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भारत का आर्थिक यथार्थ - Divya Himachal

Divya Himachal 2 weeks ago

किसी ने कहा कि भारत में जल्द ही 'आर्थिक सुनामी' आने वाली है। कोई हमारी अर्थव्यवस्था के स्व-निर्मित आंकड़े गिनाता है और 'मृत अर्थव्यवस्था' करार देने की कोशिश करता है।

किसी अर्थशास्त्री का शोधात्मक अध्ययन है कि देश में 12 करोड़ से अधिक लोग ऐसे हैं, जो न तो पढ़ रहे हैं और न ही उनके पास कोई काम है। मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटे को लेकर अलग-अलग आंकड़े और दावे हैं। बेशक आकलन भिन्न हैं, लेकिन सारांश यही है कि भारत आज विश्व की सबसे तेज और उभरती अर्थव्यवस्था है। भारत आज विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के 'टैरिफवाद', विश्व व्यापार की बदलती और बिगड़ती व्यवस्था और अब भी जारी ईरान युद्ध के बावजूद वित्त वर्ष 2026 में भारत की आर्थिक विकास दर 7.7 फीसदी रही है। मुद्रास्फीति करीब 2 फीसदी है, जो पांच दशकों में सबसे कम है। चौतरफा संकटों के बावजूद चालू खाता घाटा जीडीपी का मात्र 0.6 फीसदी रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार जून में करीब 688 अरब डॉलर रहा, जो सशक्त अर्थव्यवस्था और निवेश का सूचक है। यह भंडार 700 अरब डॉलर से अधिक था, लेकिन ईरान युद्ध के कारण सप्लाई चेन बाधित हुई, कच्चे तेल के दाम बढ़े, लिहाजा हमारा आयात-बिल भी बढ़ गया, नतीजतन डॉलर के भंडार में कुछ कमी आई। विपरीत स्थितियों के बावजूद भारत का निर्यात (वस्तुएं और सेवाएं मिला कर) करीब 4 फीसदी बढ़ा है। यह अप्रैल-मई में करीब 15 फीसदी था। विदेशों में बसे और काम कर रहे प्रवासी भारतीय जो धन अपने माता-पिता, घरों को भेजते हैं, वह राशि करीब 140 अरब डॉलर है, जो सर्वकालिक अधिकतम है। यह भारतीय जीडीपी के 3.5-4 फीसदी के बराबर है।

क्या ऐसी अर्थव्यवस्था को 'संकटग्रस्त' करार दे सकते हैं अथवा 'सुनामी' के आंशिक संकेत भी मिल सकते हैं? हमारा राजकोषीय घाटा भी कम हुआ है। केंद्र सरकार का ऐसा घाटा जीडीपी के 4.4 फीसदी के समान है। बजट में भी यही लक्ष्य तय किया गया था। हालांकि राज्य सरकारों के साथ संयुक्त राजकोषीय घाटा 7.7 फीसदी के करीब है। यह घाटा भी बहुत ज्यादा है। यह 4 फीसदी से कम होना चाहिए। दरअसल यही भारतीय अर्थव्यवस्था का सारांश यथार्थ है, जो 'गुलाबी' लगता है। कई संदर्भों में 'हरा' भी प्रतीत होता है, जो गतिशीलता का प्रतीक है। बहरहाल अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ सवाल किए जा सकते हैं। मसलन-औसत घरेलू मांग कम क्यों है? क्या देश के आम नागरिक की क्रय-शक्ति घटी या सीमित है? मांग का सीधा असर बाज़ार, उत्पादन, रोजग़ार पर पड़ता है। भारत में बेरोजग़ारी दर के बजाय रोजग़ार की दर एक अहम चिंतित सरोकार है। सरकारी एजेंसियां और संस्थाएं रोजग़ार की दर का खुलासा नहीं करतीं। बेरोजग़ारी दर आनुपातिक तौर पर कम हो जाती है। सरकारें उसी पर अपने गाल बजाने लगती हैं। सरकारी रपटों में ऐसे आकलन के दो मानदंड हैं। मार्च, 2026 में 15-59 साल आयु-वर्ग के 100 में से करीब 39 फीसदी लोगों के पास रोजगार था। करीब 10 साल पहले यही औसत करीब 43 फीसदी था। जाहिर है कि भारत में रोजगार घटे हैं। मान लीजिए कि देश में 15 साल से ऊपर की उम्र वाले 60 फीसदी लोग हैं। सरकारी भाषा में उन्हें 'कार्य-बल' माना जाता है। यदि उनमें से औसतन 10 फीसदी पढ़ रहे हैं अथवा काम की तलाश में थक चुके हैं, तो श्रम-बल 50 फीसदी मान लिया जाता है। यदि श्रम-बल में 10 फीसदी बेरोजगार हैं, तो सरकार मानेगी कि 5 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो काम की तलाश में हैं, लेकिन काम मिल नहीं पा रहा है। उस स्थिति में श्रम-बल 50 से घट कर 45 फीसदी हो जाएगा। बेरोजगारी दर 'शून्य' मान ली जाएगी।

आखिर सरकार कार्य-बल बनाम श्रम-बल का विभाजन क्यों करती है? काम दोनों वर्गों को चाहिए। बेरोजगारी के आंकड़े कम दिखाने के मद्देनजर ऐसी कवायद की जाती रही है। देश जान ही नहीं पाता कि कामकाजी आयु-वर्ग में रोजगार की हताशा कितनी है और बेरोजगारी वाकई में कितनी भयावह है? देश की अर्थव्यवस्था व्यापक हो सकती है, हमारी वैश्विक औसत महत्त्वपूर्ण हो सकती है, हम विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था भी बन सकते हैं, लेकिन उससे आम भारतीय की जिंदगी बेहतर नहीं होगी। मकसद बेहतरी का होना चाहिए, न कि आंकड़ों की गिनती का। सरकार को बेरोजगारी को दूर करने के लिए उचित प्रयास करने चाहिए। तेजी से बढ़ते आर्थिक विकास के बावजूद रोजगार विहीन विकास एक बड़ी चिंता है। समावेशी और सतत विकास के माध्यम से इन चुनौतियों का समाधान करना भारत की आर्थिक प्रगति के लिए महत्तवपूर्ण है।


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