पंजाब सरकार ने कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लंबित महंगाई भत्ते (DA) तथा महंगाई राहत (DR) की बकाया राशि का भुगतान दो सप्ताह के भीतर करने के पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
राज्य सरकार का कहना है कि करीब 14,191 करोड़ रुपये की बकाया राशि का इतने कम समय में भुगतान संवैधानिक रूप से संभव नहीं है।
वित्त विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव की ओर से यह विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की गई है। इसमें तीन अगस्त के हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है। अदालत ने राज्य सरकार को पंजाब में कार्यरत अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों पर लागू दरों के अनुसार कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को लंबित डीए-डीआर बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया था।
अनुच्छेद 202 से 206 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी
याचिका में कहा गया कि तय समय सीमा में आदेश का पालन करना केवल मुश्किल नहीं, बल्कि संवैधानिक रूप से असंभव है। संविधान के अनुच्छेद 266(3) के तहत राज्य की संचित निधि से कोई राशि संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अलावा नहीं निकाली जा सकती और इसके लिए अनुच्छेद 202 से 206 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
महंगाई भत्ता देने को अनिवार्य नहीं बनाते
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि भुगतान में चूक होने पर राज्य को छह प्रतिशत साधारण ब्याज देना होगा। साथ ही बकाया चुकाए जाने तक राज्य को ”अनुत्पादक” खर्च करने से रोक दिया था। पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा कि उसके नियम राज्य कर्मचारियों को केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए तय दर पर महंगाई भत्ता देने को अनिवार्य नहीं बनाते हैं।
सरकार ने कहा कि पंजाब सिविल सर्विसेज (संशोधित वेतन) नियम, 2021 में डीए के लिए कोई विशेष सूचकांक, फार्मूला, दर या अवधि निर्धारित नहीं है और इस मामले में फैसला राज्य सरकार के विवेक पर छोड़ा गया है। पंजाब सरकार ने राज्य को ”अनुत्पादक” खर्च करने से रोकने संबंधी हाईकोर्ट के निर्देश को भी चुनौती दी है।
उसका कहना है कि अदालत के समक्ष इस तरह के किसी खर्च का दावा या उसके समर्थन में कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया था। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वह हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करें और डीए तय करने के साथ-साथ बकाया राशि के भुगतान के तरीके तथा समय के निर्धारण संबंध में उसका अधिकार उसे वापस दें।
