Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story

एक्सटैंशनमेव जयते - Divya Himachal

Divya Himachal 4 days ago

'सरकारें चाहे बदलती रहें, पर उनका ध्येय प्राय: एक ही होता है, अपनों को रेवडिय़ां और दूसरों को जूतों में दाल। अक्सर नई सरकारें पुरानी योजनाओं के नाम बदलकर उन्हें अपने नेताओं के नाम समर्पित कर देती हैं और इसे नवाचार मान लिया जाता है।

जनता एक अनुशासित दर्शक की तरह हर सरकार के हर निर्णय पर तालियां बजाती रहती है, चाहे वह केवल पुरानी बोतल पर नया लेबल चिपकाने का ही उपक्रम क्यों न हो। लगता है, 'इसकी टोपी उसके सिर' कहावत बुज़ुर्गों ने शायद ऐसे ही दृश्य देखकर गढ़ी होगी।' सुबह-सवेरे मोर्निंग वॉक पर निकले झुन्नू लाल जी को मैंने लगभग दौड़ते हुए पकड़ा। वह तमतमाए हुए थे। पूछने पर पता चला कि इस माह रिटायर हो रहे उनसे तीन वरिष्ठ अधिकारियों को साल भर की एक्सटैंशन यानी सेवा विस्तार से नवाज़ा जा रहा है। अगर यह सच हुआ तो वह इस साल के अन्त में बिना किसी प्रमोशन के ही घर सिधार जाएंगे, जबकि उम्र में उनसे कऱीब तीन साल बड़े तीनों अधिकारी उनसे तीन माह बाद कुरसी हल्की करेंगे। इस बात की प्रबल संभावना है कि सेवानिवृत्ति के बाद उन तीनों को किसी आयोग का अध्यक्ष बनाया जा सकता है। पिछले चार सालों से पदोन्नित का इंतज़ार कर रहे जॉन अली बेचारे हर साल मन मसोस कर रह जाते हैं। मैंने उनसे पूछा कि उन्हें अपने वरिष्ठ अधिकारियों के लिए जुटाई जा रही इन रेवडिय़ों का पता कैसे चला तो उन्होंने बताया कि कल रात उनके महकमे के वज़ीर के पीए का उस वक़्त फोन आया जब वह 'पीए' हुए था। जो अधिकारी घुटनों के बल चलने या रेंगने के आदी हैं, केवल उन्हें ही सेवा विस्तार से नवाज़ा जाता है। वर्ना सरकार का बस चले तो ईमानदार अधिकारियों को अनारकली की तरह ईमानदारी, सेवा भावना और कर्तव्यनिष्ठा से प्रेम करने के ज़ुर्म में दीवार में चुनवा दे। वैसे भी मॉडर्न मूल्यों और मान्यताओं के ज़माने में ऐसे लोग एक्सपॉयरड दवाइयों की तरह होते हैं।

मैंने उन्हें कोर्ट जाने की सलाह दी। पर वह बोले, 'यार अगर कोर्ट जाता हूं तो पता नहीं सरकार नौकरी के बचे हुए इन चंद महीनों के लिए प्रदेश के किस कोने में उठाकर फैंक दे। अब इस बुढ़ापे में कौन अकेले रहकर रोटियां बेलेगा? सरकार 'पब्लिक इनट्रेस्ट' में विभाग के किसी भी दफ़्तर में कहीं भी पोस्ट क्रिएट कर सकती है या टेम्परेरी ऑर्डर कर सकती है। बेचारे राज्यपाल को पता ही नहीं होता कि वह कब प्लीज़ हुए हैं। दूसरे यह डर भी बना रहता है कि जब तक कोर्ट से फैसला आए तब तक कहीं भगवान अपने कोर्ट में हाजिऱी देने के लिए न बुला लें।' मैंने कहा, 'तो फिर आपके पास अपनी छाती पर सरकार से मूंग दलवाने के अलावा कोई विकल्प नहीं।' इस पर झुन्नू जी बोले, 'यार, सारी उम्र यही होता रहा है, सब ने मूंग ही दले हैं। घर में बीवी-बच्चों तथा रिश्तेदारों ने और नौकरी में सरकार ने। चहेते सारी उम्र राजधानी में डटे रहे और मैं जगह-जगह की ख़ाक छानता रहा। कई मर्तबा तो बदली के बाद ज्वाईन करने से पहले ही आदेशों में संशोधन हो जाता था और कई बार एक स्टेशन पर चंद दिन काटना ही नसीब हो पाता था। एक बार सरकार ने जिस अधिकारी को दण्डित करने के लिए उन्हें उसकी जगह भेजा था, उसने जुगाड़मैंट में पीएचडी कर रखी थी, वह छह माह के भीतर पुन: उसी स्थान पर आ गया। मुझे कहीं और भेज दिया गया। अब बोलो, दण्डित कौन हुआ?' मैंने उनसे कहा कि वह 'एक्सटेंशनमेव जयते' का मंत्र क्यों नहीं पढ़ते? उन्होंने पूछा कि यह कौन सा मंत्र है और कहां वर्णित है? उनके पूछने पर मैंने बताया, 'यह मंत्र 'चारणोपनिषद' में वर्णित है।

'चारणोपनिषद' आज़ाद भारत की राजनीति और सरकार का वह अद्भुत दार्शनिक ग्रंथ है, जिसमें वर्णित गूढ़ मंत्र सरकारी कर्मचारियों को न केवल अपने वैध सेवाकाल में, बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद भी कुर्सी से चिपके रहने की सिद्धि प्रदान करते हैं। इसमें विस्तार से बताया गया है कि योग्यता, परिश्रम, निष्ठा और नियम-पुस्तिका सीमित उपयोग की वस्तुएं हैं, वास्तविक मोक्ष तो सतत स्तुतिगान, समयोचित नमन, चमचागिरी और अवसरानुकूल चरण-स्पर्श से ही प्राप्त होता है।'

पीए सिद्धार्थ

स्वतंत्र लेखक


Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Divya Himachal