देश के करोड़ों श्रद्धालुओं के आस्था-विश्वास को आहत करने वाला चंदा-चोरी प्रकरण सामने आने के बाद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की पहली बैठक में आखिरकार महामंत्री चंपत राय व सदस्य अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए।
अब ट्रस्ट के अन्य सदस्य कृष्ण मोहन को अंतरिम महामंत्री बनाया गया है। राममंदिर के चंदे में हेरफेर से उठे देशव्यापी विवाद के बाद प्राथमिकी दर्ज होने, एसआईटी के गठन और कुछ गिरफ्तारियों के बाद ये इस्तीफे अपरिहार्य थे। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ दो इस्तीफों से श्रद्धालुओं के भरोसे की बहाली हो पाएगी? जैसा कि नवनियुक्त अंतरिम महामंत्री कृष्ण मोहन ने कहा कि मेरी प्राथमिकता है कि चंदा चोरी के मामले में जो भी दोषी पाया जाएगा,उसे कड़ी सजा मिले। उन्होंने स्वीकारा कि ट्रस्ट प्रबंधन और संचालन में कहीं न कहीं खामियां रही हैं। उन्हें दूर करने का प्रयास होगा। साथ ही माना कि जो तथ्य सामने आए हैं उससे न्यास की छवि धूमिल हुई है। एक अविश्वास का भाव उत्पन्न हुआ। ट्रस्ट की प्रतिष्ठा को फिर स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि कृष्ण मोहन भारतीय वन सेवा में शामिल होने से पहले कुछ सालों तक परमाणु ऊर्जा विभाग में परमाणु वैज्ञानिक भी रहे हैं। वे दलित समुदाय से आते हैं। वे उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पदाधिकारी रहे हैं। इसी कड़ी में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि महाराज ने सोमवार को अयोध्या में उन बहुमूल्य वस्तुओं को मीडिया के सामने प्रदर्शित किया, जिनके गायब होने को लेकर अटकलें लगायी जा रही थीं। बताया जा रहा है कि ट्रस्ट के संचालन के लिये विशिष्ट अधिकारियों की नियुक्ति करने के लिये एक समिति का गठन किया गया है। इसी क्रम में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की अगली बैठक बाईस जुलाई को होगी। जिसमें महत्वपूर्ण फैसले लिये जाने का अनुमान है। कहा जा रहा है कि तब तक चंदा चोरी मामले में एसआईटी की रिपोर्ट भी आ जाएगी।
लेकिन सवाल यह है कि आस्था व विश्वास से खिलवाड़ के कृत्य की जांच के लिये क्या एसआईटी की जांच पर्याप्त है? क्या चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे मात्र से उनकी लापरवाही और गैर जिम्मेदार व्यवहार पर कार्रवाई पूरी मान ली जाए? क्या इतनी कार्रवाई मात्र से सारे प्रकरण से संदेह के बादल छंट जाएंगे और लोगों का खंडित भरोसा फिर से कायम हो जाएगा? अब तो संघ प्रमुख ने भी स्वीकारा है कि इस घटनाक्रम से व्यापक हिंदू समाज की भावनाएं आहत हुई हैं। ऐसे में अब ट्रस्ट को कठोर फैसले लेने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखानी चाहिए। निस्संदेह, समय रहते यदि ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने चंदा प्रकरण में संवेदनशीलता के साथ कड़ी निगाह रखी होती तो यह बड़ा विवाद न खड़ा होता। शुरुआती दौर में जब मामले की सुगबुगाहट सामने आई तो तभी ट्रस्ट के पदाधिकारियों को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए थी। ऐसे में ट्रस्ट के पदाधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठने स्वाभाविक ही हैं। कुछ लोग तो ट्रस्ट को भंग करके नये सिरे से इसके गठन की बात कहते रहे हैं। बहरहाल, इतना तय है कि ट्रस्ट की कारगुजारियों में सबकुछ न तो पारदर्शी था और न ही सब कुछ नियम अनुसार ही चला। कहा जा रहा है कि कुछ पदाधिकारियों के पास जरूरत से ज्यादा अधिकार थे, जिसके चलते अन्य सदस्य उदासीन बने रहे। यही वजह है कि कुछ लोग एसआईटी से इतर एक उच्च स्तरीय जांच की मांग इस मामले में करते रहे हैं। निस्संदेह, बहुचर्चित चढ़ावा चोरी प्रकरण की गूंज पूरी दुनिया में हुई है, जिसने संघ,भाजपा, केंद्र सरकार व प्रदेश की सरकार को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है। यही वजह है कि लोग इस मामले में किसी लीपा-पोती के बजाय भक्तों के दान की पारदर्शी व्यवस्था करने की मांग कर रहे हैं। जिससे गाहे-बगाहे देश के अन्य प्रमुख तीर्थस्थलों में भी उठने वाले चंदे में हेरा-फेरी के मामलों का हमेशा के लिये पटाक्षेप हो सके। साथ ही श्रद्धालुओं को यह भी पता लग सके कि दान की राशि का उपयोग कैसे किया जा रहा है।
