संवेदनशीलता, नि:स्वार्थ त्याग की भावना एवं चंद्रमा की किरणों के समान सबके मन को शीतलता देने जैसे अनेक सद्गुणों को आभूषणों की तरह धारण करने वाले पंडित जी का विराट जीवनदर्शन केवल उनके कथा लोक में ही उजागर नहीं होता, बल्कि सामान्य व्यवहार में भी उनके कृतित्व की विराटता के दर्शन सुलभ होते हैं।
आपने अपनी कहानियों के चरित्र-नायकों में इन सभी गुणों का बखूबी संधान किया ताकि नजीर बने…
महानता अनुकूल परिस्थितियों अथवा प्रबल भाग्य की देन नहीं, प्रत्युत यह नि:स्वार्थ त्याग, नैतिक मूल्य-बोध एवं ज्ञान की अतृप्त पिपासा की भट्टी में तपकर निर्मित होने वाला वह आभूषण है, जिसे धारण करने के लिए पहले योग्यता अर्जित करनी पड़ती है। पंडित श्रीचन्द्रधर शर्मा गुलेरी हिंदी साहित्य का वह देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिसकी चमक एक सदी बाद भी जस की तस बनी हुई है। परिकथाओं, ऐय्यारियों और भुतहा कहानियों के दौर में, लोकजीवन से जुड़ी उनकी सरस शैली में सशक्त संवादों से सजी 'उसने कहा था' ने हिंदी कथा-साहित्य को यथार्थ और मानवीय संवेदना की नई दिशा प्रदान की। सामाजिक समस्याओं पर सुस्त पड़ी साहित्यिक चेतना में दम भरा तथा सामाजिक यथार्थ को कथा के केंद्र में स्थापित करके हिंदी कहानी की भावी दिशा को प्रभावित किया। पंडित जी के व्यक्तित्व को शब्दों में समेट पाने का दंभ भरना सूरज को दीपक दिखाने जैसा दु:साहसी कार्य होगा। 7 जुलाई, 1883 ई. को पंडित श्रीचन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी का जन्म जयपुर में हुआ। आपके पिता पंडित शिवराम जी महाराज जयपुर रियासत में 'वेदांत-व्याकरणाध्यक्ष' पद पर नियुक्त थे।
भावनात्मक संवेदनशीलता, अनुशासन एवं मूल्य बोध उनकी समृद्ध पूंजी थी। यही सब गुण पुत्र श्रीचन्द्रधर शर्मा को अनुवांशिक विरासत में प्राप्त हुए। जयपुर राज्य में पंडित शिवराम जी महाराज की नियुक्ति के संदर्भ में एक रोचक प्रसंग आता है। शिवराम जी भाष्यब्रह्मचारी विरुद्भूषित पंडित विभवराम जी के प्रिय शिष्य थे। जयपुर के महाराजा रामसिंह (द्वितीय) ने अपनी धर्मसभा को अलंकृत करने के लिए उनसे अपने योग्यतम शिष्य को राजपंडित पद पर नियुक्त करने का निवेदन किया। गुरु विभवराम जी ने पंडित शिवराम को आगे करके उन्हें अपना 'योग्यतम प्रिय शिष्य' बताया। धर्मपरायण महाराजा ने उस निर्णय को सहर्ष स्वीकार कर लिया। आदेश जब पंडित शिवराम जी तक पहुंचा तो गुरु आज्ञा को शीश नवाकर उन्होंने एक विनम्र आग्रह प्रस्तुत किया, 'ज्येष्ठ गुरुभाई पंडित रामभजन जी को भी उनके साथ जयपुर भेजा जाए तथा उन्हें मुझसे वरिष्ठ पद पर प्रतिष्ठित किया जाए।' विदित रहे पंडित रामभजन जी उनके ज्येष्ठ गुरुभाई तथा प्रज्ञासहोदर ही नहीं थे, अपितु वे शिवराम जी के काशी आगमन से बहुत पहले ही गुरुसेवा में रत थे। महाराजा ने उनका यह अनुरोध स्वीकार किया तथा इच्छा के अनुरूप उनके बड़े गुरुभाई को 'महाराज संस्कृत पाठशाला' का अध्यक्ष नियुक्त किया। यह अनुरोध पंडित शिवराम जी के मूल्य-बोध तथा भावनात्मक संवेदनशीलता को अधोरेखांकित करता है। पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी के व्यक्तित्व में ऐसे अनेक पारिवारिक सद्गुण सहज निषेचित हुए। इन्हीं गुणों की स्पष्ट छाप पंडित जी की सृजनात्मक प्रतिभा में मुखर रूप से प्रतिबिंबित हुई। 'बुद्धू का कांटा' (1911) तथा 'सुखमय जीवन' (1914) से होते हुए यह छाप 1915 ई. में 'उसने कहा था' तक पहुंच कर और प्रगाढ़ हुई। देश के प्रति उनके मोह की बानगी इतनी गूढ़ थी कि अपने पैतृक जन्मस्थली को उन्होंने अपने नाम में गुंफित करके 'गुलेर' को संपूर्ण साहित्य जगत में सदा के लिए अमर कर दिया।
