खाड़ी युद्ध से उपजे हालात व बाधित वैश्विक आपूर्ति शृंखला के बीच प्रधानमंत्री का ईंधन के उपयोग व सोने की खरीद में संयम बरतने का आह्वान निस्संदेह, वक्त की जरूरत है। लेकिन तेलंगाना के बाद बडोदरा से दूसरी बार उनके राष्ट्र को संबोधन व इसके समय को लेकर सवाल भी उठे हैं।
निस्संदेह, हालात काफी दिनों से चुनौतीपूर्ण बने हैं, रुपये में तेज गिरावट व महंगे कच्चे तेल के आयात की वजह से हमारा विदेशी मुद्रा भंडार काफी दबाव में रहा है। आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि इस घोषणा के लिये विधानसभा चुनाव परिणामों का इंतजार क्यों किया गया। कुछ लोगों का मानना है कि सत्ता शीर्ष से किया गया आह्वान कई बार देश में असुरक्षाबोध पैदा करता है, जिसका नकारात्मक असर भी पड़ सकता है। दरअसल, इससे कृत्रिम संकट पैदा करने वाले तत्व भी सक्रिय हो जाते हैं। इससे चीजों की जमाखोरी और कालाबाजारी को भी बढ़ावा मिलता है। इसमें दो राय नहीं कि देश बड़ी मात्रा में कच्चा तेल व सोना आयात करता है। जाहिर बात है जब इनकी वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं तो इन दोनों के कारण भारी दबाव देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। निस्संदेह, विषम वैश्विक परिस्थितियों में ईंधन की बचत, घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता कम करना चुनौतियों से मुकाबले के लिये समझदारी भरे उपाय हैं। लेकिन एक हकीकत यह भी है कि पिछले डेढ़ माह में सरकार विधानसभा चुनावों में व्यस्त रही। इस दौरान आर्थिक प्रबंधन का मुद्दा हाशिये पर चला गया। अब इन चुनौतियों से मुकाबले के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन लोगों से विदेशों में शादियां टालने, सोना खरीदने से बचने के लिये कहना बताता है कि रुपये में तेज गिरावट से सरकार चिंतित है। कहा जा रहा है कि बार-बार अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का दावा करने वाली सरकार को जनता से व्यवहार में संयम बरतने का आग्रह करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी।
दरअसल, आशंका यह भी है कि इन कदमों के ऐसे भी नतीजे निकल सकते हैं,जिनकी उम्मीद न की गई हो। निर्विवाद रूप से सोना भारतीय संस्कारों में है। वहीं भारत में आभूषण उद्योग लाखों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया है। ऐसे में सोने की खरीद में गिरावट से संपन्न निवेशकों के मुकाबले श्रमिकों को ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है। वहीं दूसरी ओर वर्क-फ्रॉम होम की नीति, काम करने वालों के बड़े तबके के लिए व्यावहारिक नहीं है। निस्संदेह, किसी भी आसन्न संकट में नागरिकों की जिम्मेदारी मायने रखती है। यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। लेकिन सवाल यह है कि मंत्रियों के कारों के काफिलों पर भी अंकुश लगेगा.. क्या शासन प्रशासन की शाहखर्ची पर लगाम लगेगी…। यदि ऐसा नहीं होता तो जनता की स्वतःस्फूर्त पहल प्रभावित होगी। वैसे भी नागरिक जिम्मेदारी एक हद तक तो प्रभावी हो सकती है,लेकिन वह किसी आपातकालीन योजना का विकल्प नहीं हो सकती। सरकार को भी अपनी आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार की जरूरत है। जहां तक सोने की खरीद पर संयम का सवाल है तो उससे देश में गहरा भावनात्मक लगाव जुड़ा रहा है। सोना हमारी संस्कृति, परंपरा, बचत और पारिवारिक समारोहों में गहरे तक शामिल रहा है। लेकिन सदियों से सम्मोहित करते सोने का आयात विदेशी मुद्रा भंडार पर गहरा असर डालता है। ऐसे में राष्ट्र हितों के मद्देनजर जीवन यापन करना, राष्ट्रीय कर्तव्य निभाने जैसा है। विगत में कई बार जब देश पर संकट आया तो लोगों ने राष्ट्र की संप्रुभता की रक्षा के लिये सोना तक दान किया। आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल छह सौ से सात सौ टन सोना आयात होता है, लेकिन निर्यात का प्रतिशत ना के बराबर है। बताया जाता है कि देश का नब्बे फीसदी सोना आयात होता है। यह सोना अर्थव्यवस्था में सक्रिय न होकर घरों में एकत्र हो जाता है। एक अनुमान के अनुसार देश के घरों में करीब 27 हजार टन सोना जमा है। बड़ी मात्रा में डॉलर खर्च करके आयात होने वाला सोना देश के चालू खाते और विदेशी मुद्रा भंडार पर प्रतिकूल असर डालता है। ऐसे में सोने पर संयम अर्थव्यवस्था को संबल देने में मददगार हो सकता है।
