निकाय-पंचायती राज चुनाव: नामांकन नियमों में बदलाव, कई वर्गों को राहत तो कई पर लगी रोक
दिव्य हिमाचल ब्यूरो - बिलासपुर
प्रदेश में होने जा रहे निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव के लिए इस बार नामांकन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
इसके पीछे बाकायदा तर्क दिया गया है। नई शर्तों के अनुसार कुछ श्रेणियों को चुनाव लडऩे की अनुमति दी गई है, जबकि कई वर्गों को इससे बाहर रखा गया है, जिससे उनमें निराशा देखी जा रही है। नई व्यवस्था के तहत आंगनबाड़ी वर्कर और हेल्पर को चुनाव लडऩे की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा मिड डे मील वर्कर और वाटर कैरियर भी इस बार चुनावी मैदान में नहीं उतर सकेंगे। इसी तरह कोऑपरेटिव सोसाइटी के सेल्समैन और सचिवों को भी चुनाव लडऩे से वंचित रखा गया है। हालांकि सरकार ने कुछ वर्गों को राहत भी दी है। डिपो होल्डर के लिए चुनाव लडऩे पर कोई रोक नहीं लगाई गई है। इसके साथ ही कृषक मित्रों को भी चुनाव में भाग लेने की अनुमति प्रदान की गई है। आउटसोर्स कर्मियों को भी बड़ी राहत देते हुए उन्हें चुनाव लडऩे के योग्य माना गया है। भूमि कब्जे और रेगुलराइजेशन से जुड़े मामलों में भी सख्त प्रावधान लागू किए गए हैं।
जिन लोगों ने अपने कब्जे को नियमित (रेगुलराइज) करने के लिए आवेदन किया है, वे चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। इस संबंध में माननीय न्यायालय के एक फैसले का हवाला दिया गया है। यदि किसी व्यक्ति का मामला कोर्ट में लंबित है या उसने अवैध कब्जा कर रखा है, तो उसे भी चुनाव लडऩे से अयोग्य माना जाएगा। हालांकि वन भूमि पर कब्जों को लेकर स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 2006 से पहले किए गए कब्जे के रेगुलराइजेशन के लिए आवेदन करने वालों को राहत दी गई है। ऐसे लोग चुनाव लड़ सकते हैं, बशर्ते उनका आवेदन 2006 से पहले का हो। बिलासपुर क्षेत्र में फॉरेस्ट एक्ट 2006 से लागू है जिसके तहत यह प्रावधान रखा गया है। इसके अतिरिक्त, होमगार्ड और लंबरदार को चुनाव लडऩे की अनुमति दी गई है। वहीं, आशा वर्करों के चुनाव लडऩे को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हो पाई है और यह मामला फिलहाल विचाराधीन है।
गाइडलाइन जारी
उपायुक्त जिला निर्वाचन अधिकारी (पंचायत) राहुल कुमार ने बताया कि निकाय और पंचायतीराज चुनाव के लिए नई गाइडलाइन जारी
हुई है।
ये भी डिस्क्वालीफाइड
यदि किसी ने किया हुआ अवैध कब्जा छोड़ दिया है या फिर छोडऩे के लिए तैयार है तो वह भी चुनाव लडऩे के लिए पात्र नहीं है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि सिर्फ हटाने की तैयारी काफी नहीं है। अतिक्रमण पूरी तरह हटाना जरूरी है और अगर दोष साबित हो चुका है तो हटाने के बाद भी 6 साल तक अयोग्यता लग सकती है।

