हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा की धौलाधार की चोटियों के आंचल की छांव तले, धर्मशाला के समीप स्थित माता कुणाल पत्थरी का मंदिर एक ऐसा पवित्र धार्मिक स्थल है, जहां प्रकृति और आस्था का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
स्थानीय लोगों के लिए यह केवल मंदिर नहीं, बल्कि पीढिय़ों से चली आ रही श्रद्धा और लोकविश्वास का केंद्र है। धर्मशाला से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर चाय के हरे-भरे बागानों के बीच स्थित यह मंदिर माता भगवती के स्वरूप को समर्पित है। यहां देवी को कपालेश्वरी के रूप में भी पूजा जाता है। मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यता देवी सती की कथा से संबंधित है। मान्यता है कि राजा दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। माता सती अपने पति भगवान शिव की इच्छा के विरुद्ध पिता के यज्ञ में पहुंचीं। वहां भगवान शिव का अपमान देखकर वह अत्यंत दुखी हुईं और यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। माता सती के वियोग से भगवान शिव अत्यंत व्यथित हो गए। मान्यता के अनुसार वे सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर विचरण करने लगे। भगवान विष्णु ने सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को अलग किया। जिन स्थानों पर उनके अंग गिरे, वे शक्तिपीठों के रूप में प्रतिष्ठित हुए। स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार कुणाल पत्थरी में माता सती का कपाल गिरा था। इसी कारण यहां देवी को कपालेश्वरी के रूप में पूजने की परंपरा है। इस मंदिर की सबसे विशिष्ट पहचान यहां स्थित प्राकृतिक पत्थर की वह आकृति है, जिसमें जल भरा रहता है। श्रद्धालु इसे माता सती के कपाल का प्रतीक मानते हैं।
स्थानीय मान्यता है कि इस प्राकृतिक पात्र में जल का स्तर कम होने पर वर्षा होती है और यह फिर भर जाता है। इस जल को भक्त अत्यंत पवित्र मानते हैं तथा श्रद्धा के साथ इसका उपयोग करते हैं। हालांकि ऐसी मान्यताओं को लोकआस्था के संदर्भ में ही देखना उचित है और इनके औषधीय या चमत्कारिक प्रभावों के बारे में वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक हैं। मंदिर के नाम को लेकर भी स्थानीय जनश्रुतियां जुड़ी हुई हैं। कहा जाता है कि यहां स्थित पत्थर की आकृति पहाड़ी क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक लकड़ी या पत्थर के पात्र जैसी दिखाई देती है, जिसे स्थानीय बोलियों में 'कुणाल' कहा जाता है। इसी से इस जगह का नाम कुणाल पत्थरी पड़ा। कुणाल पत्थरी की सुंदरता का एक बड़ा कारण इसका प्राकृतिक परिवेश है। मंदिर के आसपास चाय के बागान और जंगल हैं, जबकि उत्तर दिशा में धौलाधार की ऊंची पर्वत श्रृंखला दिखाई देती है। सर्दियों में जब चोटियां बर्फ से ढक जाती हैं, तो पूरा दृश्य और भी मनोहारी हो उठता है। श्रद्धालुओं के साथ पर्यटक भी यहां शांति और प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव करने पहुंचते हैं। मंदिर में वर्षभर श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है। नवरात्र सहित विभिन्न धार्मिक अवसरों पर यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु परिवार सहित मां के दरबार में पहुंचते हैं और अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। ऐसे देवस्थल हमारी सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं। इनके संरक्षण के लिए मंदिर की धार्मिक गरिमा के साथ आसपास के जंगलों, चाय बागानों और प्राकृतिक जलस्रोतों की रक्षा भी जरूरी है। स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को धार्मिक आस्था से जोडक़र ही ऐसे स्थलों को आने वाली पीढिय़ों तक सुरक्षित पहुंचाया जा सकता है। धौलाधार की छांव और चाय बागानों की हरियाली के बीच स्थित कुणाल पत्थरी आज भी श्रद्धालुओं को यही संदेश देती प्रतीत होती है कि आस्था केवल मंदिर की चौखट तक सीमित नहीं होती, वह प्रकृति, परंपरा और लोकविश्वास के साथ मिलकर जीवन को अर्थ देती है।
-अनुज कुमार आचार्य, बैजनाथ

