अभी हम सोचते हैं कि हम ही जीवित हैं और बाकी सब संसाधन हैं। यही अहंकार हमें प्रकृति से अलग करता है, पर जब हम देखेंगे कि पत्थर भी जीवित है, जल भी जीवित है, तब हम अलग कैसे रह सकते हैं?
तब हम ब्रह्मांड के साथ साझेदारी में जीएंगे। तब जीवन एक संघर्ष नहीं रहेगा, एक उत्सव बन जाएगा। सच तो यह है कि यह पूरा ब्रह्मांड एक नृत्य है। इलेक्ट्रॉन नृत्य कर रहे हैं, ग्रह नृत्य कर रहे हैं, हमारी धडक़नें नृत्य कर रही हैं। और इस नृत्य में कोई मृत नहीं। मृत्यु केवल एक विराम है, एक ताल का बदलना है। संगीत चलता रहता है। हम उस संगीत को सुनना सीख जाएं तो हमें हर वस्तु में जीवन का स्पर्श मिलेगा। अंतत: हम ऐसा जानेंगे कि 'जीवत सब संसार' कोई सिद्धांत नहीं, एक दृष्टि है। यह दृष्टि हमें विभाजन से एकत्व की ओर ले जाती है। जब हम इस एकत्व को जीते हैं, तब हम केवल जीवित नहीं रहते, हम जीवन बन जाते हैं…
'जीवत सब संसार'- यह वाक्य एक साथ कई आयाम खोल देता है। विज्ञान इसे ऊर्जा की दृष्टि से देखता है, दर्शनशास्त्र इसे ब्रह्मांड की निरंतरता के रूप में समझता है, और अध्यात्म इसे एकत्व के अनुभव के रूप में स्वीकार करता है। यदि हम इन तीनों को साथ रखें, तो एक अद्भुत चित्र उभरता है, एक ऐसा ब्रह्मांड जहां कुछ भी पूर्णत: निष्क्रिय नहीं, सब कुछ किसी न किसी स्तर पर सक्रिय और स्पंदित है, लगातार धडक़ रहा है। जीवन को हमने बहुत छोटा कर दिया है। हमने उसे दिल की धडक़न तक सीमित कर दिया है, श्वास की आवाजाही तक सीमित कर दिया है। हम कहते हैं, जो सांस लेता है वही जीवित है, जो चलता है वही जीवित है, जो भोजन लेता है वही जीवित है। और जो ऐसा नहीं करता, जो हमारे इन मानकों पर खरा नहीं उतरता, उसे हम 'जड़' कह देते हैं। पर ब्रह्मांड के नियम हमारी परिभाषाओं से नहीं चलते। ब्रह्मांड अपनी लय से चलता है, अपनी धुन में चलता है, और उस धुन में सब कुछ नृत्य कर रहा है, सिर्फ इनसान ही नहीं, सिर्फ पशु-पक्षी ही नहीं, सिर्फ पेड़-पौधे ही नहीं, बल्कि पत्थर भी, पर्वत भी, जल भी, अग्नि भी। हम ऐसा सोचते हैं कि पत्थर मृत है, क्योंकि वह हमारे सामने चल नहीं रहा। पर क्या हमने उसकी भीतरी यात्रा देखी है? हम ऐसा समझते हैं कि जीवन का अर्थ है चेतना का प्रकट रूप। किंतु चेतना का अप्रकट रूप भी तो होता है। विज्ञान कहता है कि संसार की प्रत्येक वस्तु परमाणुओं से बनी है। यह विज्ञान का एक परम सत्य है कि परमाणु के तीन हिस्से होते हैं- प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन। परमाणुओं के भीतर इलेक्ट्रॉन निरंतर गतिमान रहते हैं। यह गति किसी बाहरी शक्ति से संचालित नहीं होती, किसी पुलिस के डंडे से नहीं चलती, यह उसका स्वभाव है।
यदि हम किसी वस्तु को मृत कहते हैं, तो हम यह मान रहे हैं कि उसमें कोई गति नहीं, कोई स्पंदन नहीं, पर विज्ञान हमें बताता है कि स्पंदन सर्वत्र है, हर उस वस्तु में भी है जिसे हमने मृत मान लिया है। जहां स्पंदन है, वहां जीवन का सूक्ष्म बीज है। पत्थर मौन तो है, पर वह मौन होकर भी जीवित है, क्योंकि उसके अंदर के परमाणुओं में भी इलेक्ट्रॉन की गति निरंतर जारी है। एक स्तर पर पत्थर जड़ है, क्योंकि उसमें जैविक वृद्धि नहीं है। किंतु दूसरे स्तर पर वह ऊर्जा का संयोजन है, जो सतत परिवर्तनशील है। वह तापमान से प्रभावित होता है, दाब से बदलता है, रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लेता है। उसका अस्तित्व निष्क्रिय नहीं है। इसी तरह धातु भी स्थिर दिखते हुए गतिमान है, दरअसल इस ब्रह्मांड की हर वस्तु अंदर से गतिमान है। हम ऐसा करेंगे तो नैतिकता का आधार भी परिवर्तित होगा। यदि हम मानें कि समस्त अस्तित्व में किसी स्तर पर जीवन-सदृश सक्रियता