतिक तनाव के दौरान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का सरेंडर करते हुए एक वीडियो वायरल हो गया। यह वीडियो इतना असली लग रहा था कि होठों की हरकत (लिप-सिंक) एकदम परफेक्ट थी। बाद में फैक्ट चेक में सामने आया कि यह 100 प्रतिशत एआई जनरेटेड डीपफेक था।

एक अन्य अजीबोगरीब मामले में सोते हुए आदमी को सूंघते एक शेर का 15 सेकंड का वीडियो भारत के किसी जंगल का बताकर वायरल किया गया, जबकि वह पूरी तरह से कंप्यूटर और एआई द्वारा बनाया गया था।

सरकार का सख्त एक्शन : ‘आईटी नियम’ और कडी एडवायजरी

डीपफेक और एआई के इस बेकाबू होते खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने अब बेहद सख्त कदम उठाए हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने ‘आईटी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021’ के तहत सोशल मीडिया कंपनियों (यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स आदि) के लिए कडी एडवायजरी जारी की है।

इन नियमों और एडवायजरी ने कंपनियों की जवाबदेही को अभूतपूर्व रूप से कडा कर दिया है। इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

त्वरित कार्रवाई : सरकार या कोर्ट का आदेश मिलने पर कंपनियों को गैर-कानूनी या डीपफेक कंटेंट 36 घंटे के भीतर हटाना होता है। हालांकि, सरकार ने एडवायजरी जारी कर स्पष्ट किया है कि डीपफेक जैसे गंभीर मामलों में यह कार्रवाई तुरंत होनी चाहिए।

अंतरंग तस्वीरों पर तुरंत एक्शन : अगर किसी व्यक्ति (विशेषकर महिलाओं) की गैर-सहमति वाली अंतरंग तस्वीरें (Intimate imagery) या मॉर्फ्ड डीपफेक अपलोड किए जाते हैं, तो प्लेटफॉर्म को शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर उसे हटाना अनिवार्य है।

सिंथेटिक कंटेंट पर लेबल : सरकार ने सोशल मीडिया मध्यस्थों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद एआई निर्मित कंटेंट पर समुचित लेबल लगाएं ताकि दर्शक भ्रमित न हों।

सेफ हार्बर छिनने की चेतावनी : अगर यूट्यूब या कोई अन्य प्लेटफॉर्म इन नियमों का पालन करने में विफल रहता है, तो उसे आईटी एक्ट की ‘धारा 79’ के तहत मिलने वाली कानूनी छूट (Safe Harbour immunity) खोनी पडेगी। इसका मतलब है कि फिर कंपनी के खिलाफ सीधे तौर पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जा सकेगा।

असली पत्रकारिता पर संकट

इन ‘रोबोटिक चैनलों’ ने असली और जमीनी पत्रकारिता के सामने एक बडा आर्थिक और अस्तित्व का संकट खडा कर दिया है। असली पत्रकारिता में एक खबर को पाठकों तक पहुंचाने के लिए रिपोर्टर ग्राउंड पर जाता है, तथ्यों की जांच (क्रॉस-चेकिंग) की जाती है, डेस्क पर संपादन होता है और तब जाकर वह खबर छपती या प्रसारित होती है। इसमें समय, मेहनत और पैसा लगता है। लेकिन एआई चैनल बिना किसी खर्च के दिन में दर्जनों फर्जी खबरें डाल देते हैं, जिन्हें एल्गोरिदम ज्यादा प्रमोट करता है।

इसका सीधा असर मीडिया इंडस्ट्री में काम करने वाले पत्रकारों पर पड रहा है। रोजगार का डेटा जुटाने वाली संस्था ‘चैलेंजर, ग्रे एंड क्रिसमस’ की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर मीडिया इंडस्ट्री में नौकरियों में भारी कटौती देखने को मिली है। इस छंटनी का एक बहुत बडा कारण न्यूजरूम में एआई का बढ़ता दखल और इन फेसलेस चैनलों द्वारा काटा जा रहा विज्ञापन का राजस्व है।

दर्शकों के लिए बचाव का रास्ता : मीडिया साक्षरता की जरूरत

डिजिटल न्यूज रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत समेत कई देशों में लोगों का व्यवहार बदल रहा है। अब लोग खबरें पढ़ने से ज्यादा वीडियो देखना पसंद करते हैं। भारत की विशाल आबादी और अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं के कारण एआई मिसइन्फॉर्मेशन का असर यहां सबसे ज्यादा और खतरनाक हो सकता है।

रिसर्च के मुताबिक, बिना मानवीय हस्तक्षेप के बन रही यह फर्जी सामग्री समाज में अविश्वास, भय और ध्रुवीकरण पैदा कर रही है। कानून और सरकार अपनी जगह काम कर रहे हैं, लेकिन इस डिजिटल युग में आम नागरिक के लिए ‘मीडिया साक्षरता’ (Media Literacy) सबसे बड़ा हथियार है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यूट्यूब या व्हाट्सएप पर कोई भी वीडियो देखते या उसे आगे (फॉरवर्ड) शेयर करते समय दर्शकों को खुद से तीन बुनियादी सवाल जरूर पूछने चाहिए:

  1. क्या इस चैनल पर कोई असली इंसान या पत्रकार कैमरे के सामने आकर बात कर रहा है?

  2. क्या वीडियो में किए जा रहे दावों का कोई पुख्ता सोर्स (जैसे कोई सरकारी दस्तावेज या आधिकारिक बयान) बताया गया है?

  3. क्या इस खबर को किसी प्रमाणित, विश्वसनीय और मुख्यधारा के न्यूज संस्थान (जैसे दैनिक ट्रिब्यून) ने भी कवर किया है ?

अगर इन सवालों का जवाब ‘ना’ है, तो समझ लीजिए कि वह वीडियो केवल आपको भ्रमित कर पैसे कमाने के लिए एआई द्वारा बनाया गया है। ऐसे किसी भी वीडियो पर आंख मूंदकर भरोसा करने से बचना ही आज के समय की सबसे बडी जरूरत है।

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