
नई दिल्ली ईएमएस). जेल प्रशासन ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि विभिन्न जेलों में हजारों कैदियों के लिए वैवाहिक जिम्मेदारी के निर्वहन के अधिकार को लागू करना संभव नहीं है. जेल प्रशासन ने सीमित संसाधनों का हवाला देते हुए कहा कि कैदियों के इस अधिकार को लागू नहीं किया जा सकता. मुख्य न्यायाधीश डी.एन. पटेल और न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर की पीठ के समक्ष जेल महानिदेशक ने हलफनामा दाखिल करते यह जानकारी दी है. जेल महानिदेशक ने पीठ को कहा कि कैदी वैवाहिक जिम्मेदारियों का निर्वहन पैरोल या फरलो पर रिहा होने के दौरान कर सकता है.
जेल महानिदेशक ने अधिवक्ता अमित साहनी की ओर से दाखिल जनहित याचिका के जवाब में यह हलफनामा दाखिल किया है.
इसमें कहा गया है कि कैदियों को पारिवारिक और सामाजिक कार्यों के लिए पेरोल, फरलो या अंतरिम जमानत दी जाती है. जेल महानिदेशक ने कहा कि इस दौरान कैदी अपने वैवाहिक जिम्मेदारियों के अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए. जेल प्रबंधन ने पीठ को कहा कि कैदी दांपत्य जीवन के अधिकार का उपयोग करने के लिए पैरोल, फरलो या अंतरिम जमानत की मांग कर सकता है.
पीठ को कहा गया कि कैदियों को जेल में पत्नी, परिवार के अन्य सदस्य एवं अधिवक्ता से मुलाकात करने की इजाजत दी जाती है. जेल नियमावली का हवाला देते हुए पीठ को बताया गया है कि जेल में दांपत्य जीवन का अधिकार देने का कोई प्रावधान नहीं है. जेल प्रशासन ने पीठ को बताया है कि जेल में प्रतिदिन करीब 1200 कैदियों से मुलाकात के लिए उसके परिजन आते हैं. ऐसे में सभी को दांपत्य जीवन का अधिकार दिया जाना संभव नहीं है. साथ ही हलफनामा में कहा कि अभी तक किसी भी कैदी ने जेल प्रशासन से वैवाहिक जिम्मेदारी का पालन करने के लिए इस तरह की मांग नहीं की है.