है, तो हमारा व्यवहार अधिक संवेदनशील होगा। हम प्रकृति को केवल संसाधन नहीं मानेंगे, बल्कि एक सहभागी सत्ता के रूप में देखेंगे। यह दृष्टिकोण पर्यावरणीय नैतिकता को भी सुदृढ़ करता है। जब हम पृथ्वी को जीवित तंत्र मानते हैं, तब उसका संरक्षण केवल उपयोगिता का प्रश्न नहीं, उत्तरदायित्व का प्रश्न बन जाता है। गड़बड़ यह है कि हमने जीवन को जैविक बना दिया है, पर जीवन उससे भी गहरा है। जीवन कोई बायोलॉजी का चैप्टर नहीं है, जीवन तो ब्रह्मांड की धडक़न है। इस ब्रह्मांड में कुछ भी स्थिर नहीं। स्थिरता केवल हमारी आंखों का भ्रम है।
पहाड़ हमें अचल दिखते हैं, पर वे भी पृथ्वी की गति में शामिल हैं। पृथ्वी स्वयं सूर्य के चारों ओर घूम रही है। सूर्य अपनी आकाशगंगा में यात्रा कर रहा है, और आकाशगंगा भी एक विराट नृत्य का हिस्सा है। फिर स्थिर कौन है? मृत कौन है? हम इसे समझ लेंगे तो हमें एक नई दृष्टि मिलेगी। हम वस्तुओं को उपयोग की चीज की तरह नहीं देखेंगे, बल्कि जीवित ऊर्जा की तरह देखेंगे। तब कुर्सी पर बैठते समय भी हम उसके प्रति संवेदनशील होंगे। तब जल पीते समय हम उसे केवल ऐचटूओ का रासायनिक संयोजन नहीं समझेंगे, बल्कि जीवन की धारा समझेंगे। यह संवेदनशीलता हमें बदल देती है। हम कठोर नहीं रह पाते। हम क्रूर नहीं रह पाते। हमारा मन विभाजन करता है कि यह चेतन है और यह जड़ है, पर ब्रह्मांड अद्वैत है। विभाजन हमारी सुविधा के लिए है, सत्य के लिए नहीं। जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो धीरे-धीरे यह विभाजन टूटने लगता है। हम महसूस करते हैं कि हमारे भीतर जो ऊर्जा धडक़ रही है, वही बाहर वृक्षों में है, वही पत्थरों में है। अंतर केवल अभिव्यक्ति का है। कहीं वह गा रही है, कहीं वह मौन है। पर मौन का अर्थ मृत नहीं होता।
मौन तो और भी गहरा जीवन है। हम ऐसा समझेंगे तो मृत्यु का अर्थ भी बदल जाएगा। हम मृत्यु को अंत मानते हैं, क्योंकि हम रूप से बंधे हैं। पर यदि सब कुछ ऊर्जा है, और ऊर्जा नष्ट नहीं होती, तो मृत्यु केवल रूपांतरण है। शरीर मिट्टी में जाएगा, मिट्टी से वृक्ष बनेगा, वृक्ष से फल बनेगा, फल से फिर कोई जीवन। यह चक्र चलता रहता है। कोई भी कण विश्राम में नहीं है। वह यात्रा में है। और यात्रा ही जीवन है। ऐसा होगा तो हमारा अहंकार भी पिघलने लगेगा। अभी हम सोचते हैं कि हम ही जीवित हैं और बाकी सब संसाधन हैं। यही अहंकार हमें प्रकृति से अलग करता है, पर जब हम देखेंगे कि पत्थर भी जीवित है, जल भी जीवित है, तब हम अलग कैसे रह सकते हैं? तब हम ब्रह्मांड के साथ साझेदारी में जीएंगे। तब जीवन एक संघर्ष नहीं रहेगा, एक उत्सव बन जाएगा। सच तो यह है कि यह पूरा ब्रह्मांड एक नृत्य है। इलेक्ट्रॉन नृत्य कर रहे हैं, ग्रह नृत्य कर रहे हैं, हमारी धडक़नें नृत्य कर रही हैं। और इस नृत्य में कोई मृत नहीं। मृत्यु केवल एक विराम है, एक ताल का बदलना है। संगीत चलता रहता है। हम उस संगीत को सुनना सीख जाएं तो हमें हर वस्तु में जीवन का स्पर्श मिलेगा। अंतत: हम ऐसा जानेंगे कि 'जीवत सब संसार' कोई सिद्धांत नहीं, एक दृष्टि है। यह दृष्टि हमें विभाजन से एकत्व की ओर ले जाती है। जब हम इस एकत्व को जीते हैं, तब हम केवल जीवित नहीं रहते, हम जीवन बन जाते हैं। तब पत्थर भी हमारे लिए मौन गुरु बन जाता है, जल भी प्रवाह की शिक्षा देता है, और आकाश हमें विस्तार सिखाता है। तब सब जीवित है, सब नृत्यमय है, सब उसी एक व्यक्ति और अव्यक्त ऊर्जा की लीला है, उसी परमात्मा की लीला है।
स्पिरिचुअल हीलर सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण
गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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