Dailyhunt
आम आदमी पार्टी के विखंडन की दिशा - Divya Himachal

आम आदमी पार्टी के विखंडन की दिशा - Divya Himachal

Divya Himachal 1 week ago

दिल्ली विधानसभा के 2025 में चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी पराजित हो गई। यह आम आदमी पार्टी के नाम पर केजरीवाल की योजना के लिए गहरा आघात था…

आम आदमी पार्टी के गठन के पीछे किसकी योजना थी और क्या उद्देश्य था, इसको लेकर उन्हीं दिनों से माथापच्ची हो रही है जब से दिल्ली के रामलीला मैदान में महाराष्ट्र से अन्ना हजारे को लाकर बिठा दिया गया था और तीव्र गति से उसका नेतृत्व अरविंद केजरीवाल ने संभाल लिया था।

अनेक उद्देश्यों में से एक उद्देश्य इस भय में से उपजा था कि जिस प्रकार की परिस्थितियां कांग्रेस शासन के भ्रष्टाचार को लेकर बनती जा रही थीं, उससे लगता था कि कांग्रेस की पराजय निश्चित ही थी। असली भय यह था कि कांग्रेस के संभावित पतन से उत्पन्न हुए शून्य को कौनसी राजनीतिक पार्टी भर सकती है। ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही थी कि यह शून्य भारतीय जनता पार्टी भर सकती थी। लेकिन पश्चिम में 'क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन' को लेकर जिस प्रकार की बहस छिड़ चुकी थी, उस वातावरण में यह प्रश्न भी बहस में आने लगा था कि यदि भारत में भाजपा सत्ता के केन्द्र में आ जाती है तो 'क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन' की बहस में भारत भी तीसरा पक्ष बन सकता है। शायद इसीलिए बहुत ही जल्दी में अरविंद केजरीवाल और उनके मित्र मनीष सिसोदिया को मैदान में उतारा गया। निराकार को साकार रूप देने के लिए उसके ऊपर आम आदमी पार्टी का नाम चस्पां कर दिया गया। उन दिनों ये आरोप भी लगे थे कि तुरत फुरत नई पार्टी बनाने और संवारने के लिए किसी एनजीओ के नाम से किसी अमरीकी फाऊंडेशन ने पैसा मुहैया करवाया था। जब चर्चा बहुत चल पड़ी तो केजरीवाल ने कुछ इस प्रकार का खंडन भी किया था कि पैसा वापस कर दिया गया था। केजरीवाल और उसका कद रातों रात बड़ा करना था, इसलिए केजरीवाल ने सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह इत्यादि को ही निशाने पर रखा।

मीडिया ने बड़ी मेहनत से हवा बनाना शुरू कर दिया कि सत्तारूढ़ कांग्रेस का विकल्प आम आदमी पार्टी ही है। यहां यह ध्यान में रखना चाहिए कि जब केजरीवाल और उनके मित्र मनीष सिसोदिया ने आम आदमी पार्टी का रूप धारण करना शुरू कर दिया था तो अन्ना हजारे को भी शक पडऩे लगा था कि उनका किसी गहरी साजिश में दुरुपयोग किया गया है। वे वापस महाराष्ट्र चले गए थे। यह मानना पड़ेगा कि केजरीवाल और सिसोदिया की रणनीति पहले चरण में तो कामयाब ही रही। दिसंबर 2023 में जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ दिया। उनकी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित केजरीवाल के हाथों पराजित हुई। यह ठीक है कि कोई भी पार्टी बहुमत प्राप्त नहीं कर सकी। कांग्रेस को केवल 8, भाजपा को 31 और आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिलीं। जिस प्रकार अन्ना हजारे का उपयोग शून्य में से एक नए राजनीतिक दल को आकार देने के लिए किया गया, इसी प्रकार अब कांग्रेस पार्टी का ही उपयोग केजरीवाल का कद बढ़ाने के लिए किया गया। कांग्रेस ने यह आत्मघाती भूल खुद की या किसी के इशारे पर, यह तो इशारे करने वाले या इशारे समझने वाले ही जानें, लेकिन कांग्रेस ने केजरीवाल को दिल्ली में सरकार बनाने के लिए अपने आठ विधायकों का समर्थन दे दिया और केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए। अब तक केजरीवाल की छवि भ्रष्टाचार के विरोध में एक कट्टर ईमानदार व्यक्ति की बनाई गई थी। लेकिन अब उनको लांच करने के दूसरे चरण पर काम शुरू हो गया। अब उन पर महात्मा का आकार चस्पां करना था। सत्ता के लालच से दूर रहने वाला महापुरुष। सत्ता को ठोकर मार देने वाला महात्मा। इस प्रकार की छवि के लिए सत्याग्रह करना लाजिमी होता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री भरी सर्दी की रात्रि में भी सडक़ पर ही सत्याग्रही की मुद्रा में आ गए। कांग्रेस ने केजरीवाल को समर्थन दिया था। लेकिन केजरीवाल ने दिल्ली की जनता की खातिर कांग्रेस का वह समर्थन वापस कर दिया। मुख्यमंत्री की गद्दी को लात मार दी। विधानसभा भंग हो गई। दरअसल लोकसभा के चुनाव सिर पर आ गए थे।

