New PF Rules : नौकरीपेशा वर्ग (Salaried Class) और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक बेहद राहत भरी और बड़ी खबर है। केंद्र सरकार जल्द ही देश भर में नए श्रम कानून (लेबर कोड) लागू करने की तैयारी में है।
इन कानूनों के लागू होने के बाद, नौकरी बदलने, छूटने या निकाले जाने पर कर्मचारियों को अपनी पुरानी कंपनी से ‘फुल एंड फाइनल सेटलमेंट’ (FnF) के लिए हफ्तों या महीनों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
‘वेतन संहिता 2019’ (Code on Wages) के तहत अब कंपनियों को सिर्फ दो वर्किंग डेज (48 घंटे) के भीतर कर्मचारी का एक-एक पैसा चुकता करना अनिवार्य होगा। इन नए कानूनों का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों को बेहतर वित्तीय सुरक्षा देना, कार्यस्थल पर उनके अधिकार सुनिश्चित करना और उद्योग जगत में कामकाज को पारदर्शी बनाना है।
29 पुराने कानूनों की जगह लेंगे 4 नए कोड
अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे और समय के साथ अप्रासंगिक हो चुके 29 अलग-अलग श्रम कानूनों को खत्म करके केंद्र सरकार ने उन्हें 4 नए लेबर कोड्स में समाहित कर दिया है। ये चार कोड हैं- वेतन संहिता (Wage Code), सामाजिक सुरक्षा संहिता (Social Security Code), औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code) और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थल स्थिति संहिता (OSH Code)। इन चारों संहिताओं का मकसद न केवल कर्मचारियों का शोषण रोकना है, बल्कि कंपनियों के लिए भी ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (व्यापार में सुगमता) को बढ़ावा देना है।
खत्म होगा 90 दिन तक का लंबा इंतजार
अब तक कॉर्पोरेट जगत, आईटी, बीपीओ और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में यह अघोषित नियम चलन में था कि इस्तीफा देने या छंटनी के बाद फाइनल सेटलमेंट के लिए 30 से 90 दिन तक का समय लिया जाता था। इस लंबी अवधि के कारण कर्मचारियों को घर का खर्च चलाने और नई जगह नौकरी शुरू करने से पहले भारी मानसिक और आर्थिक तनाव का सामना करना पड़ता था। नए नियमों के तहत धारा 17(2) के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, नौकरी छोड़ने के 48 घंटे के भीतर अंतिम वेतन, लीव इनकैशमेंट, बकाया बोनस और अन्य भत्तों का भुगतान करना अनिवार्य कर दिया गया है।
बेसिक सैलरी 50% होना अनिवार्य, घटेगी टेक-होम सैलरी
नए लेबर कानूनों में सैलरी स्ट्रक्चर (Salary Structure) को लेकर सबसे बड़ा बदलाव किया गया है, जिसका सीधा असर हर कर्मचारी की जेब पर पड़ेगा। वर्तमान में कंपनियां बेसिक सैलरी को कम रखकर भत्तों (Allowances) का हिस्सा बढ़ा देती हैं ताकि पीएफ का अंशदान कम देना पड़े। लेकिन नए ‘50% बेसिक सैलरी रूल’ के तहत किसी भी कर्मचारी की बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ता (DA) उसकी कुल सैलरी (CTC) का कम से कम 50% होना चाहिए। चूंकि पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी की गणना बेसिक सैलरी पर होती है, इसलिए इसके बढ़ने से आपका और कंपनी दोनों का पीएफ योगदान बढ़ेगा। इसका असर यह होगा कि हर महीने हाथ में आने वाली सैलरी (Take-home salary) थोड़ी कम हो जाएगी, लेकिन रिटायरमेंट के समय आपको एक बहुत बड़ा और सुरक्षित फंड मिलेगा।
ग्रेच्युटी और छुट्टियों के नियमों में बड़ी राहत
पहले किसी भी संस्थान में ग्रेच्युटी का हकदार होने के लिए लगातार 5 साल तक काम करना अनिवार्य था। ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता’ ने इस नियम को बदल दिया है। अब फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉइज (FTE) यानी अनुबंध (Contract) पर काम करने वाले कर्मचारियों को 5 साल का इंतजार नहीं करना होगा; 1 साल की सेवा पूरी करने पर ही उन्हें ग्रेच्युटी का लाभ मिल जाएगा। इसके अलावा, काम के घंटों में भी लचीलापन दिया गया है। कंपनियों और कर्मचारियों की सहमति से 48 घंटे प्रति सप्ताह के नियम को 4 दिनों में भी बांटा जा सकता है। यानी दिन में 12 घंटे काम करके हफ्ते में 3 दिन की छुट्टी (4-Day Work Week) ली जा सकेगी। वहीं, ‘अर्जित अवकाश’ (Earned Leaves) पाने के लिए 240 दिन की बजाय अब केवल 180 दिन काम करना ही पर्याप्त होगा।
महिलाओं की सुरक्षा और गिग वर्कर्स को अधिकार
नए कानून में पहली बार ओला, उबर, स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए काम करने वाले ‘गिग वर्कर्स’ और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया गया है। ई-श्रम पोर्टल के जरिए इनके लिए बीमा और पेंशन सुनिश्चित की जाएगी। वहीं, महिलाओं के लिए नाइट शिफ्ट (शाम 7 बजे से सुबह 6 बजे तक) में काम करने के नियमों को अधिक सुरक्षित बनाया गया है। अब नाइट शिफ्ट के लिए महिला कर्मचारी की लिखित सहमति अनिवार्य होगी और उनकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी कंपनी की होगी।
हड़ताल के नियमों में बदलाव और विवाद निपटारा
नए ‘औद्योगिक संबंध संहिता’ के जरिए कर्मचारियों और कंपनियों के बीच होने वाले विवादों को तेजी से निपटाने की व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही हड़ताल के नियमों को सख्त किया गया है। अब किसी भी औद्योगिक इकाई में कर्मचारी बिना 14 दिन का एडवांस नोटिस दिए हड़ताल पर नहीं जा सकेंगे। पहले यह नियम केवल जनोपयोगी सेवाओं (Public Utility Services) पर लागू था।
कब से लागू होंगे नए नियम ?
केंद्र सरकार ने इन चारों लेबर कोड्स को संसद से पारित कर दिया है। चूंकि ‘श्रम’ संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय है, इसलिए केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी इन पर अपने नियम बनाने होते हैं। अधिकांश राज्यों ने अपने ड्राफ्ट नियम प्रकाशित कर दिए हैं। जैसे ही सभी राज्य अपनी प्रक्रिया पूरी कर लेंगे, केंद्र सरकार एक आधिकारिक अधिसूचना जारी कर इन्हें पूरे देश में एक साथ लागू कर देगी।
