साइटिक नामक नस कमर से निकलकर कूल्हों, टांगों, पिंडलियों और पैरों तक जाती है जिसके दबने पर उसमें सूजन-जलन व असहनीय दर्द होने लगता है। जिसे साइटिका का दर्द कहते हैं। इसकी प्रमुख वजहों में गलत पॉश्चर, लंबे समय तक बैठना और डिस्क की समस्या शामिल है।
समय पर जांच, दवाओं, फिजियोथेरेपी तथा आयुर्वेदिक उपायों से इसमें राहत मिल सकती है। इसी के बारे में दिल्ली स्थित कंसल्टेंट फिजीशियन डॉ. जे रावत तथा आयुर्वेदिक एक्सपर्ट डॉ. संजना शर्मा से रजनी अरोड़ा की बातचीत।
साइटिका कोई गंभीर बीमारी नहीं, बल्कि साइटिक नर्व पर दबाव या जलन होने के कारण अलग तरह का कमर दर्द होने की स्थिति है। साइटिका व्यक्ति की रोजमर्रा की गतिविधियों को भी प्रभावित करता है। लेकिन सही समय पर जांच और उपचार से अधिकांश मरीजों में सुधार संभव है। नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर अधिकांश लोग सामान्य जीवन जी सकते हैं।
असल में हमारी रीढ़ की हड्डी कई छोटी-छोटी कशेरूकाओं या मनकों से बनी होती है। कमर के हिस्से में एल-4, एल-5, एस-1, एस-2, एस-3 जैसे मनके होते हैं। इन मनकों के बीच एक नरम डिस्क और बहुत पतली नसें होती हैं, जो झटकों से बचाने का काम करती है। साथ ही इनके बीच से बहुत पतली नसें निकलती हैं, जो आगे जाकर आपस में मिल जाती हैं और साइटिक नर्व बनाती हैं। शरीर की सबसे बड़ी और सबसे लंबी नस साइटिका कमर से निकलकर कूल्हों, जांघों, पिंडलियों और पैरों तक जाती है। कई कारणों से साइटिका नस के दबने पर उसमें सूजन-जलन के साथ असहनीय दर्द होने लगता है।
वातजन्य रोग
आयुर्वेद में साइटिका को गृध्रसी रोग कहा जाता है और इसे वातजन्य रोगों की श्रेणी में रखा गया है। जिन लोगों के शरीर में वात यानी वायु अधिक बनती है या जिनकी नसें और मांसपेशियां कमजोर होती हैं,उन्हें साइटिका और कमर दर्द की समस्या ज्यादा होती है। यह समस्या मुख्य रूप से बढ़े हुए वात दोष और दूषित कफ दोष के कारण उत्पन्न होती है। शरीर में वात दोष बढ़ने के कारण रीढ़ की नसें कमजोर होने लगती हैं, उनमें ऐंठन या दवाब बढ़ जाता है और गृध्रसी रोग उत्पन्न होता है। शरीर में बढ़ा हुआ वात डिस्क के अंदर मौजूद छल्लों के बीच के फ्लूड को सुखा देता है। यह फ्लूड लगभग 80 प्रतिशत पानी और 20 प्रतिशत प्रोटीन व कैल्शियम से बना होता है। फ्लूड सूखने के कारण छल्ले आपस में टकराने लगते हैं। उनके बीच की जगह खत्म हो जाती है और किसी न किसी नस पर दबाव पड़ने लगता है। जब नस दबती है, तो पूरी टांग में दर्द शुरू हो जाता है।
ये होते हैं लक्षण
साइटिका दर्द कमर से शुरू होकर एक पैर तक जाता है। पैरों में कमजोरी, झनझनाहट या सुन्नपन भी महसूस होती है। बैठने पर टांगों में सुन्नपन आने लगता है। लेटने पर दर्द ज्यादा महसूस होता है। जब व्यक्ति चलता है, तो शरीर गर्म होने लगता है और धीरे-धीरे साइटिका का दर्द कम होने लगता है। पैर में कमजोरी महसूस होना।
डॉक्टर से कब मिलें
जब दोनों पैरों में कमजोरी आने लगे। पेशाब आदि पर नियंत्रण कम हो जाए। दर्द लगातार बढ़ता जाए। पैर सुन्न होने लगें। चलने में कठिनाई हो। चोट लगने के बाद कमर से पैर तक तेज दर्द शुरू हो तो डाक्टरी परामर्श लेना चाहिये।
ऐसे होती है जांच
डॉक्टर सबसे पहले शारीरिक परीक्षण करते हैं। नस या डिस्क की स्थिति देखने के लिए एक्स-रे, एमआरआई, नर्व कंडक्शन टेस्ट किए जाते हैं।
दर्द की वजहेंं
साइटिका के होने वाले दर्द की प्रमुख वजहें ये हैं : रीढ़ की हड्डी में उम्र के साथ होने वाले बदलाव, वजन ज्यादा होना, बहुत ज्यादा एक्सरसाइज करना या फिर शारीरिक गतिविधियां या व्यायाम बिल्कुल न करना, बहुत देर तक खड़ा रहना या लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना, भारी वजन उठाने, गिरने या कमर में चोट की वजह से डिस्क का खिसकना या डिस्क का अपनी सीध से बाहर निकल जाना, डिस्क दबने से मनकों के बीच का गैप कम हो जाना या ज्यादा बढ़ जाना, वात बढ़ाने वाले आहार (जैसे-बीन्स, अंकुरित अनाज, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ, सूखा और ठंडा भोजन,या फिर कड़वे और कसैले रस वाले पदार्थ) का सेवन अधिक करना।
