Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story

प्रेम में भगवान का वास

हाभारत के समय भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों के शान्ति-दूत बनकर कौरवों की सभा में पहुंचे। सभा समाप्त होने पर दुर्योधन ने बड़े गर्व से कहा, 'प्रभु! आपके स्वागत के लिए भव्य भोज की व्यवस्था की गई है।

कृपया मेरे साथ चलकर भोजन ग्रहण करें।' श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले, 'दुर्योधन! मैं तुम्हारे यहां भोजन नहीं करूंगा।' दुर्योधन ने आश्चर्य से पूछा, 'ऐसा क्यों?'

भगवान ने शांत स्वर में उत्तर दिया, 'भोजन सामान्यतः तीन कारणों से किया जाता है-भूख, भय या प्रेम। मुझे न तो भूख सताती है, न मैं किसी से भयभीत हूं, और जहां प्रेम का अभाव हो, वहां भोजन का कोई अर्थ नहीं। तुम्हारे निमंत्रण में आदर है, वैभव है, पर निष्कलुष प्रेम नहीं। इसलिए मैं तुम्हारा भोजन स्वीकार नहीं कर सकता।'

इसके बाद श्रीकृष्ण बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के विदुर के घर पहुंचे। विदुरानी प्रभु के आगमन से इतनी भाव-विभोर हो गईं कि प्रेम में डूबकर केले के छिलके ही उन्हें परोसने लगीं। भगवान ने उन छिलकों को भी प्रेमपूर्वक स्वीकार कर लिया, क्योंकि उनमें सच्ची श्रद्धा और निष्कपट भक्ति का मधुर स्वाद समाया था। ईश्वर को धन, वैभव और दिखावा नहीं, बल्कि सच्चा प्रेम, निष्कपट भावना और निर्मल भक्ति प्रिय होती है। जहां प्रेम होता है, वहीं भगवान का वास्तविक निवास होता है।

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Dainik Tribune Hindi