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छिलकों की छाबड़ी : तीसमार खां बनने का जुगाड़ - Divya Himachal

Divya Himachal 6 days ago

हां काम से प्रचार का महत्त्व अधिक हो गया है। उपलब्धि से अधिक सफलता की घोषणा का। राजनीति में रहना है तो पहले तीसमार खां का जयघोष करना सीखो, और फिर जल्द से जल्द अपना जयघोष करवा के तीसमार खां को पछाडऩा सीखो।

तीसमार खां बने रहना किसी का जन्म सिद्ध अधिकार नहीं, जबकि परिवारवादी तो यही चाहते हैं कि अगर आज, किसी तरह साम दाम दंड भेद से वे तीसमार खां बन गए हैं, तो उनके नाती-पोते भी यही उपाधि धारण किए रहें। परंतु इसके लिए कथनी और करनी में अंतर होना आवश्यक है। गाली परिवारवाद को दो, लेकिन अपने बेटे और पोते का भविष्य संवारने के बाद। कोई आलोचक इस विसंगति के बारे में पूछ बैठे तो उसका मुंह बंद करने के लिए अपनी वंशावली में असाधारण क्षमता का बखान व विश्वास काफी है। अपने आपको बचाने के लिए अपवाद हो सकने का सिद्धांत तैयार-बर-तैयार खड़ा है। यह तो हो गई परिवारवाद के प्रतिबंध से बच निकलने की बात। जहां तक जनता की सेवा से नेतागिरी करने का संबंध है, जनाब, आजकल वे सेवा नहीं, शासन करते हैं। यहां जन-कल्याणकारी जन-अनुकम्पा बांटी जाती है। न्यायपालिका देश को रियायतों भरी रेवडिय़ां न बांटने की बात कहती है। रेवडिय़ों पर अब जन-कल्याण का मुलम्मा लगा दिया गया। इसलिए आम के आम और गुठलियों के दाम हो जाते हैं। गुठलियां अवश्य बांटो, लेकिन अपना पराया देख कर। जो अपने हैं, उनका अंधा-काना भी कबूल और दृष्टिवान अगर कोई है, और अपना नहीं, तो उसकी पहचान नहीं करनी है।

वैसे इस देश में नेतागण चाहे देश के लोगों के हमदर्द, हमराज और मेहरबान कहलाते हैं, लेकिन केवल चुनाव के दिनों में। तब उन्हें वोटरों की घिसी हुई चौखट की पहचान भी भलीभांति हो जाती है। अपनी जाति अपने धर्म के लोग ही उपकार योग्य हैं। पचहत्तर वर्ष से धर्मनिरपेक्ष घोषित देश की यही प्राथमिकता बन गई है। उन्हीं की दहलीज पहचानो और उनके गलत कामों को सही करवा देने का वायदा करो, वोट तुम्हें गठरों में पड़ जाएंगे। जीत गए तो चुनाव करवाने वाली मशीनों का जय-जयकार, हार गए तो इन मशीनों में दोष ही दोष। 'चुनाव मशीन से नहीं, बैलेट से करवाओ' का नारा उठाओ। यह जीतना भी एक भ्रम से पैदा होता है। लोगों में अपने आप को उनका अनन्य सेवक होने का भ्रम पैदा करो, या उनके गलत काम सही करवाने वाला। जितना अधिक गलत लोगों का समर्थन बटोर सको, उतना ही अपनी विजय निश्चित जानो। जनता के लिए अपना सब कुछ लुटा सकने की भावना रखने वाले तो अपनी जमानत जब्त करवाते नजर आते हैं। अपनी लीपापोती में माहिर, हर दिन नई क्रांति या नया अभियान शुरू कर सकने वाला राजनीति में लंबी पारी और जनता के पहाड़ पर अपनी पक्की कुर्सी जमाता नजर आता है। बन्धु, यह तो पूरे का पूरा कुर्सी का खेल है। इसके लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अभियान शुरू करने की घोषणा तुम्हारा नित्य कर्म होना चाहिए। इससे निबटना तुम्हारी दक्षता। ऐ बयान धर्मी नेताओं, यह न देखना कि तुम्हारे पिछले घोषित क्रांति अभियान का क्या हश्र हुआ? लगता है इसके तो मील पत्थर भी उठा कर लोग ले गए। हां तुम्हारी नई क्रांति की घोषणा से दिग-दिगन्त अवश्य गूंजते रहे हैं। जैसे नया कोट पहनने पर लोग पुराने कोट को भूल जाते हैं, उसी तरह क्रांति का नया नामकरण होते ही लोग पुरानी उद्घोषणा भूल जाते हैं, क्योंकि पौन सदी से इस नित्य के क्रांति घोषक युग में लोग तो वहां के वहां ही खड़े हैं। क्रांति घोषणाएं होती हैं, और उनके कान के पास से सर्रा कर निकल जाती हैं। यहां बासी कढ़ी में कभी उबाल नहीं आता और न ही कभी आएगा।

सुरेश सेठ

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