उधर पंडित शिवराम जी महाराज ने महाराजा जयपुर की ओर से भेंट में दी गई जागीर इसलिए ठुकरा दी ताकि आगे आने वाली पीढिय़ां कहीं गुलेर से मुंह न फेर बैठें। पंडित श्रीचन्द्रधर जी के व्यक्तित्व में त्याग की यह भावना इतनी प्रबल रही कि चचेरे भाई स्व. श्री रामलाल जी 'पंडित शिवराम जी की अनुपस्थिति में आपके परिवार को राजा गुलेर का राजपुरोहित पद प्राप्त था, के असमय ब्रह्मलीन हो जाने के तुरंत बाद जब गुलेर राज्य के राजकुंवर को राज्याभिषेक का संकट उपस्थित हुआ तो उन्हें विधि संपन्न करने के लिए बुलावा भेजा।
यहां वैधव्य झेल रही भाभी के मन में आजीविका छिन जाने का संशय उमड़ा, किंतु वे मुंह से कुछ कह न पाईं। राज्याभिषेक के समय पंडित श्रीचन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने अपने चार वर्षीय भतीजे स्व. कीर्तिधर शर्मा (लेखक के पितामह) को गोद में लेकर उनके अंगूठे से राज्याभिषेक संपन्न कराया ताकि भतीजे की गद्दी सुरक्षित रहे। संवेदनशीलता, नि:स्वार्थ त्याग की भावना एवं चंद्रमा की किरणों के समान सबके मन को शीतलता देने जैसे अनेक सद्गुणों को आभूषणों की तरह धारण करने वाले पंडित जी का विराट जीवनदर्शन केवल उनके कथा लोक में ही उजागर नहीं होता, बल्कि सामान्य व्यवहार में भी उनके कृतित्व की विराटता के दर्शन सुलभ होते हैं। आपने अपनी कहानियों के चरित्र-नायकों में इन सभी गुणों का बखूबी संधान किया ताकि नजीर बने। इस विशेषता के कारण पंडित जी के चरित्र-नायकों की छवि न केवल पाठकों को लुभाती है प्रत्युत उनके नायक समाज में अनुकरणीय कर्तव्य बोध के पदचिन्ह छोडऩे में सफल होते हैं। घायलों को लिवाने आई गाड़ी में बोधा को बिठाने के बाद लहना सिंह द्वारा अपनी जगह सूबेदार को चढ़ा देने वाला प्रसंग तथा संवाद याद आता है, 'तुम्हें बोधा की कसम है और सूबेदारनी की सौगंद है जो इस गाड़ी में न चले जाओ।' लहनासिंह अपने प्राणों का दांव खेलकर सूबेदारनी को दिया वचन निभा रहा है। इस प्रसंग को यदि उनके व्यवहार तथा कृतित्व के साथ जोड़ कर देखें तो भावसमाधि अनुभव होगी। पंडित शिवराम जी महाराज जयपुर जाने से पहले राजा गुलेर से अनुरोध कर रहे हैं, 'मेरी अनुपस्थिति में मेरे कौटुम्बिकों को मेरे ही समान सम्मान दिया जाए।' दृश्य बदल रहा है, 'पंडित श्रीचन्द्रधर शर्मा गुलेरी भतीजे को गोद में लेकर उसके अंगूठे से भावी राजा को तिलक दे रहे हैं।' भावनात्मक संवेदना, शुद्धचित्त प्रेम, नि:स्वार्थ त्याग तथा परस्पर सम्मान कथा-लोक से निकल कर सामान्य व्यवहार में गोचर हो रहे हैं। महानता अनुकूल परिस्थितियों अथवा बलवान भाग्य से नहीं, आचरण की शुचिता तथा कृतित्व से निर्धारित होती है। गुलेरी ने केवल कालजयी कहानी नहीं लिखी, अपने जीवनकाल में उन मूल्यों को जिया जिन्हें उनकी कहानी अमर कर गई।
आशुतोष आशु 'नि:शब्द'
साहित्यकार
