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डॉलर की मजबूती और कच्चे तेल में नरमी से कीमती धातुओं पर दबाव, सोने-चांदी की कीमतों में आई 1 प्रतिशत से ज्यादा तक की गिरावट

डॉलर की मजबूती और कच्चे तेल में नरमी से कीमती धातुओं पर दबाव, सोने-चांदी की कीमतों में आई 1 प्रतिशत से ज्यादा तक की गिरावट

ई दिल्ली। भारतीय सर्राफा बाजार में सप्ताह की शुरुआत दबाव के साथ हुई। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोमवार को सोने और चांदी दोनों की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। मजबूत अमेरिकी डॉलर और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के चलते निवेशकों ने मुनाफावसूली की, जिसका असर सोने और चांदी के भाव पर साफ दिखाई दिया।

हालांकि, सोने की तुलना में चांदी में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिला।

एमसीएक्स पर दिन के कारोबारी सत्र में अगस्त डिलीवरी वाला सोना 1,051 रुपए यानी 0.71 प्रतिशत गिरकर 1,46,327 रुपए प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। दिन के कारोबार में यह सोना अपने पिछले बंद भाव 1,47,378 रुपए से 0.77 प्रतिशत टूटकर 1,46,231 रुपए के दिन के निचले स्तर पर पहुंच गया।

वहीं, एमसीएक्स पर सितंबर डिलीवरी वाली चांदी 2,066 रुपए यानी 0.87 प्रतिशत की गिरावट के साथ 2,35,344 रुपए प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। शुरुआती कारोबार में चांदी में बिकवाली और तेज रही तथा इसका भाव अपने पिछले बंद 2,37,410 रुपए से 1 प्रतिशत से ज्यादा टूटकर 2,35,010 रुपए प्रति किलोग्राम के इंट्राडे निचले स्तर तक पहुंच गया।

आईबीजेए के आंकड़ों के अनुसार, सोमवार को 999 प्यूरिटी वाला सोना शाम के अपडेट में 1,45,583 रुपए प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया, जो पिछले कारोबारी दिन शुक्रवार को 1,46,107 रुपए पर बंद हुआ था। यानी पीले की चमक पिछले कारोबारी सत्र से 524 रुपए कम हो गई है।

वहीं आईबीजेए के अनुसार, 999 प्यूरिटी वाली चांदी सोमवार को अपने पिछले बंद 2,33,354 रुपए से 2,33,158 रुपए प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई, जो 196 रुपए की मामूली गिरावट को दर्शाती है।

वैश्विक बाजार में भी सोने और चांदी पर दबाव बना रहा। स्पॉट गोल्ड, जो पहले करीब 0.6 प्रतिशत बढ़कर 4,195 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया था, बाद में फिसलकर लगभग 4,136 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करता दिखाई दिया। वहीं, स्पॉट सिल्वर भी 61.7 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर आ गया और इसमें 1 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई।

विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी डॉलर में मजबूती सोने और चांदी की कीमतों पर दबाव का सबसे बड़ा कारण बनी। डॉलर इंडेक्स (डीएक्सवाई) फिर से मजबूत होकर 101 के स्तर पर पहुंच गया और फिलहाल यह 100.07 के आसपास कारोबार करता नजर आया। आमतौर पर डॉलर मजबूत होने पर सोने जैसी सुरक्षित निवेश संपत्तियों की मांग कमजोर पड़ जाती है।

गौरतलब है कि पिछले सप्ताह अमेरिकी रोजगार के कमजोर आंकड़ों और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के कारण सोने और चांदी में अच्छी तेजी देखने को मिली थी। कमजोर रोजगार आंकड़ों के बाद यह उम्मीद बढ़ी कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व 2026 में ब्याज दरों में अपेक्षा से कम बढ़ोतरी करेगा।

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भी गिरावट आई। डब्ल्यूटीआई क्रूड लगभग 68.3 डॉलर प्रति बैरल और ब्रेंट क्रूड करीब 71.67 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता नजर आया। तेल की कीमतों में नरमी से महंगाई का दबाव कम होने की उम्मीद बढ़ी है, जिससे सोने की सुरक्षित निवेश वाली मांग भी कुछ कमजोर हुई है।

इस बीच, सोमवार को जारी डीएसपी नेत्रा (जुलाई 2026 संस्करण) की रिपोर्ट के अनुसार, हाल के महीनों में सोना और चांदी अपने रिकॉर्ड उच्च स्तर से काफी नीचे आ चुके हैं, लेकिन मौजूदा गिरावट अब भी इतिहास की कई बड़ी गिरावटों से कम है।

रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2026 में सोना 5,602 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था, जिसके बाद यह गिरकर 3,942 डॉलर प्रति औंस तक आ गया। यानी इसमें लगभग 30 प्रतिशत की गिरावट आई। हालांकि, यह गिरावट 1980 के बाद आई 71 प्रतिशत की ऐतिहासिक गिरावट से काफी कम है। उस समय सोने को स्थायी निचला स्तर बनाने में करीब 19 वर्ष लगे थे, जबकि पुराने रिकॉर्ड स्तर तक दोबारा पहुंचने में लगभग 28 वर्ष का समय लगा था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जनवरी 2026 में चांदी 121.6 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची थी, जिसके बाद इसका भाव गिरकर 55.6 डॉलर प्रति औंस रह गया, यानी करीब 54 प्रतिशत की गिरावट आई। इसके बावजूद यह गिरावट 1980 के बाद आई 93 प्रतिशत की ऐतिहासिक गिरावट से काफी कम है। उस समय चांदी को स्थायी निचला स्तर बनाने में 11 वर्ष से अधिक और पुराने रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने में 31 वर्ष से अधिक का समय लगा था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कीमती धातुओं में बड़ी तेजी के बाद सुधार आना सामान्य बात है। इतिहास बताता है कि सोना और चांदी को बड़ी गिरावट के बाद स्थायी निचला स्तर बनाने में कुछ महीनों से लेकर कई वर्षों तक का समय लग सकता है। वहीं, पुराने रिकॉर्ड स्तर तक दोबारा पहुंचने में कई बार दशकों का समय भी लग जाता है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के बजाय लंबी अवधि के नजरिए से निवेश करना चाहिए।

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