एक बार नारद जी ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, 'प्रभु! इस संसार में आपका सबसे बड़ा भक्त कौन है?' श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, 'रुक्मिणी।' नारद ने आश्चर्य से पूछा, 'राधा नहीं? मीरा नहीं?
यशोदा मैया नहीं? अर्जुन नहीं?' श्रीकृष्ण ने कहा- 'रुक्मिणी ने मुझे पाने से पहले ही अपना मान लिया था।' नारद ने जिज्ञासा से पूछा, 'कैसे?'
श्रीकृष्ण बोले, 'जब उसके भाई ने उसका विवाह शिशुपाल से निश्चित कर दिया था, तब उसने मुझे देखा तक नहीं था। फिर भी उसने मुझे एक पत्र लिखा।' नारद बोले, 'उस पत्र में क्या लिखा था?' श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, 'शब्द बहुत कम थे, पर विश्वास असीम था।
उसने लिखा था, 'मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप अवश्य आएंगे। यदि आप नहीं आए, तो भी मैं जीवनभर किसी और को अपना नहीं मानूंगी।' फिर श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, 'जो व्यक्ति तुम्हारे विश्वास के योग्य हो, उस पर विश्वास करना सामान्य बात है; लेकिन जो तुम्हारे विश्वास के कारण स्वयं को उस विश्वास के योग्य बना दे, वही सच्चा विश्वास है। रुक्मिणी ने मुझे मेरे सामर्थ्य से नहीं, अपने अटूट विश्वास से बांध लिया था।' विश्वास वह शक्ति है जो असंभव को भी संभव बना देती है। जहां अटूट श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण होता है, वहां स्वयं भगवान भी अपने भक्त का विश्वास टूटने नहीं देते।
