हाल ही में कुछ युवाओं की दुखद मौतों के बाद स्त्री आजादी को लेकर नकारात्मक नैरेटिव सामने आये। वहीं, सोशल मीडिया पर कुछ लोग स्त्री-अधिकारों के नाम पर जश्न मनाते नजर आए। यह संवेदनहीनता की अति ही है लैंगिक, जाति या फिर विचारधारा के नाम पर किसी की मृत्यु पर खुशी जताना।
पश्चिम के मापदंड अपनी जगह हैं, पर भारतीय सामाजिक ढांचे में इस प्रवृत्ति का औचित्य क्या है?
फरीदाबाद में राहुल नाम के लड़के ने आत्महत्या कर ली। इससे पहले उसने वीडियो बनाया और कहा कि वह घर के सारे काम करता है, व्यापार भी करता है, फिर भी उसकी पत्नी उसे मारती-पीटती है। दूसरा किस्सा पुणे के केतन का है, कहा गया कि उसकी मंगेतर सिया ने अपने मित्र चेतन की मदद से उसे लोहागढ़ पहाड़ी से धक्का दे दिया। सिया इस रिश्ते से खुश नहीं थी क्योंकि केतन के सिर पर बाल नहीं थे और वह हकलाता भी था। इन दोनों मामलों में युवाओं ने जान गंवाई। इनके घर वालों, परिजनों पर क्या गुजरी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। मगर अफसोस की बात ये है कि इन दोनों की मृत्यु को स्त्री अधिकारों के नाम पर सेलिब्रेट किया गया। कहा गया कि अब तक स्त्रियां सहती रही हैं, मगर अब वे बदला ले रही हैं।
मुस्कान सोनी नाम की दांतों की डाॅक्टर ने तो बाकायदा केतन की मौत का मजाक उड़ाया कि उसके साथ तो ऐसा होना ही था और हा-हा-हा करते वीडियो पोस्ट किया। हालांकि बाद में इस डाॅक्टर ने माफी भी मांगी।
जब हम अधिकारों की बात करते हैं, तो उनका अर्थ हमारे दैनंदिन जीवन की सुविधाओं से जुड़ा होता है। छोटे, बड़े की भावना को खत्म करने की बात होती है। लेकिन मृत्यु पर हंसना, मीम्स बनाना, कहना कि वक्त आ गया है कि अब स्त्रियों को अपने प्रति किए गए हर अपराध का बदला लेना चाहिए, कितना दुखद है। अंग्रेजी की एक बड़ी लेखिका और एक बड़े लेखक ने तो यह तक कहा कि सिया ने केतन को मारा, इसके लिए सिर्फ वह ही नहीं, बल्कि हमारे परिवारों का ढांचा जिम्मेदार है। जहां लड़कियों को कुछ करने की आजादी नहीं। वे न अपनी मर्जी से शादी कर सकती हैं, न देर रात लौट सकती हैं, न शराब पी सकती हैं। ऐसा कहने वाले वे लोग हैं, जो बहुत अच्छी आर्थिक स्थिति वाले हैं। जिनके इर्द-गिर्द सेवकों और सिक्योरिटी गार्ड्स की पूरी फौज है, लेकिन ज्ञान वे उन आम लड़कियों को दे रहे हैं, जो अमूमन अपराध की जद में होती हैं। 'अपनी सुरक्षा अपने हाथ' वाली कहावत इन पर चरितार्थ होती है। फिर देर रात तक पार्टी करना या शराब पीना आम लड़कियों का जीवन नहीं है। और क्या स्त्रियों के लिए शराब पीना इतनी अच्छी बात है। फिर ऐसा क्यों है कि अक्सर महिलाएं अपने घर के आसपास शराब के ठेके खुलने का विरोध करती हैं। शराबबंदी की मांग करती हैं क्योंकि शराब के कारण ही उनके पति तरह-तरह की हिंसा करते हैं। यदि वे पैसे भी कमाएं, तो उनके पैसे शराब पीने के लिए छीन लिए जाते हैं। उन्हें घर से बाहर निकाल दिया जाता है।
गांधी जी जिन्होंने कहा था कि शराब आत्मा का नाश करती है, उनकी इस शिक्षा को भी लोग भूल गए हैं। डाक्टरों की सलाह भी याद नहीं रखते, जो कहते हैं कि शराब पीने से शरीर के तमाम अंगों पर प्रभाव पड़ता है। मानसिक स्वास्थ्य भी खराब होता है। यदि इन लोगों की मानें तो देश में चलने वाले जितने नशा मुक्ति केंद्र हैं, उन्हें बंद कर देना चाहिए।
लेकिन 'माई लाइफ और माई च्वाइस' का विचार एलीट स्त्री-पुरुषों के मन में इतना बसा हुआ है कि वे अपनी शर्तों को दूसरों पर लाद रहे हैं और इन्हें ही दूसरों की च्वाइस बता रहे हैं। वे सिया का बचाव करते हुए उसके घर वालों और हर एक के घर वालों को दोष दे रहे हैं। पश्चिम का उदाहरण बार-बार दिया जा रहा है कि वहां देखो स्त्रियों को कितनी आजादी है। क्या सचमुच!
