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पिनराई विजयन का राहुल गांधी पर तीखा हमला, बोले- वामपंथ को लेक्चर देना 'राजनीतिक अज्ञानता'

पिनराई विजयन का राहुल गांधी पर तीखा हमला, बोले- वामपंथ को लेक्चर देना 'राजनीतिक अज्ञानता'

तिरुवनंतपुरम। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि वामपंथ को छत्तीसगढ़ में हमलों के मुद्दे पर "लेक्चर देने की कोशिश राजनीतिक अज्ञानता का शर्मनाक प्रदर्शन" है।

विजयन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि आज जिन कानूनों का इस्तेमाल भाजपा अल्पसंख्यकों को डराने के लिए कर रही है, वे कांग्रेस सरकारों द्वारा ही बनाए और दशकों तक संरक्षित किए गए थे। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राहुल गांधी में हिमाचल प्रदेश में, जहां कांग्रेस सत्ता में है, इन "कठोर धर्मांतरण विरोधी कानूनों" को खत्म करने का साहस है?

उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस ने ऐतिहासिक रूप से संघ परिवार के राजनीतिक उभार का रास्ता तैयार किया है, इसलिए उसे वामपंथ के धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा पर सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है।

इसी बीच, माकपा के बागी नेता जी सुधाकरन ने भी मुख्यमंत्री विजयन पर सीधा हमला बोला है। पूर्व मंत्री और चार बार विधायक रह चुके सुधाकरन ने विजयन के संरक्षण के दावों को खारिज करते हुए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान पर जोर दिया।

अलाप्पुझा से आने वाले सुधाकरन ने कहा कि उन्होंने 15 साल की उम्र में पार्टी जॉइन की थी और 63 वर्षों तक कम्युनिस्ट आंदोलन में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने कहा कि 1967 के दौर में विजयन त्रावणकोर क्षेत्र में लगभग अज्ञात थे और मालाबार के थलसेरी तक ही सीमित थे।

सुधाकरन की यह तीखी टिप्पणी उस समय आई जब वे एक चुनावी कार्यक्रम में राहुल गांधी के साथ मंच साझा करते नजर आए, जो राज्य की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

2021 विधानसभा चुनाव में पार्टी द्वारा किनारे किए जाने के बाद से सुधाकरन लो प्रोफाइल में थे, लेकिन पिछले महीने चुनाव की घोषणा से पहले उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया। इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ ने उन्हें समर्थन दिया।

अलाप्पुझा, जो पारंपरिक रूप से वामपंथ का गढ़ माना जाता है, वहां लंबे समय से गुटबाजी देखने को मिलती रही है। 1996 में यहां बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ था, जब वरिष्ठ माकपा नेता वी. एस. अच्युतानंदन, जिन्हें मुख्यमंत्री बनने का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, एक स्थानीय कांग्रेस उम्मीदवार से हार गए थे। यह घटना पार्टी के अंदरूनी मतभेदों का उदाहरण मानी जाती है।

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