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बरसात आने की खबर - Divya Himachal

Divya Himachal 4 days ago

रसात की तैयारियों में पिछले जख्म सता रहे, जबकि घूंघट ओढ़े विकास के मुहाने गर्दन छुपा रहे। चंबा-भरमौर एनएच पर पहाड़ी से गिरकर चट्टान ने बस को शिकार बना लिया, तो एक यात्री की मौत हो गई।

बरसात आने की खबरें अगर दुर्घटनाएं दे रही हैं, तो हमारे मुगालते हमीं के खिलाफ खड़े हैं। मटौर-कांगड़ा के बीच सैकड़ों वाहनों की आवाजाही पर आदेश यह कि सडक़ के किनारे खोद दिए और अब फिसलती बसें या दो पहिया वाहनों के लिए बच के निकलना मुश्किल हो रहा है। बरसात में बच के निकलने की प्रतियोगिता चलती है और अब यह दौर पुन: दोहराया जाएगा। पिछली बरसात के जख्म फिर से आसमान से भयभीत हैं, तो फोरलेन कार्यों की बढ़ती अवधि ने खेल बिगाड़ा है। नूरपूर, मलां, ज्वालाजी, शिमला, कुल्लू या मलां-पालमपुर की तरफ वाहनों की कसरतें जानलेवा मुसीबत में फंसी हैं। कांगड़ा से पुरानी सुरंग तक सफर अगर बदनुमा धब्बा है, तो फोरलेन पर रियूंड का पुल निर्माण का रहस्य जारी है। कब जसूर और मलां के फलाईओवर अपनी वास्तविक संरचना के गीत गाएंगे, कोई नहीं जानता। यहां ज़फर का दुख और अमीर खुसरो के सूफी अंदाज में वर्णन करें या यह देखें कि हिमाचल भरी बरसात में कौन सा राग गाएगा। धर्मशाला की पिछली बरसात ने बाइपास व खड़ा डंडा मार्ग को निगला, तो सुधेड़-चड़ी मार्ग की चौड़ाई में भूस्खलन की दीवार खड़ी हो गई। साल भर वाहन रेंगते रहे, तो अब हालात की दुश्मन बारिश का क्या भरोसा कि कब चीर के रख दे। इस दौरान अदालतें बोलती रहीं, जनता फरियाद करती रही, मगर दामन की सिसकियां अब पुन: लाचार व मायूस हैं। आखिर भूस्खलन राज्य की बदनसीबी में परिवर्तित क्यों हो रहा है, तो दर्द के कई बही खाते, केंद्र सरकार को कोसेंगे।

देश के प्रधानमंत्री ने पिछली बरसात के आंसू पोंछने के लिए जिन पंद्रह सौ करोड़ की घोषणा की थी, वे रुपए कौन सी सियासत ने लूट लिए। त्रासदी का इससे बड़ा उपहास और क्या होगा कि देश के मुखिया की घोषणा ही पूरी नहीं हुई। जलाधिकारों के राजनय पर सिंधु जल संधि से पाकिस्तान का जीना हराम हो सकता है, तो देश के पर्वतीय राज्यों को जल शक्ति का सम्मान जरूरी है। हिमाचल की बांध परियोजनाएं लबालब होंगी तो, वाटर गेट खोल कर पंडोह का उफनता पानी कब तक नूरपुर के खेतों को डुबोएगा। बरसात अगर पानी का भंडारण करती है, तो पहाड़ से मैदान तक के रिश्तों की हिफाजत की सूचना भी तो है। यह केंद्रीय संसाधनों का बंटवारा है, जो पानी को केवल राष्ट्रीय जरूरत में देखता, लेकिन मुसीबत को यह नहीं बांटता। हिमाचल की वन भूमि के कारण सडक़ निर्माण, बरसात का रिसाब और पानी का हिसाब नहीं होने देता। जंगल को अगर जंगल होना है तो इसे गर्मियों में आग, बरसात में बाढ़ तथा भूस्खलन रोकना होगा। पर्वतीय राज्यों को बरसात के महीने इमरजेंसी में गुजारने की शक्ति केवल केंद्र ही दे सकता है। इसके लिए अनुकूल अध्ययन, शोध, संरचना और अधोसंरचना की जरूरत है ताकि फोरलेन सरीखी परियोजनाएं, सुरंग परियोजनाएं, विमान सेवाएं तथा रेलवे विस्तार अति सुरक्षित हो, वरना पहाडिय़ां ढहती रहेंगी और द्रमण से सिहुंता-चुवाड़ी, पांवटा से शिलाई, रोहड़ू से चौपाल कुल्लू से आनी और निरमंड के बीच रास्तों पर मलबे के ढेर हमें जीने नहीं देंगे। ऐसे में सभी विभागों की तालमेल और रणनीतिक कौशल से ही ये तीन महीने आसानी से गुजर पाएंगे।


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