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अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना - Divya Himachal

Divya Himachal 1 week ago

हां जो लोग हमें मिलते हैं, उनकी निपुणता अपना प्रशस्ति गायन स्वयं करने में होती है। अपने मुंह मियां मि_ू बनना इतनी पुरानी कहावत हो गई है कि अब तो बच्चे भी इसे नहीं दोहराते। हमें लगता है कि अपना प्रशस्ति गायन करना और करते रहना अब एक ऐसी कला में बदल गया है, कि ये लोग अपनी शान में कसीदे पढ़ते हुए तनिक भी नहीं झिझकते, और फिर उम्र भर यही विश्वास जीते चले जाते हैं, कि ये सब गुण उनमें सदा से थे, आपको ही नजर नहीं आए।

यह बात केवल एक व्यक्ति के लिए ही नहीं, पूरे देश पर लागू हो रही है। हम अपने देश को सबसे बड़ा गणतंत्र बताते हुए तनिक भी नहीं झिझकते। दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र, लेकिन यह सबसे उत्तम भी है क्या? इसका उत्तर इसका कोई पैरोकार नहीं देता। कभी 77 वर्ष पहले जब इस देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना का संविधान घोषित हुआ था, तब सबको विश्वास था कि जनाब इतना प्राचीन और पवित्र देश है कि आज भी इस देश में वैदिक ऋचाएं गूंजती रहती हैं। नैतिक मूल्यों का वर्चस्व है। देश आजाद हो गया है। अब तो राजमुकुट एक साधारण से साधारण आदमी भी पहन सकेगा। जनता का राज आ गया है। अब एक किसान और मजूर का बेटा भी सत्तारूढ़ होकर सबके भले के लिए सोच सकेगा। विशेषकर अपनी उन कठिनाइयों का समाधान अवश्य कर लेगा, जो सदियों से यहां लंबित हैं, और जिनका समाधान न होने का धीरज हम सबने अब पैदा कर लिया है। लीजिये साहब तीन चौथाई से ज्यादा सदी गुजर गई। हम लोग मेलों ठेलों में यकीन करते हैं न, इसलिए इस आजादी को अमृत कह उसका महोत्सव भी हमने मना लिया। बोलने की आजादी मिल गई है। मुखर अभिव्यक्ति से गदगद लोगों ने एक दूसरे की टांग खिंचाई करते हुए सबको बताया।

अपनी प्रशंसा में मुग्ध देश आज भी आश्वस्त है, और इस महान देश के एक सौ चालीस करोड़ लोग भी कि 'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा', चाहे बाद में इसे रचने वाले इकबाल साहिब स्वयं ही इस रचना पर शर्मसार हो गए, और अपने हिस्से का देश बांट उसे पाकिस्तान का नाम दे उसका प्रशस्ति गायन रचने लगे थे। इसका अर्थ यह हुआ कि लोगों का प्रशस्ति गायन मौके, स्थिति और जगह के अनुसार बदल जाता है। आज जो सर्वोपरि है, उसे वक्त बदलने पर धूल में मिलाते उन्हें देर नहीं लगती। जनता का राज्य आ गया। अपनी मत पर्ची और अब अपनी इच्छा का बटन दबा कर हम सरकारें बदलते रहे, कुर्सियां पाने के लिए 'आया राम की, गया राम से' छीन-झपट होने लगी। राजनीति का दर्शन 'गंगा गए तो गंगा राम और जमना गए तो जमना दास' हो गया। जनता के प्रतिनिधि अब राजमुकुट नहीं पहनते, लेकिन उनके परिचय ब्यौरों में आज भी करोड़पति हो जाने की ताकत है और उनके दामन पर अपराध के आरोपों के छींटे हैं। जो मुफलिस था, वह तो बेचारा आज भी मुफलिस है और गरीब के घर पीढ़ी दर पीढ़ी फटीचर पैदा होते रहे। लेकिन जनतंत्र के नाम पर धाकड़ और बड़बोले नेताओं का जयघोष गूंजने लगा। पहले लोग राजवंशों के पीछे-पीछे उनकी चादर उठा कर चलते थे, अब नेता जी का पोर्टफोलियो उठा कर साथ चलते हुए गर्वित महसूस करते हैं। हां, एक अन्तर अवश्य आया है। ये उदारमना नेता चुनाव के दिनों में जब कभी-कभार उनकी बस्तियों में पधारते हैं तो उन्हें अपने गले से लगा लेते हैं। अखबार में उसका चित्र छपवा सबको संदेश दे देते हैं, 'भैया, हम कितने सहज और विनम्र हैं।' और उधर जो कतार में पीछे छूट गया था, वह आज भी वहीं खड़ा है।

सुरेश सेठ

sethsuresh25U@gmail.com


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