इंटरनेशनल डेस्क: 80 वर्ष के पहले टोक्यो ट्रायल में भाग लेने वाले चीनी न्यायाधीश मेइ रुआओ ने ऐसी चेतावनी दी थी कि अतीत की आपदा भूलने से भावी आपदा लायी जाएगी। 80 वर्ष के बाद आज जापान के नये किस्म वाले सैन्यवाद ने फिर अपना नुकीले दांत दिखाये।
टोक्यो ट्रायल का ऐतिहासिक मूल्य और व्यावहारिक महत्व अधिक उजागर हो गया।
टोक्यो ट्रायल में, सभी 25 आरोपियों को अपराधों का दोषी ठहराया गया था और तौजौ हिदेकी सहित सात युद्ध अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी। जापानी सैन्यवाद हमेशा ऐतिहासिक शर्म के स्तंभ पर लटका रहा है।
80 वर्ष के बाद अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति में गहरा बदलाव आया है। दूसरे विश्व युद्ध की विजयी उपलब्धि से इंकार करने वाली गलत ऐतिहासिक अवधारणा फैल रही है। जापान का नयी किस्म वाला सैन्यवाद वास्तविक खतरा बन रहा है। फिलहाल चीन समेत अनेक देशों ने श्रृंखलात्मक स्मृति गतिविधियां आयोजित कीं, जिनका उद्देश्य टोक्यो ट्रायल के ऐतिहासिक महत्व की याद करना और जापानी सैन्यवाद का फिर पनपने नहीं देना है।
ध्यान रहे जापानी वर्तमान प्रधान मंत्री साने ताकाइची ने वर्ष 2014 से अब तक 10 से अधिक बार यासुकुनी मंदिर का दर्शन किया, जहां दूसरे विश्व युद्ध में जापानी युद्ध अपराधियों की स्मृति पट्टिकाएं रखी हैं। उन्होंने कई बार नानचिंग नरसंहार से इंकार किया। फिलहाल उन्होंने फिर प्रधान मंत्री की हैसियत से यासुकुनी मंदिर में अलग-अलग तौर पर चढ़ावा चढ़ाया और दान दिया, जिसे देश-विदेश की व्यापक आलोचना मिली।
विश्लेषकों के विचार में अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा टोक्यो ट्रायल के न्यायपूर्ण फैसले का अवलोकन करना वास्तव में जापान की दक्षिणपंथी शक्ति के प्रति सख्त चेतावनी है। इससे यह आवाज बुलंद की गयी है कि ऐतिहासिक न्याय से इंकार नहीं किया जा सकता और कानूनी प्रभावकारिता को चुनौती देने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती।
80 वर्ष के बाद जापानी की नयी सैन्यवाद की कुचेष्टा के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तगड़ा जवाबी हमला करना है और दूसरे विश्व युद्ध की विजयी उपलब्धि की डटकर रक्षा करनी है। अगर कोई व्यक्त या कोई शक्ति जापान के आक्रमण इतिहास के मामले को पलटने का दुस्साहस करता है, तो उसे फिर ऐतिहासिक अदालत में प्रस्तुत किया जाएगा।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग)
