ज्येष्ठ पूर्णिमा सनातन धर्म में आस्था, स्नान, दान और साधना का पावन पर्व माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, चंद्रदेव और शिव की पूजा-अर्चना से मानसिक शांति, सुख-समृद्धि तथा पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
हिन्दू पंचांग के अनुसार, किसी भी हिंदी महीने का समापन पूर्णिमा तिथि को होता है। इस प्रकार, प्रत्येक वर्ष 12 पूर्णिमा तिथियां आती हैं। सनातन धर्म में सभी पूर्णिमा तिथियां अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इस बार ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा का व्रत 30 मई, शनिवार को रखा जायेगा।
पूर्णिमा तिथि का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा तिथि चंद्रदेव की पूजा के लिए सर्वाधिक शुभ होती है। इस दिन चंद्रदेव अपनी पूरी चमक के साथ पूर्ण कलाओं में प्रकट होते हैं, जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यही कारण है कि इस तिथि को प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। विशेष रूप से पूर्णिमा तिथि को भगवान श्रीहरि विष्णु और चंद्रदेव की पूजा-अर्चना करने से सुख-समृद्धि, मानसिक शांति एवं पुण्य-फल की प्राप्ति होती है। जब पूर्णिमा तिथि पुरुषोत्तम मास यानी अधिकमास में पड़ती है, तब इसका धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा का महत्व
सनातन धर्म में ज्येष्ठ पूर्णिमा का बड़ा महत्व होता है। इस दिन से श्रद्धालु गंगाजल लेकर अमरनाथ यात्रा के लिए निकलते हैं। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन सनातन धर्म में भगवान श्रीहरि विष्णु, माता लक्ष्मी, भगवान शिव और चंद्रदेव की पूजा-आराधना करने का विधान है। इससे जीवन में सुख-शांति एवं समृद्धि का न केवल आगमन, बल्कि वास भी होता है। वैसे, इस दिन गंगा स्नान करने का अत्यंत विशेष महत्व होता है, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने से पापों का नाश होता है। साथ ही, इससे मन और जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार भी होता है। इस दिन वट (बड़) वृक्ष की पूजा करने एवं सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने और सुनाने की भी परंपरा है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन अपना ध्यान अधिक से अधिक पूजा-पाठ एवं सात्विक कार्यों में लगाना चाहिए। इस दिन किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए अथवा किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए। वहीं, इस अवसर पर तामसिक खाद्य पदार्थों से सर्वथा दूर रहना चाहिए।
स्नान-दान का महत्व
सनातन धर्म में ज्येष्ठ पूर्णिमा का बहुत महत्व है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा तिथि को गंगा, यमुना, अलकनंदा, नर्मदा, शिप्रा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, जो लोग नदी में स्नान नहीं कर पाते हैं, उन्हें घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए। साथ ही, स्नान करते समय पवित्र नदियों और तीर्थों का ध्यान करना चाहिए। इससे व्यक्ति को उन पवित्र नदियों का पुण्य प्राप्त होता है। शास्त्रों में वर्णन है कि पवित्र गंगा नदी में स्नान करने से न केवल व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि उसके समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, इस दिन दान करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन जरूरतमंद लोगों को उपयोग की जाने वाली वस्तुओं का दान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। शास्त्रों में वर्णन है कि इस दिन यदि पवित्र हृदय एवं निर्मल मन से योग्य लोगों को दान किया जाए तो दानकर्ता के पितरों को मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।
सूर्य-पूजा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा तिथि को दिन की शुरुआत सूर्य-पूजा, आराधना के साथ करनी चाहिए। इस अवसर पर, सूर्यनारायण भगवान को तांबे के लोटे से अर्घ्य देते हुए 'ॐ सूर्याय नम:' मंत्र का जाप करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से श्री सूर्यनारायण भगवान की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन से दुर्भाग्य रूपी अंधकार का नाश होता है।
चंद्र-आराधना का महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा को चंद्रदेव की पूजा-आराधना करने के अनेक लाभ होते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि यदि ज्येष्ठ पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रदेव को अर्घ्य दिया जाए, तो साधक को मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन व्रत रखकर चंद्रदेव की पूजा करने से चंद्र दोषों से मुक्ति मिलती है। यदि कुंडली में चंद्र खराब अवस्था में हो या चंद्र-दशा चल रही हो, तो इस दिन चंद्रदेव की पूजा-आराधना करने से बड़ी राहत मिलती है। वहीं, ज्येष्ठ पूर्णिमा को चंद्रदेव को नमस्कार करने के भी बहुत लाभ होते हैं। इसके अतिरिक्त, ज्येष्ठ पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रदेव की ओर मुख करके आसन पर बैठकर इस चंद्र-मंत्र का जाप करना चाहिए।'
