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बिना वजह की लड़ाई का बेनतीजा अंत - Divya Himachal

बिना वजह की लड़ाई का बेनतीजा अंत - Divya Himachal

Divya Himachal 1 week ago

ई यूरोपीय देशों ने युद्ध के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। हालांकि, कई अन्य देशों की सरकारें ईरान के खिलाफ अमरीका की आक्रमकता के बारे में बोलने से खुद को रोक रही थीं, लेकिन भारत सहित कई देशों के लोगों और मीडिया ने इस 'अन्यायपूर्ण' युद्ध के खिलाफ भरपूर आवाज उठाई।

कई खाड़ी देश, जिन्हें इस युद्ध के कारण नुकसान उठाना पड़ रहा था, सबसे ज्यादा चिंतित थे…

अब जब संयुक्त राज्य अमरीका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध एक समझौते (मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) के साथ खत्म हो गया है, तो यह विश्लेषण करने का समय है कि इस युद्ध में किसे क्या मिला। हालांकि, जो देश युद्ध में शामिल नहीं होते, उन्हें दुनिया में युद्ध होना कभी पसंद नहीं आता, लेकिन इस बार अमरीका को दुनिया भर से अभूतपूर्व विरोध का सामना करना पड़ा है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बहुत उत्साह के साथ ईरान पर हमला किया था और ईरान को दुनिया में शांति के लिए सबसे बड़ा खलनायक घोषित किया था, साथ ही इस हमले में इजराइल भी शामिल हो गया। यह पहली बार नहीं है जब अमरीका ने दूर-दराज के इलाकों में युद्ध की शुरुआत की हो। कई बार अमरीका विजेता बनकर उभरा और अपने घोषित लक्ष्यों को हासिल किया, लेकिन साथ ही कई बार उसे अपने लक्ष्य हासिल किए बिना ही पीछे हटना पड़ा और आलोचना का सामना करना पड़ा। हाल ही में अफगानिस्तान से अमरीका की वापसी इसी श्रेणी में आती है। 28 फरवरी, 2026 को शुरू हुए इस युद्ध में, ईरान ने शुरुआत में ही अपने सर्वोच्च नेता को खो दिया और उसे भारी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा, फिर भी ईरान ने न केवल हार मानने से इनकार किया, बल्कि अमरीका और इजराइल के खिलाफ जबरदस्त लड़ाई भी लड़ी। हालांकि इस युद्ध के लिए शायद ही दोनों पक्षों को कोई वैश्विक समर्थन मिला हो, लेकिन जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा, अमरीका तेजी से अपने समर्थकों को खोने लगा, जिसमें यूरोप के उसके पारंपरिक समर्थक भी शामिल थे। कई यूरोपीय देशों ने युद्ध के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। हालांकि, कई अन्य देशों की सरकारें ईरान के खिलाफ अमरीका की आक्रमकता के बारे में बोलने से खुद को रोक रही थीं, लेकिन भारत सहित कई देशों के लोगों और मीडिया ने इस 'अन्यायपूर्ण' युद्ध के खिलाफ भरपूर आवाज उठाई। कई खाड़ी देश, जिन्हें इस युद्ध के कारण नुकसान उठाना पड़ रहा था, सबसे ज्यादा चिंतित थे। संघर्ष, अनिश्चितता, बाधित परिवहन और ग्लोबल वैल्यू चेन की आवाजाही, महंगाई आदि जैसे वैश्विक हालात दुनिया में ही नहीं, ट्रंप के घरेलू वोट बैंक पर भी असर डाल रहे थे, जिससे उन्हें युद्ध जारी रखने के बारे में फिर से सोचने पर मजबूर होना पड़ा।

ट्रंप की शांति समझौते के लिए आतुरता- ईरान पर हमला करने के पीछे अमरीका का यह तर्क था कि ईरान एटमी हथियार बनाने की ओर अग्रसर हो रहा है, इसलिए उसे इस काम से रोकना होगा। ईरान को एटमी हथियारों से लैस होने से रोकने हेतु ईरान का 6 अन्य देशों के साथ संयुक्त व्यापक कार्य योजना का प्रयास 2015 में हुआ था, जिसे बाद में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के रूप में अनुमोदित भी कर दिया गया था और उसके बाद संयुक्त राष्ट्र, अमरीका और यूरोप ने ईरान पर आण्विक संबंधी प्रतिबंध हटा दिए थे।

