Thursday, 01 Aug, 4.58 am दिल्ली

दिल्ली-एनसीआर
दिल और गुर्दे के बाद अब फेफड़ों के प्रत्यारोपण पर जोर

दिल्ली एम्स और गंगाराम अस्पताल के बाद अब राजधानी के दो और निजी अस्पताल फेफड़ा प्रत्यारोपण के लिए लाइसेंस लेने की प्रक्रिया में हैं। जल्द ही फोर्टिस के अस्पताल वसंतकुंज और ओखला स्थित फोर्टिस एस्कॉर्ट को प्रत्यारोपण करने के लिए लाइसेंस मिलने वाला है। राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (नोटो) की मानें तो दोनों अस्पतालों में निरीक्षण और कागजात की कार्रवाई पूरी हो चुकी है। जल्द ही दोनों अस्पतालों को लाइसेंस मिल जाएगा। हालांकि एम्स और गंगाराम अस्पताल में लाइसेंस मिलने के बाद भी अब तक किसी के फेफड़ों का प्रत्यारोपण नहीं हुआ है। लाइसेंस मिलने के बाद भी प्रत्यारोपण शुरू न होने के पीछे कई कारण सामने आए हैं। डॉक्टरों का प्रशिक्षण, पोस्ट ऑपरेटिव केयर, पर्याप्त तैयारी न होना इत्यादि इसके पीछे बड़ी वजह बताई जा रही है। डॉक्टरों के अनुसार दिल्ली में फेफड़ों के प्रत्यारोपण के करीब 5 हजार से ज्यादा केस दर्ज हो चुके हैं, लेकिन सुविधा न होने के कारण इन मरीजों को प्रत्यारोपण के लिए तमिलनाडु का विकल्प दिया जाता है जहां 5 से 8 लाख रुपये में प्रत्यारोपण होता है।

नोटो के अनुसार वर्ष 2016 में देश भर में फेफड़ों के 58 प्रत्यारोपण हुए। इनमें से 56 प्रत्यारोपण तमिलनाडु और दो तेलंगाना में हुए हैं। ठीक इसी तरह 2017 में हुए 125 प्रत्यारोपण में से अधिकांश तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में हुए। जबकि 2018 में करीब 145 प्रत्यारोपण हुए । इनमें से एक भी दिल्ली में नहीं हुआ। दिल्ली में फेफड़ों के अलावा पेनक्रियाज प्रत्यारोपण भी नहीं होता है।

देश में दिल्ली के अलावा तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पुड्डुचेरी, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, चंडीगढ़, कर्नाटक के अस्पतालों में मानव अंग प्रत्यारोपण किया जाता है।

सर गंगाराम अस्पताल के डॉ. अरविंद कुमार बताते हैं कि फेफड़ों के प्रत्यारोपण के लिए मरीजों की सूची काफी लंबी है। उनकी ओपीडी में आए दिन रोगी पहुंच रहे हैं। चूंकि इस प्रत्यारोपण के लिए काफी तैयारी की जरूरत है। इसलिए फिलहाल थोड़ा वक्त लग सकता है।

वहीं फोर्टिस अस्पताल, वसंतकुंज के वरिष्ठ डॉ. सब्यसाची बाल ने बताया कि एस्कॉर्ट फोर्टिस और उनके अस्पताल में फेफड़ों के प्रत्यारोपण का लाइसेंस मिलने वाला है। चूंकि उनके यहां मरीजों की सूची काफी लंबी है। इसलिए लाइसेंस मिलने के बाद प्रत्यारोपण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।

हजारों मरीज वाले एम्स भी पीछे देश में सबसे बेहतर संस्थान माना जाने वाला एम्स भी फेफड़ों के प्रत्यारोपण में पिछड़ा हुआ है। अब बताया जा रहा है कि अगले माह से यहां प्रत्यारोपण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। जबकि इसी साल संस्थान को प्रत्यारोपण की मंजूरी मिली है।

अंग प्रत्यारोपण पर दिल्ली के हालात
अंग प्रत्यारोपण को लेकर दिल्ली और एनसीआर में लगभग एक जैसे हालात हैं। एम्स के अलावा बड़े निजी अस्पतालों में दिल, लिवर और गुर्दा के प्रत्यारोपण ही अब तक किए जा रहे हैं। लिवर और गुर्दा प्रत्यारोपण के मामले में ये अस्पताल सबसे आगे हैं। इसके पीछे एक वजह कैडेवर डोनेशन पर कम आश्रित होना भी है।

एक फेफड़े के लिए 2 लोगों की होती है जरूरत डॉक्टरों के अनुसार, जिस तरह से एक इंसान एक गुर्दे से भी जीवन यापन कर सकता है। वैसा फेफड़े में नहीं हो सकता। अगर किसी इंसान से एक फेफड़ा लेते हैं तो उसका जीवन 10 वर्ष कम हो सकता है। इसीलिए फेफड़ा प्रत्यारोपण के लिए कैडेवर (ब्रेनडेड के बाद) या फिर दो लोगों से आधा-आधा फेफड़ा लेकर प्रत्यारोपित किया जा सकता है।

इसे यूं भी समझ सकते हैं कि अगर किसी मरीज के दोनों या एक फेफड़ा खराब होता है तो उसे पूरा बदलने के लिए अलग से पूरा फेफड़ा चाहिए। पूरा फेफड़ा लेना संभव नहीं है इसलिए दो लोगों से काम चलाना पड़ता है। यही स्थिति सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है क्योंकि एक इंसान को बचाने के लिए दो लोगों से अंग लेना चिकित्सीय सिद्धांत इजाजत नहीं देता है।

Dailyhunt
Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Dailyhunt. Publisher: Delhi
Top