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सार्वजनिक शौचालय: विकास के आईने पर जमी गंदगी

Public toilets : mirror of development covered in filth : स्वच्छता किसी राष्ट्र का सिंगार नहीं, उसका चरित्र है। किसी देश की असली पहचान संसद, मेट्रो या एक्सप्रेस-वे नहीं, बल्कि वह सार्वजनिक शौचालय है जहां सामान्य नागरिक बिना भय, घृणा या नाक सिकोड़े प्रवेश कर सके।

शौचालयों में दम तोड़ता स्वच्छ भारत

पिछले एक दशक में स्वच्छ भारत मिशन जनांदोलन और विकास का प्रतीक बना, लेकिन बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, बाज़ारों, पार्कों और राजमार्गों के अधिकांश सरकारी शौचालय इस दावे की सबसे कड़वी सच्चाई हैं। वहाँ प्रवेश करते ही पहले नाक, फिर आँखें बंद करनी पड़ती हैं। यह केवल दुर्गंध नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता है जिसने शौचालय बनाना उपलब्धि माना, पर उन्हें स्वच्छ रखना जिम्मेदारी नहीं समझा। स्वच्छ भारत अभियान की असली परीक्षा सार्वजनिक शौचालयों में होती है, और सबसे बड़ी विफलता भी वहीं दिखाई देती है।

घर तक सफलता, बाहर विफलता

यह कहना अन्याय होगा कि स्वच्छ भारत मिशन ने कुछ नहीं किया। इसकी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं। 2014 में ग्रामीण भारत में शौचालय कवरेज लगभग 39 प्रतिशत था, जो अब सरकारी आंकड़ों के अनुसार 95 प्रतिशत से अधिक हो गया है। 12 करोड़ से अधिक घरेलू शौचालय बने, 6 लाख से अधिक गाँव और हजारों शहर ओडीएफ घोषित हुए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, बेहतर स्वच्छता से डायरिया से होने वाली मौतें घटीं और लाखों परिवारों का स्वास्थ्य व्यय कम हुआ। यह निश्चित ही बड़ी उपलब्धि है। लेकिन क्या स्वच्छता घर की चौखट पर ही समाप्त हो जाती है? क्या घर से बाहर निकलते ही नागरिक की गरिमा अप्रासंगिक हो जाती है? घरों में शौचालय बनाकर आधी लड़ाई जीती गई, मगर सार्वजनिक शौचालयों की बदहाली ने इस सफलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।

बन गए शौचालय, भूल गया सिस्टम

यही वह विरोधाभास है जो स्वच्छ भारत मिशन की चमक फीकी कर देता है। जनाग्रह और अन्य संस्थाओं के सर्वे बताते हैं कि बड़े शहरों के अधिकांश सार्वजनिक शौचालय भी पानी, नियमित सफाई, पर्याप्त रोशनी और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। कई महीनों से बंद पड़े हैं, कई जर्जर हो चुके हैं और अनेक ठेकेदारों की लापरवाही व प्रशासनिक उदासीनता के कारण उपयोग योग्य नहीं बचे। रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और राष्ट्रीय राजमार्गों के शौचालय यात्रियों की मजबूरी हैं, सुविधा नहीं। यह संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि उस सरकारी सोच का परिणाम है जो शौचालय के उद्घाटन को उपलब्धि मानती है, रखरखाव को नहीं। शौचालय बनते हैं, फीते कटते हैं, तस्वीरें खिंचती हैं, रिपोर्टें बनती हैं और फिर वे धीरे-धीरे गंदगी के हवाले कर दिए जाते हैं।

स्वच्छता नहीं, सम्मान का सवाल

सार्वजनिक शौचालयों की बदहाली की सबसे बड़ी कीमत महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग और दिव्यांग चुकाते हैं। महिलाएँ प्यास से नहीं, उपयोग योग्य शौचालयों के अभाव में घंटों पानी पीने से बचती हैं। लंबी यात्राएँ उनके लिए सुविधा नहीं, चिंता बन जाती हैं। गंदे शौचालय डायरिया, टाइफाइड, हेपेटाइटिस-ए सहित अनेक संक्रामक रोगों के केंद्र हैं। विद्यालयों में शौचालयों की कमी और बदहाली के कारण कई लाख लड़कियाँ पढ़ाई बीच में छोड़ देती हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार देश में लगभग 98,500 सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए कार्यरत शौचालय नहीं हैं। यह केवल शिक्षा नहीं, महिला सम्मान और सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है। अधिकांश सार्वजनिक शौचालय आज भी दिव्यांगों के लिए अनुपयोगी हैं। यदि स्वच्छता ही गरिमा है, तो उनकी यह स्थिति हर दिन करोड़ों भारतीयों की गरिमा को ठेस पहुँचा रही है।

