अब आए दिन देश के प्रिंट मीडिया से लेकर अन्य सूचना माध्यमों में यौन अपराधों की विचलित करने वाली घटनाएं सुर्खियों में रहती हैं। यौन लिप्साओं का यह विस्फोट विचलित करने वाला है। कोई निर्भया, किसी के साहस के बूते अपने साथ हुए अन्याय को उजागर कर देती है, वहीं देश की अनेक निर्भयाएं यौन हिंसा व क्रूरता के बावजूद गुमनामी के अंधेरे में त्रास झेलने को अभिशप्त हो जाती हैं।
हाल की दो घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। राजस्थान के श्रीगंगानगर में बारह वर्षीय बालिका को चार दिन बंधक बनाकर दो दर्जन लोगों द्वारा दुराचार किया गया। इस मामले में 18 अभियुक्त गिरफ्तार किए गए हैं और कुछ गिरफ्तारियां बाकी हैं। दूसरी घटना पश्चिम बंगाल की है जहां बारुईपुर में एक किशोरी के साथ सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई। शव परीक्षण में पाया गया कि उसके सिर व निजी अंगों पर गंभीर चोटें थी। इतना ही नहीं, दुराचार के बाद उसे बोरे मे बंद करके जिंदा ही तालाब में डुबो दिया गया। दोनों ही घटनाएं विचलित करने वाली हैं, लेकिन श्रीगंगानगर की घटना हर संवेदनशील इंसान को हिला देने वाली है। जनाक्रोश के चलते प्रशासन ने न केवल 18 लोगों को गिरफ्तार किया बल्कि उन होटलों को भी ध्वस्त किया गया जहां अलग-अलग जगहों में बच्ची को बंधक बनाकर देह व्यापार कराया गया। निस्संदेह, मोबाइल के बढ़ते हस्तक्षेप से परिवार संस्था की चूलें हिली नजर आती हैं। कथित सोशल मीडिया समाज में विद्रूपताओं को जन्म दे रहा है। श्रीगंगानगर की बारह वर्षीय लड़की शहर से सौ किमी दूर अपने एक इंस्टाग्राम फ्रेंड से मिलने जाती है, जो उससे वहां दुराचार करता है। वहां से देर रात शहर लौटने पर एक रिक्शेवाले के झांसे में आकर होटल पहुंचती है और फिर उसके साथ दुराचार का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है। परिजनों के लापता किशोरी के तलाश में थाने पहुंचने के बाद पुलिस हरकत में आती हैं, फिर उसे मुक्त कराया जाता है।
निस्संदेह, ये घटनाएं इंसानियत को शर्मसार करने वाली हैं। इस राक्षसी कृत्य से उद्वेलित लोग श्रीगंगानगर की सड़कों पर उतर आए। क्षुब्ध लोगों ने मशाल जुलूस निकालकर कानून के रखवालों के खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया। जनाक्रोश को देखते हुए 18 लोगों की गिरफ्तारी हुई। कुछ और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। लेकिन सवाल यह कि भारतीय समाज में हो रहे यौन लिप्साओं के विस्फोट की वजह क्या है? ये नैतिक पतन की पराकाष्ठा क्यों हो रही है? हवस के भूखे भेड़िए न उम्र देखते हैं, न किसी बेटी की बेबसी। उस किशोरी के साथ हुई बर्बरता के बारे में सोचकर भी रूह कांपती है। जो शायद ही जीवनभर इस त्रासदी से उबर पाये। कहीं न कहीं इंटरनेट व सोशल मीडिया पर यौन स्वच्छंदता की पश्चिम की आंधी हमारे समाज को पतित कर रही है। हमारे परंपरागत शुचिता के रिश्तों को तार-तार करके निरंकुश यौन व्यवहार को तार्किक बताने की साजिश रची जा रही है। हम बच्चों को रामराज के संस्कार देते हैं, जबकि समाज में दानवराज का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। बच्चों को भी त्याग-तपस्या से लालन-पालन करने वाले मां-बाप की बजाय आभासी दुनिया के छद्म मित्र रास आ रहे हैं। जिसके सम्मोहन में यह किशोरी घर से निकली और उसका पहला शिकार बनी। हवस के भेड़िये भी परिस्थितियों की मारी लड़कियों को ही अपने शिकंजे में लेते हैं। ऐसे में बेटियों को भी घर से निकलते वक्त समय की संवेदनशीलता और लोगों की विश्वसनीयता को परखना चाहिए। घर वालों से चोरी-छिपे अनजान लोगों पर यकीन करने की वजह से अकसर बेटियां अपराधियों की आसान शिकार बनती हैं। यौन अपराधों के उफान के दौर में पुलिस और स्त्री रक्षा से जुड़ी एजेंसियों को भी नये दौर की नई चुनौतियों के मुताबिक तैयार करना होगा। इसमें चाइल्ड वेलफेयर से जुड़ी संस्थाओं की सजगता -सक्रियता बढ़ाने तथा पॉक्सो व जुवेनाइल जस्टिस एक्ट को सख्त बनाने की जरूरत है। अभिभावक व स्कूल-कालेज बच्चियों को यौन-हिंसा से बचने और आत्मरक्षा से जुड़े विषयों पर गंभीर चर्चा करें। यदि इस दिशा में गंभीर पहल नहीं हुई तो पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर लगाए जा रहे 'रेप कैपिटल' के आरोप हकीकत समझे जाने लगेंगे।
