गिद्ध भले ही डरावने दिखें, लेकिन प्रकृति के सफाईकर्मी और जनस्वास्थ्य के प्रहरी हैं। इनकी घटती संख्या चिंता का विषय है। पिंजौर का जटायु केंद्र इनके संरक्षण की उम्मीद बनकर उभरा है।
गिद्धों को अक्सर एक अशुभ और डरावने पक्षी के रूप में देखा जाता है, जबकि वास्तव में वे प्रकृति के सबसे उपयोगी और आवश्यक जीवों में से एक हैं। ये पक्षी मृत पशुओं के अवशेषों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रकृति में इनका योगदान केवल सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि वे जनस्वास्थ्य की सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। दुर्भाग्यवश, भारत में पिछले कुछ दशकों के दौरान गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आई है, जिसके दूरगामी प्रभाव पर्यावरण और समाज, दोनों पर दिखाई दिए हैं।
गिद्धों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में से एक रोगों के प्रसार को रोकना है। जब कोई पशु मर जाता है, तो उसका शव विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं, विषाणुओं और अन्य रोगजनकों का स्रोत बन सकता है। यदि ऐसे शव लंबे समय तक खुले में पड़े रहें, तो वे मिट्टी, जल और वायु को दूषित कर सकते हैं। गिद्ध इन शवों को बहुत कम समय में खाकर समाप्त कर देते हैं। उनके पाचन तंत्र में मौजूद अत्यधिक अम्लीय रस कई खतरनाक रोगजनकों को नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार वे प्राकृतिक रूप से संक्रमण फैलने की संभावनाओं को कम करते हैं और मानव तथा पशु स्वास्थ्य की रक्षा में योगदान देते हैं।
भारत में 1990 के दशक के बाद गिद्धों की आबादी में 95 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई। वैज्ञानिकों ने पाया कि पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक नामक दवा गिद्धों के लिए घातक सिद्ध हुई। जब गिद्धों की संख्या घटने लगी, तो मृत पशुओं के शव अधिक समय तक खुले में पड़े रहने लगे। इससे आवारा कुत्तों और अन्य मृतभक्षी जीवों के लिए भोजन की उपलब्धता बढ़ी, जिसके परिणामस्वरूप उनकी संख्या में भी वृद्धि हुई। कई अध्ययनों ने संकेत दिया है कि आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी ने रेबीज जैसी बीमारियों के जोखिम को भी बढ़ाया। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि किसी एक प्रजाति की संख्या में कमी किस प्रकार जनस्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकती है।
इस संकट के बीच उत्तर भारत में संरक्षण की एक महत्वपूर्ण पहल हरियाणा के पिंजौर के निकट स्थित जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र है। चंडीगढ़ से इसकी क्षेत्रीय निकटता इसे इस पूरे क्षेत्र के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाती है। यह केंद्र हरियाणा वन एवं वन्यजीव विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी की संयुक्त पहल है। इसकी शुरुआत सितंबर 2001 में गिद्धों की तेजी से घटती संख्या के कारणों को समझने और संरक्षण के प्रयासों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हुई थी। बाद में दक्षिण एशिया गिद्ध पुनर्प्राप्ति योजना की सिफारिशों के अनुरूप इसे संरक्षण-प्रजनन केंद्र के रूप में विकसित किया गया।
पिंजौर का यह केंद्र मुख्य रूप से तीन गंभीर रूप से संकटग्रस्त गिद्ध प्रजातियों-व्हाइट-बैक्ड, लॉन्ग-बिल्ड/इंडियन और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध-के संरक्षण पर काम करता है। यहां सुरक्षित परिस्थितियों में वैज्ञानिक तरीके से प्रजनन कराया जाता है। नवजात और वयस्क पक्षियों की देखभाल के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य और व्यवहार की भी निगरानी की जाती है। केंद्र में क्वारंटीन, अस्पताल, नर्सरी और बड़े एवियरी जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। प्रयोगशाला के माध्यम से पक्षियों के स्वास्थ्य और जैविक नमूनों की भी जांच की जाती है।
जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र का महत्व केवल गिद्धों को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है। केंद्र ने डाइक्लोफेनाक को गिद्धों की मृत्यु और आबादी में गिरावट के प्रमुख कारणों में से एक के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अलावा, यहां वैकल्पिक पशु-औषधियों की सुरक्षा का अध्ययन, गिद्धों की निगरानी और संरक्षण-प्रजनन से संबंधित प्रशिक्षण जैसे कार्य भी किए गए हैं। केंद्र का दीर्घकालिक उद्देश्य सुरक्षित और उपयुक्त क्षेत्रों में कैप्टिव-ब्रेड गिद्धों को पुनः जंगल में स्थापित करने के प्रयासों में योगदान देना है।
गिद्ध पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मृत जीवों के अवशेषों को हटाकर वे प्राकृतिक स्वच्छता व्यवस्था को मजबूत करते हैं और जैविक अपशिष्ट के संचय को रोकते हैं। इससे दुर्गंध, प्रदूषण और रोग फैलाने वाले जीवों की वृद्धि को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। साथ ही, वे पोषक तत्वों के प्राकृतिक चक्र को सुचारु बनाए रखने में भी सहायता करते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ और संतुलित बना रहता है। उनकी उपस्थिति को स्वस्थ पर्यावरण के संकेतकों में से एक माना जा सकता है।
पिंजौर का जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र इस बात का उदाहरण है कि किसी संकटग्रस्त प्रजाति के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक शोध, प्रजनन, स्वास्थ्य देखभाल, निगरानी और जन-जागरूकता को एक साथ कैसे जोड़ा जा सकता है। चंडीगढ़ और आसपास के क्षेत्रों के संदर्भ में यह केंद्र गिद्ध संरक्षण की एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय कड़ी है। यह इस बात की भी याद दिलाता है कि गिद्धों को बचाना केवल जैव-विविधता की रक्षा करना नहीं है, बल्कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि गिद्धों के महत्व को समझा जाए और उनके संरक्षण के लिए प्रभावी प्रयास किए जाएं। सुरक्षित आवास, जागरूकता अभियान और प्रतिबंधित पशु-औषधियों के उपयोग पर नियंत्रण जैसे कदम उनकी संख्या बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। गिद्धों का संरक्षण केवल एक पक्षी प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह जनस्वास्थ्य, पर्यावरणीय सुरक्षा और सतत विकास की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। चित्र : लिप की