लेकिन वर्ष 2018 में अमरीका इस समझौते से बाहर हो गया और उसने ईरान पर दोबारा प्रतिबंध लगा दिया। बाद में ईरान के एटमी कार्यक्रमों के आगे बढऩे के बाद संयुक्त राष्ट्र ने भी 2025 में ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए थे। अमरीका का ईरान पर हमला उसे कमजोर करते हुए अपने एटमी कार्यक्रमों से रोकने के उद्देश्य से था। लेकिन ईरान ने इस संबंध में झुकने का रास्ता न चुनते हुए अमरीका के उन मित्र खाड़ी देशों, जिन्हें अमरीका ने सुरक्षा की गारंटी दे रखी थी, पर आक्रमण करना शुरू कर दिया। जिन मुल्कों ने कभी इस प्रकार की स्थिति का सामना नहीं किया था, अब उन्हें अमरीका से दोस्ती के कारण बिना वजह नुकसान पहुंच रहा था। जब ईरान ने अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वाले स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में समुद्री यातायात पर रोक लगा दी, जिसके कारण भारत समेत कई देशों के लिए तेल का संकट खड़ा हो गया। ऐसे में अमरीका पर यह दबाव बना कि यदि उसे अपनी वैश्विक छवि को और अधिक धूमिल होने से बचाना है तो उसे युद्ध से बाहर आना ही होगा। दूसरे, चूंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को इसलिए भी खोलना जरूरी हो गया, क्योंकि उसके कारण दुनिया भर में मुद्रा स्फीति का खतरा पैदा हो गया था, जिसका बड़ा असर अमरीका पर भी पड़ रहा था। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को खोलना शांति वार्ताओं का प्रमुख उद्देश्य बन गया। तीसरे, डोनाल्ड ट्रंप को अपने देश अमरीका में भी भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा था। आम जनता का मानना था कि अमरीका ने बिना वजह ईरान के साथ युद्ध छेड़ कर अमरीकी अर्थव्यवस्था के लिए एक संकट तो खड़ा कर ही दिया है, आमजन को भी तेल की बढ़ी कीमतों के कारण भारी नुकसान पहुंच रहा है। अमरीका में मध्यावधि चुनाव नवंबर में होने वाले हैं, ऐसे में ट्रंप की गिरती साख इन चुनाव के नतीजों को प्रभावित कर सकती है। गौरतलब है कि अमरीकी हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव की सभी 435 सीटों और सैनेट की 100 में 35 सीटों के चुनाव इस बार दाव पर है। बड़ी संख्या में विभिन्न राज्यों के गर्वनरों के चुनाव भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। कुल मिलाकर ये चुनाव ट्रंप के लिए जनमत संग्रह माना जा रहा है। इसलिए ट्रंप के लिए जरूरी था कि इन मध्यावधि चुनावों के संबंध में उनके लिए माहौल न बिगड़े। चौथे, अमरीका को यह बात समझ में आ गई थी कि जिस प्रकार ईरान केवल हार मानने के लिए तैयार नहीं था, बल्कि अमरीका की छवि को धूमिल करने का हर संभव प्रयास भी कर रहा था। ऐसे में ईरान के साथ एटमी समझौते हेतु वातावरण बनाने के लिए भी युद्ध को रोका जाना जरूरी था। पांचवें, ट्रंप स्वयं को शांति दूत के नाते स्थापित करने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहे हैं और अपनी एक ऐसी छवि बनाना चाहते थे कि वे युद्ध के मुकाबले वार्ता से शांति स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन ट्रंप की किसी भी हालत में समझौता करने की उत्सुकता पूरी तरह से उजागर हो चुकी थी, जिसके चलते ईरान अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में आ गया था। अमरीका जैसी महाशक्ति के साथ शांति समझौते में ईरान अपनी शर्तें मनवाने में सफल रहा।

अमरीका और ईरान युद्ध खत्म करने और लंबे समय तक शांति बनाए रखने के लिए 14-सूत्रीय समझौते (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर सहमत हो गए हैं। इस समझौते में दोनों देश युद्धविराम, संप्रभुता का सम्मान, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना और सुरक्षित व्यावसायिक नौवहन जैसे मुद्दों पर सहमत हो गए हैं। समझौते का एक मुख्य प्रावधान यह है कि अमरीका ईरान में युद्ध से हुई तबाही के बाद पुनर्निर्माण और बहाली के लिए लगभग 300 अरब डॉलर देने और धीरे-धीरे प्रतिबंध हटाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके बदले में, ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने और अपने संवर्धित यूरेनियम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में रखने का वादा किया है। 60 दिनों के भीतर दोनों देश एक व्यापक समझौते हेतु सहमत हुए हैं। समझौते की शर्तें यह इंगित करती हैं कि ट्रंप को इस समझौते को करने के लिए काफी झुकना पड़ा। सोशल मीडिया में भी राष्ट्रपति ट्रंप की इस रणनीतिक कमजोरी को काफी प्रमुखता से स्थान मिला। शायद अमरीका के इतिहास में किसी भी राष्ट्रपति को उतना विरोध नहीं झेलना पड़ा, जितना पिछले लगभग चार महीनों में ट्रंप को झेलना पड़ा है। सभी देश व्यक्तिगत या राष्ट्रीय अहंकार की लड़ाइयों में उलझने या दूसरे देशों को सैन्य और आर्थिक रूप से गुलाम बनाने की कोशिश करने के बजाय मिलकर इस धरती को रहने के लिए बेहतर जगह बनाएंगे और मानवता के सामने मौजूद असली समस्याओं जैसे पिछड़ापन, गरीबी, भुखमरी, पर्यावरण का नुकसान और ग्लोबल वार्मिंग,को हल करेंगे। शांति समझौते में भी, साढ़े तीन महीने की भीषण लड़ाई के बाद, सभी पक्ष देशों की संप्रभुता का सम्मान करने पर सहमत हुए हैं, तो क्यों न यह काम बिना युद्ध के ही किया जाए।

डा. अश्वनी महाजन

पूर्व प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय


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