50 years’ imprisonment for brutality : चंडीगढ़। सातवां जन्मदिन आने में महज 17 दिन बाकी थे। मासूम आंखों में सपने थे, लेकिन दरिंदगी ने उन सपनों को हमेशा के लिए बुझा दिया। जिस बच्ची को सुरक्षित बचपन मिलना चाहिए था, उसे हवस का शिकार बनाकर बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया।
50 साल की सजा बिना छूट
अब इस जघन्य अपराध के दोषी की फांसी की सजा को हाईकोर्ट ने बिना किसी छूट के 50 वर्ष की वास्तविक कैद में बदल दिया है, जिससे एक बार फिर न्याय, दंड और पीड़ित परिवार के दर्द पर बहस तेज हो गई है। पलवल की ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में आनंद सिंह को दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। अदालत ने दुष्कर्म, हत्या, अपहरण और साक्ष्य मिटाने के अपराध में उसकी दोषसिद्धि को पूरी तरह बरकरार रखा।
फैसला सुनाते समय कोर्ट ने कहा
साथ ही पुलिस जांच में दस्तावेज गढ़ने, लोक अभियोजक की गंभीर लापरवाही और ट्रायल कोर्ट की विफलताओं पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने ट्रायल कोर्ट की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हर मुकदमा एक जहाज की तरह है जिसे किनारे तक पहुंचना है और जब वह मुश्किल पानी में हो तो ट्रायल जज जहाज छोड़ने वाला अंतिम व्यक्ति होना चाहिए। खंडपीठ ने पीड़िता के कपड़ों की पहचान न कराए जाने को लोक अभियोजक और ट्रायल कोर्ट की बड़ी चूक बताया।
आर्थिक दंड भी भरेगा परिवार
अदालत ने कहा कि यह जांच एजेंसी की नहीं बल्कि अभियोजन और दोनों ट्रायल जजों की विफलता थी। अदालत ने कहा कि न्यायाधीश का मूल कर्तव्य न्याय सुनिश्चित करना है ताकि कोई निर्दोष दंडित न हो और कोई दोषी बच न सके। अदालत ने दोषसिद्धि बरकरार रखी और फांसी की सजा को बिना छूट 50 वर्ष के वास्तविक आजीवन कारावास में बदल दिया। साथ ही हत्या के मामले में 50 लाख और पॉक्सो मामले में 23 लाख रुपये जुर्माना भी लगाया, जिसकी वसूली होने पर राशि पीड़िता के परिवार को मुआवजे के रूप में दी जाएगी।
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