निर्माण हुआ, रखरखाव फिर गायब

स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत “आस्पिरेशनल टॉयलेट” योजना शुरू की गई है। करीब 29 हजार आधुनिक सार्वजनिक शौचालयों का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन कई स्थानों पर परियोजनाएँ अभी अधूरी हैं या रखरखाव की कमी के कारण जल्द खराब हो रही हैं। कहीं परियोजनाएँ अधूरी रहीं, तो बने शौचालय भी रखरखाव के अभाव में जल्द बदहाल हो गए। वजह वही पुरानी है-बजट निर्माण के लिए है, रखरखाव के लिए नहीं; जिम्मेदारी सबकी, जवाबदेही किसी की नहीं। नगर निगम ठेकेदार को, ठेकेदार विभाग को और विभाग बजट को दोष देता है। सार्वजनिक संपत्ति को “यह मेरी नहीं” मानने की मानसिकता भी गंदगी बढ़ाती है। नतीजा, सार्वजनिक शौचालय उपेक्षा के स्मारक बन जाते हैं।

उम्मीद की मिसाल बने कुछ शहर

फिर भी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। 2022 के डब्ल्यूएचओ-यूनिसेफ आंकड़ों के अनुसार देश में अभी भी करीब 15.7 करोड़ लोग (लगभग 11%) खुले में शौच करते थे, जो बताता है कि यात्रियों और अस्थायी आबादी के लिए पर्याप्त सार्वजनिक शौचालय अब भी उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी ओर, इंदौर, सूरत और कुछ अन्य शहरों ने साबित किया है कि इच्छाशक्ति, नियमित सफाई, चौबीसों घंटे पानी, तकनीकी निगरानी, सामुदायिक भागीदारी और जवाबदेह प्रबंधन से सार्वजनिक शौचालय स्वच्छ और सम्मानजनक बनाए जा सकते हैं। कई स्वयंसेवी संस्थाएँ और निजी कंपनियाँ भी “पे एंड यूज़” मॉडल से इसका उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। संदेश स्पष्ट है-समस्या संसाधनों की नहीं, प्राथमिकताओं, प्रबंधन और जवाबदेही की है।

अब गुणवत्ता पर हो स्वच्छता की कसौटी

अब समय शौचालयों की संख्या नहीं, उनकी गुणवत्ता से सफलता मापने का है। हर सार्वजनिक शौचालय के लिए पृथक रखरखाव बजट, डिजिटल निगरानी, सीसीटीवी, सोलर पावर, वेस्ट रिसाइक्लिंग, चौबीसों घंटे पानी और नियमित सफाई अनिवार्य हों। महिलाओं, बच्चों और दिव्यांगों की जरूरतों के अनुरूप डिज़ाइन हर परियोजना का हिस्सा बने। ठेकेदारों की जवाबदेही तय हो तथा नियमित ऑडिट, दंड और समीक्षा व्यवस्था लागू हो। स्थानीय समुदाय को निगरानी में भागीदार बनाया जाए और “स्वच्छता मेरी जिम्मेदारी” को अभियान नहीं, नागरिक संस्कार बनाया जाए। आखिर, स्वच्छ सार्वजनिक शौचालय केवल सरकार की नहीं, सभ्य समाज की भी पहचान हैं।

स्वच्छ भारत की मंज़िल अभी बाकी है

आख़िरकार, किसी राष्ट्र की स्वच्छता का असली पैमाना घरों के नहीं, सार्वजनिक शौचालय हैं। जिस दिन कोई नागरिक रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, बाज़ार या पार्क के शौचालय में बिना भय, घृणा या साँस रोके प्रवेश कर सकेगा, उसी दिन स्वच्छ भारत मिशन अपनी मंज़िल पर पहुँचेगा। तब तक चमकते आँकड़े सरकारी रिपोर्टों की शोभा बढ़ा सकते हैं, जनता का विश्वास नहीं। अब स्वच्छता को अभियान नहीं, संस्कृति और निर्माण को नहीं, रखरखाव को सफलता का मानदंड बनाना होगा। भारत का नेतृत्व शौचालयों की संख्या नहीं, उनकी स्वच्छता, गरिमा और मानवीय संवेदना तय करेगी। स्वच्छ भारत का सबसे गंदा सच बदले, इसकी शुरुआत हर सार्वजनिक शौचालय से हो। -प्रो. आरके जैन

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