सन् 1847 में वियना के एक अस्पताल में डॉ. इग्नाज़ सेमेल्वाइस कार्यरत थे। उन्होंने एक विचित्र बात पर ध्यान दिया। जिस प्रसूति वार्ड में डॉक्टर प्रसव कराते थे, वहां माताओं की मृत्यु दर दूसरे वार्ड की तुलना में कहीं अधिक थी, जहां दाइयां प्रसव कराती थीं।
उन्होंने कई महीनों तक कारण खोजा। अंततः उन्होंने देखा कि डॉक्टर शव-परीक्षण करने के तुरंत बाद बिना हाथ अच्छी तरह साफ किए प्रसूति कक्ष में चले जाते थे। सेमेल्वाइस ने सभी डॉक्टरों के लिए क्लोरीन मिले घोल से हाथ धोना अनिवार्य कर दिया। कुछ ही महीनों में मृत्यु दर नाटकीय रूप से घट गई।
उन्हें लगा कि अब सब लोग इस व्यवस्था को अपनाएंगे। लेकिन वरिष्ठ चिकित्सकों ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया। सेमेल्वाइस के पास आंकड़े थे, परिणाम थे, फिर भी उन्हें स्वीकार नहीं किया गया। उन्होंने अपना काम जारी रखा।
वर्षों बाद विज्ञान ने सिद्ध किया कि वे सही थे। रोगाणुओं के सिद्धांत के विकसित होने पर दुनिया ने समझा कि हाथ धोना केवल सफाई नहीं, जीवन बचाने का उपाय है। आज अस्पतालों में हाथ धोना सामान्य नियम है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस साधारण आदत के पीछे एक ऐसे चिकित्सक का संघर्ष छिपा है।
