धर्म का मूल है अंतःश्रद्धा। जो आत्मतत्व के लिए स्थिर नहीं रह सकता, वह उसे पा भी नहीं सकता। शुकदेव ने अपने पिता और गुरु व्यास जी से धर्मतत्व के हस्तगत होने का रहस्य पूछा। व्यास ने उन्हें राजा जनक के पास जाने को कहा, क्योंकि वे उन दिनों के सबसे बड़े ब्रह्मवेता थे।
शुकदेव वहां पहुंचे और राजा को सूचित किया। उत्तर मिला कि सात दिन ठहरना होगा, उसके बाद ही भेंट संभव होगी। शुकदेव बिना आतिथ्य और आश्रय के जहां-तहां भटकते हुए समय बिताते रहे। न उन्हें खीज आई, न रोष या असंतोष उभरा।
समय लगता है, तिरस्कार होता है और कष्ट होता है, तो प्रयोजन पूरा करने की श्रद्धा बनी रहनी चाहिए। शुकदेव उन सात दिनों में यही सोचते रहे। नियत समय पर बुलावा आया, समुचित आतिथ्य हुआ और सम्मान के साथ उनकी जिज्ञासा का समाधान हुआ। जाते समय जनक ने कहा, 'श्रद्धा की शिथिलता और प्रखरता ही धर्मतत्व के प्राप्त होने या न होने का प्रमुख कारण है। आप जैसे श्रद्धालु ही खरे उतरते हैं और अमृतत्व प्राप्त करते हैं।'