केजरीवाल देश में विकल्प के तौर पर उतरे थे या उतारे गए थे। इसलिए पूरे देश में आकार ग्रहण करने के लिए त्याग के इस अनुपम उदाहरण का प्रदर्शन अनिवार्य था। केजरीवाल की पार्टी ने पूरे देश भर में लोकसभा के लिए अपने प्रत्याशी उतार दिए थे। वे स्वयं वाराणसी में नरेंद्र मोदी के मुकाबले में आ गए थे। कुमार विश्वास को राहुल गांधी के खिलाफ उतारा गया। लेकिन इस समय अमरीका के मीडिया की सक्रियता देखते ही बनती थी। उनका निष्कर्ष था कि आम आदमी पार्टी भारत में कांग्रेस का विकल्प बन कर उभर आई है। अब चिन्ता की जरूरत नहीं है। केवल पंजाब में आम आदमी पार्टी के चार सदस्य चुने गए जिनमें से भगवंत मान भी एक थे। बाकी सारे भारत में अरविंद केजरीवाल समेत सभी की जमानतें जब्त हो गई थीं। चुनाव नतीजों ने बताया कि कांग्रेस का विकल्प भारत के लोगों ने भारतीय जनता पार्टी को माना है। 'क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन' पर माथापच्ची करने वालों के लिए सबसे बड़ी चिन्ता भी यही थी। भाजपा के आने का अर्थ था केन्द्र में सशक्त सरकार का स्थापित ही नहीं हो जाना, बल्कि भारत का पुन: अपने सांस्कृतिक सूत्रों को मजबूत करना। लेकिन कांग्रेस ने जो गलती केजरीवाल को मुख्यमंत्री की पहचान देकर की थी, अब उसके परिणाम आने शुरू हुए। 2015 में दिल्ली विधानसभा के लिए पुन: चुनाव हुए तो कांग्रेस का तो एक भी प्रत्याशी जीत नहीं सका। 70 में से आम आदमी पार्टी ने 67 सीटें जीत लीं। भाजपा को केवल तीन सीटें मिलीं। आम आदमी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और केजरीवाल पुन: मुख्यमंत्री बन गए। वे समझ गए थे कि अब उनको अपनी पार्टी में से उन सभी की छंटाई करनी है जो अपने पैरों पर खड़े हैं, केजरीवाल से बराबर बैठ कर बात करते हैं, जिनका यह भ्रम अभी तक बना हुआ है कि आम आदमी पार्टी आंदोलन से निकली थी और वे स्वयं इस तथाकथित क्रान्ति के हिस्सेदार थे। केजरीवाल को पता था कि आन्दोलन का ड्रामा पार्टी के जन्म की पूर्व निर्धारित योजना और स्क्रिप्ट को गरिमा प्रदान करने के लिए किया गया था। प्रशांत भूषण, आशुतोष, योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास, प्रो. आनन्द कुमार इत्यादि सभी को निकाल दिया गया या निकल गए। वैसे भी अब तक यह स्पष्ट होने लगा था कि आम आदमी पार्टी का जन्म भारतीय राजनीति में से विचार, चिन्तन व सांस्कृतिक पक्ष को निकाल कर साम्यवादी दर्शन की तर्ज पर भौतिक पक्ष को स्थापित करना है।

2017 में पंजाब विधानसभा के चुनाव में केजरीवाल ने एक बार फिर स्वयं को अखिल भारतीय कद के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। पंजाब विधानसभा के चुनावों में केजरीवाल ने अपने इर्द-गिर्द प्रचार सीमित कर आम आदमी पार्टी को मैदान में उतारा। अब यह बताने की कोई जरूरत नहीं है कि इस चुनाव में अमरीका व कनाडा से जरूरत से ज्यादा सक्रियता दिखाई गई थी। आम आदमी पार्टी ने बीस सीटें जीतीं। अमरीका व कनाडा में सक्रिय लोग सरकार की आशा लगाए बैठे थे। जब सरकार नहीं बनी तो अनेक विधायक भी इधर-उधर चले गए। लोकसभा के चार सदस्यों में से भी केवल भगवंत मान ही खड़े रहे। बाकी ने अपना-अपना रास्ता पकड़ा। 2019 के लोकसभा चुनाव में पंजाब से आम आदमी पार्टी से केवल भगवंत मान ही जीत सके। लेकिन अब तक केजरीवाल ने अपना असली रंग भी दिखाना शुरू कर दिया था। शराब के मामले में केजरीवाल ने 'शराब की एक बोतल लेने पर एक मुफ्त' की जो जन कल्याणकारी योजना शुरू की और उन फ्री बोतलों के पीछे जो पैसे का खेला हुआ, उसके चलते केजरीवाल, उसके उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, दूसरे मंत्री सत्येन्द्र जैन को लम्बे अरसे तक जेल में जाना पड़ा। मुकद्दमे अभी भी कोर्ट कचहरियों में चले हुए हैं। इसके चलते दिल्ली विधानसभा के 2025 में चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी पराजित हो गई। केजरीवाल खुद भी हार गए। यह आम आदमी पार्टी के नाम पर केजरीवाल की योजना के लिए गहरा आघात था। अब आप के कुछ सांसद भाजपा में चले गए हैं और नए समीकरण बन रहे हैं।

कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

ईमेल: kuldeepagnihotri@gmail.com


Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Divya Himachal