अपने यहां माता-पिता बच्चों को हमेशा बच्चा मानते हुए, उनकी सुरक्षा की चिंता करते हैं। उनकी पढ़ाई-लिखाई का खर्चा उठाते हैं। पढ़ने के लिए विदेश भेजते है। करोड़ों रुपये का लोन लेते हैं, उसे खुद चुकाते हैं। बच्चों के लिए घर बनाते हैं। यानि कि अपनी उम्र और सारे संसाधन वे बच्चों के लिए लगा देते हैं, जिससे उनका जीवन आसान हो सके। माता-पिता के सारे संसाधन चाहिए, लेकिन जीवन अपनी शर्तों पर जीना है। कौन रोकता है, लेकिन फिर संसाधन भी खुद जुटाइए। माता-पिता की जमीन-जायदाद में भी हिस्सा मत मांगिए। बीमारी-हारी में भी अपनी मदद खुद कीजिए। ड्रीम वैडिंग करना हो, तो खुद पैसे जुटाइए। उनके सम्पर्कों का भी लाभ मत उठाइए।
अधिकार बिना कर्तव्यों के नहीं मिलते। सिर्फ कर्तव्य ही नहीं, अधिकारों की कीमत भी चुकानी पड़ती है। लेकिन आजादी के नाम पर कीमत कोई चुकाना नहीं चाहता। हां मन की बात न हो, तो हत्या की जा सकती है। अतिवादी लोग इसे जायज ठहराने के लिए झंडा बुलंद कर सकते हैं।
विदेश में लोन लेकर पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता इस कर्ज को नहीं चुकाते। विदेशों में कई ऐसे आदमियों से मिली, जिनकी उम्र पचास के पार है, लेकिन अभी तक वे अपनी पढ़ाई के लिए उठाए गए कर्ज को चुका रहे हैं। भारत में तो माता-पिता की हालत ये है कि ताउम्र खटते भी हैं और पिटते भी हैं। बातें बनाते रहिए कि बुजुर्गों के लिए क्या-क्या होना चाहिए।
विमर्शों की नकारात्मकता कितनी है कि जहां मौत का भी जश्न मनाया जाए। जाति, धर्म, लिंग देखकर शोक और खुशी प्रकट की जाए, इससे यही पता चलता है कि हमारा वैचारिक आधार कितना पोला है, जहां हम किसी मरने वाले की जाति या जेंडर देख रहे हैं। उसके राजनीतिक विचारों के आधार पर उसकी मौत की खुशी या दुःख मना रहे हैं। इसका पहली बार अहसास पत्रकार रोहित सरदाना की मौत पर हुआ। जब एक मशहूर इनफ्लुएंसर ने कहा कि यह अकेला क्यों मर गया, इसके बीवी -बच्चे क्यों नहीं मर गए। यह एक तरह से वही हिटलरी विचार है, जिसकी आलोचना करते-करते ऐसे लोग दुबले हुए जाते हैं। यदि बच्चों को अपनी पसंद से विवाह करने दिया जाए तो भी उनका जीवन सुचारु रूप से चलेगा, इसकी क्या गारंटी है। अपनी पसंद से शादी करने के बाद भी इन दिनों कितने मामले ऐसे आते हैं, जहां पत्नी ने पति को मार दिया, पति ने पत्नी को, गर्लफ्रेड ने बॉयफ्रेंड को और बॉयफ्रेंड ने गर्लफ्रेंड को।
चर्चित घटना में भरत तिवारी की मौत के मामले में तो बहुत से नेता भी कूद पड़े और कहने लगे कि उसके वर्ग ने जो किया है, वह तो उन्हें भुगतना ही पड़ेगा।
कोई सवर्ण, कोई दलित, कोई स्त्री, कोई पुरुष, किसी की भी मृत्यु हंसने और आनंद मनाने के लिए कैसे हो सकती है। तमाम सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म्स पर एक से एक नफरती विचारों की होड़ लगी है। सोचते तो ये थे कि तकनीक बढ़ेगी, तो तमाम तरह के नफरत फैलाने वाले विचार अपने आप खत्म हो जाएंगे। लेकिन हुआ इसका उलटा है। नफरत और बदले की भावना की फसल लहलहा रही है। लोग भूल रहे हैं कि नफरत से नफरत उपजती है और बदले से बदला।
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।