उपचार की प्रक्रिया
मरीज की स्थिति के हिसाब से दर्द और सूजन कम करने वाली दवाइयां दी जाती हैं। गंभीर मामलों में इंजेक्शन या सर्जरी भी करनी पड़ सकती है। मरीज को फिजियोथेरेपी,स्ट्रेचिंग, रीढ़ की हड्डी और पीठ की मांसपेशियों की मजबूती के लिए एक्सरसाइज कराई जाती हैं। उसे लंबे समय तक एक जगह बैठ कर काम न करने, उठने-बैठने, चलने-फिरने में सही पॉश्चर अपनाने, भारी वजन न उठाने, वजन नियंत्रित करने के लिए एक्टिव रहने और क्षमतानुसार दिन में कम से कम 30 मिनट एक्सरसाइज करने की सलाह दी जाती है।
मददगार है आयुर्वेद
आयुर्वेद के हिसाब से साइटिका दर्द के निवारण हेतु शरीर से अतिरिक्त वात को बाहर निकालना जरूरी है। इसके लिए कुछ असरदार उपाय भी बताए गए हैं :-
* मेथी दाना : रोजाना एक चम्म्च मेथी के दानों (रात को भिगोए या लड्डू बनाकर) का सेवन करें। मेथी दाने वात दोष को संतुलित करने में मदद करते हैं, नसों को मजबूती देते हैं और कमर दर्द, साइटिका व जोड़ों के दर्द में आराम पहुंचाते हैं।
* मेथी के लड्डू : मेथी दानों और कच्ची हल्दी (थोड़े-से दूध में भिगोए और दरदरे पिसे), सूखे मेवे, गोंद, सोंठ, काली मिर्च, जीरा, इलायची, दालचीनी, जायफल (भुने-पिसे) और घी में भुने आटे में गुड़ की चाशनी मिलाकर लड्डू बना लें। सुबह खाली पेट मेथी के लड्डू का सेवन बहुुत फायदेमंद है। आयुर्वेद में वात को संतुलित करने की श्रेष्ठ औषधि मानी गई है।
* लहसुन वाला दूध : कुचले लहसुन की कलियों को दूध में उबालें और गुनगुना होने पर थोड़ा शहद मिलाकर पिएं। रोज रात सोने से 1 घंटा पहले कम से कम 20 दिन तक पिएं। लहसुन में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो साइटिका नर्व की सूजन को कम करते हैं।
* शिलाजीत दूध : लिक्विड शिलाजीत की 3-4 बूंदें दूध में मिलाकर 15 दिन तक पिएं। शिलाजीत हड्डियों और नसों को मजबूत करता है।
* हल्दी पानी : सुबह खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी में आधा चम्मच घर की पिसी हल्दी मिलाकर धीरे-धीरे छोटे-छोटे घूंट लेकर पिएं।
* मसाला काढ़ा : बड़ी इलायची, दालचीनी, लौंग,गुड़ से बना काढ़ा वात और कफ दोष को संतुलित करता है। हड्डियों को मजबूत करता है और नसों को खोलता है। खाली पेट सेवन करना फायदेमंद है।
* उड़द-नारियल-गुड़ के लड्डू : भीगी-दरदरी पिसी उड़द दाल को भून लें। कद्दूकस किया हुआ सूखा नारियल, इलायची पाउडर, पिसा गुड़ मिलाकर लड्डू बनाएं। खाली पेट या दिन में 1-2 लड्डू खाएं। उड़द की दाल नसों और मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करने में मददगार है। सूखा नारियल हड्डियों और जोड़ों के लिए बेहद लाभकारी है।
* तिल-गुड़ के लड्डू : भुने और दरदरे पिसे तिल और कद्दूकस किए गुड़ में थोड़ा-सा पकाकर बने लड्डू वात संतुलन के लिए बहुत लाभकारी हैं।
* हल्दी और तिल के तेल की मालिश : हल्दी को सुखाकर पीस लें। एक चम्मच हल्दी पाउडर और 1 चम्मच तिल का तेल मिलाकर पेस्ट बनाएं और दर्द वाली जगह पर हल्के हाथ से दिन में दो बार मालिश करें। हल्दी नसों की मरम्मत में मदद करती है।
*लहसुन और ऑलिव ऑयल : कांच की बोतल में दरदरी पिसी लहसुन की कलियों को आॅलिव आॅयल में मिलाकर 15 दिन तक अंधेरी जगह रखें। रोज रात सोने से पहले तैयार तेल से कमर, कूल्हे और पैर में हल्की मालिश करें।
रखें ध्यान
साइटिका दर्द से बचने के लिए इन बातों का ध्यान रखना फायदेमंद है-रोज व्यायाम करें। सही पॉश्चर में बैठें। एक जगह देर तक न बैठें या खड़े न रहें। शरीर में पानी की कमी न होने दें। यथासंभव वातवर्द्धक खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज करें जैसे- दही, फूलगोभी, भिंडी, उड़द दाल,ठंडी, तली-भुनी और मसालेदार चीजें, खट्टी चीजें।
