Tuesday, 19 Dec, 1.31 am

कुश्ती
गुरु प्रेमनाथ अखाड़े की कहानी अर्जुन अवार्डी कृपाशंकर बिश्नोई की जुबानी

दिलेर समाचार, जब कुश्ती की बात आती है तो हर भारतीय को उस महान भारतीय पहलवान की याद आती है जिन्होंने देश का नाम हमेशा रोशन किया है । जी हां मैं बात कर रहा हूँ 1972 ओलंपिक खेलो की कुश्ती में काँस्य पदक जीतते-जीतते रह गए स्वर्गीय पहलवान प्रेमनाथ जी की | अपने जमाने के मशहूर पहलवान रहे, अर्जुन अवार्डी गुरु प्रेमनाथ जी कहते थे कि पैसे की कमी से ज़्यादा बड़ी समस्या है खेल संघों और महासंघों पर राजनेताओं और नौकरशाहों का क़ब्ज़ा होना | उन्होंने कहा था की ''जब तक महासंघों के अधिकारी भूतपूर्व और जाने-माने खिलाड़ी नहीं होंगे, तब तक अंतरराष्ट्रीय और ओलंपिक खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत पाना संभव नहीं होगा | आज गुरु प्रेमनाथ जी हमारे बिच नहीं हैं पर उनके महान् आदर्श सदा भारतीय पहलवानों के हृदय को आलोकित करते रहेंगे । सच्चे अर्थों में भारत की मिट्टी के महान सपूत की मृदुल स्मृतियाँ भारत के कुश्ती समाज को अलौकिक सुगंध से सदा सराबोर रखेंगी । प्रेमनाथ जी पर हम सबको गर्व है | स्वर्गीय प्रेमनाथ जी के बाद उनके पुत्र विक्रम कुमार अखाड़े की परम्परा को आगे बड़ा रहे है |

कुश्ती के लिए छोड़ी नौकरी - विक्रम कुमार

ओलंपियन पिता के सपने को पूरा करने में लगे विक्रम कुमार बताते है की मेरे पिता व गुरु प्रेमनाथ जी की इच्छा थी कि प्रेमनाथ अखाड़े से कोई पहलवान ओलम्पिक पदक जीते । इसी मुहिम में मैंने पिता के ओलम्पिक मेडल जितने के सपने को पूरा करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है । मेरे पिता कहते थे की कर्म ही इंसान की सही पहचान होती है आज दुनिया में आप किसी भी इंसान को देखो अगर वह कुछ भी पाता है तो अपने कर्मों के दम पर पाता है | गुरु प्रेमनाथ अखाड़े के एक भूतपूर्व पहलवान बताते है की विक्रम के पिता के जाने के बाद विक्रम को कई समस्याओं का सामना करना पडा | पर वह घबराए नहीं और अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के चलते उन्होंने अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण की नौकरी भी छोड़ दी और अपने पिता का अखाड़ा सम्भालने लगे | उनसे ट्रेनिंग प्राप्त कर आज गुरु प्रेमनाथ अखाड़े से कई अन्तराष्ट्रीय महिला पहलवान देश का नाम रोशन कर रही है | इस अखाड़े में अभ्यासरत महिला पहलवान दिव्या काकरान, इंदु चौधरी, सिमरन, उन्नति राठौर, खुशी सोनकर और रौशनी के अन्तराष्ट्रीय कुश्ती में इतिहास रचने के पीछे उनके कोच विक्रम सिंह का बड़ा योगदान मानती हैं |

पहलवान तो पहलवान कोच सुभानअल्लाह

कुश्ती की दुनिया में भारतीय पहलवान प्रेमनाथ जी को कौन नहीं जानता, उनको इस दुनिया से गए दो साल बीत चुके हैं लेकिन अभी भी ऐसा लगता है उनके द्वारा सिखाये गुण आज भी हमारे बीच हैं ।

इसी लिए लोग कहने लगे है की देश का एक ऐसा अखाड़ा जहा पहलवान तो पहलवान कोच भी मैदान में उतरते हैं तो पदक जीत लेते है | 2014 में कामिनी यादव भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) की कोच बनीं और फिलहाल दिल्ली के गुरु प्रेमनाथ अखाड़े में 30 महिला पहलवानों को विक्रम कुमार के साथ प्रशिक्षित कर रही हैं | अभ्यास देते-देते कोच कामनी यादव इतनी फिट हो गई की 2017 की राष्ट्रीय सीनियर कुश्ती प्रतियोगिता में वे 72 किलोग्राम भार वर्ग में उतरीं और कास्य पदक भी जीत गई | वे इसे गुरु प्रेमनाथ जी का आशीवाद और अखाड़े की अलौकिक शक्ति का नतीजा मानती है |

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