खुशी कोई मंजिल नहीं, बल्कि यात्रा का ढंग है। यदि यात्रा बेचैनी में कटे, तो मंजिल भी बेचैनी ही देगी। और यदि यात्रा सजगता, स्वीकार और संतुलन में कटे, तो रास्ता ही आनंदमय हो जाता है।
तब मंजिल चाहे मिले या न मिले, भीतर कोई कमी नहीं रहती। यही वह अवस्था है जहां मनुष्य पहली बार सच में जीना शुरू करता है। अंतत:, यह बोध गहरा होगा कि भविष्य की उपलब्धियां हमें वही देंगी, जो अतीत की उपलब्धियों ने दिया, क्षणिक तृप्ति। यदि हमें स्थायी खुशी चाहिए, तो दिशा बदलनी होगी। बाहर से भीतर की ओर। पाने से समझने की ओर। दौड़ से ठहराव की ओर। जब यह परिवर्तन घटता है, तब जीवन अपने आप सरल, सहज और अर्थपूर्ण हो जाता है। और तब हमें किसी उपलब्धि की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती…
मनुष्य का स्वभाव है कि वह भविष्य से बहुत अपेक्षाएं बांध लेता है। हम अक्सर यह मान लेते हैं कि जो हमें अभी नहीं मिला है, वही हमें पूर्ण करेगा, और जो हमें मिल चुका है, वह बस एक सीढ़ी थी, मंजिल नहीं। मनुष्य का मन बहुत अजीब है। वह जिस चीज को पा लेता है, उसी से ऊब जाता है, और जिसे नहीं पाया, उसी को जीवन का सार समझ बैठता है। यही उसकी त्रासदी है। वह भविष्य में जीता है, वर्तमान को टालता रहता है। वह सोचता है कि जब यह मिल जाएगा, तब खुश हो जाऊंगा। और जब वह मिल जाता है, तो खुशी कहीं और खिसक जाती है। मन कहता है कि नहीं, यह नहीं, अगला चाहिए। यदि हम ईमानदारी से अपने जीवन की ओर देखें, तो एक सरल किंतु असहज सत्य सामने आता है कि हमारी अधिकांश उपलब्धियां हमें उतनी खुशी कभी नहीं दे पाईं, जितनी हमने उनसे अपेक्षा की थी। फिर भी हम उसी भूल को बार-बार दोहराते हैं, केवल पात्र बदल जाते हैं, कभी पद, कभी धन, कभी सम्मान, कभी संबंध, और कभी कोई सपना। यही मन की चाल है, और यही दुख का जन्मस्थान। हम थोड़ा सा विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि हर उपलब्धि के साथ खुशी का एक छोटा-सा क्षण आता है, पर वह क्षण टिकता नहीं। जिस दिन हम उस लक्ष्य तक पहुंचते हैं, उस दिन मन थोड़ी देर के लिए तृप्त होता है, पर शीघ्र ही भीतर कोई नई आकांक्षा जन्म ले लेती है। मन फिर कहने लगता है 'अब इससे आगे।'
यही मन की आदत है। वह वर्तमान को कभी पर्याप्त नहीं मानता। उसे हमेशा कुछ और चाहिए, कुछ बड़ा, कुछ अलग। समस्या उपलब्धियों में नहीं, समस्या इस मान्यता में है कि उपलब्धियां ही हमें स्थायी सुख दे सकती हैं। उपलब्धियों से संबंधित हमारी अपेक्षाएं ही हमारे दुख का मूल हैं। अपेक्षा यह मानकर चलती है कि भविष्य हमारे अनुसार चलेगा। पर जीवन कभी हमारे अनुसार नहीं चलता, वह अपने नियमों से चलता है। जब हम उपलब्धि को खुशी की शर्त बना लेते हैं, तब हम अनजाने में वर्तमान को त्याग देते हैं। हम आज को केवल एक माध्यम बना लेते हैं, कल के लिए। और यही सबसे बड़ी चूक है। क्योंकि जीवन कभी 'कल' में नहीं जिया जाता, वह हमेशा 'अभी' में ही घटित होता है। मनुष्य सोचता है कि अधिक होने से वह खुश होगा, अधिक धन, अधिक सम्मान, अधिक पहचान। लेकिन वह यह नहीं देखता कि अधिक होने के साथ-साथ भय भी बढ़ता है, खोने का भय, गिरने का भय, तुलना का भय। खुशी हल्केपन में होती है, बोझ में नहीं। और उपलब्धियां अक्सर बोझ बन जाती हैं, क्योंकि वे अपेक्षाएं ले आती हैं, अपनी और दूसरों की। खुशी, दरअसल, कोई वस्तु नहीं है, जिसे पाया जा सके। वह कोई पुरस्कार नहीं है, जो मेहनत के बदले हमें दे दिया जाए। खुशी एक अवस्था है, एक भीतरी संतुलन, एक सहज स्वीकार, एक आंतरिक स्थिरता। मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि खुशी कोई परिणाम नहीं है। वह किसी लक्ष्य के अंत में नहीं बैठी है। खुशी तो तभी होती है जब मन शांत हो, जब भीतर कोई खिंचाव न हो, जब इच्छा थोड़ी देर के लिए मौन हो जाए। लेकिन मन मौन से डरता है। वह शोर चाहता है, सपनों का, योजनाओं का, भविष्य का। खुशी को जब हम बाहरी परिणामों से जोड़ देते हैं, तब हम स्वयं को अस्थिर कर लेते हैं क्योंकि बाहरी परिणाम हमारे पूर्ण नियंत्रण में नहीं होते। आज जो मिला है, कल छिन भी सकता है और जो नहीं मिला, वह कल मिल भी सकता है। ऐसे में यदि हमारी खुशी का आधार ही उपलब्धि बन जाए, तो जीवन एक सतत असंतोष में बदल जाता है।
हमें अपने अतीत की ओर भी देखना चाहिए। वह चीज, जिसे पाने के लिए हम कभी बेचैन थे क्या उसे पाने के बाद जीवन सचमुच बदल गया? क्या भीतर कोई स्थायी शांति आई? अधिकांश मामलों में उत्तर 'नहीं' होगा। भीतर का खालीपन कुछ समय के लिए ढक गया, पर भरा नहीं। क्योंकि खालीपन बाहर से नहीं भरता, वह भीतर से समझने से भरता है। हम बाहर जोड़ते रहे, भीतर की गांठ खोलने का साहस नहीं किया। स्थायी खुशी का संबंध पाने से नहीं, बल्कि छूटने से है। छूटने से, झूठी अपेक्षाओं से, तुलना से, दूसरों के मानदंडों से, और इस भ्रम से कि हम कुछ बनकर ही मूल्यवान हैं। जब हम यह समझ लेते हैं कि हमारा मूल्य हमारी उपलब्धियों से नहीं, हमारी चेतना से तय होता है, तब भीतर एक नई शांति जन्म लेती है। तब हम कर्म करते हैं, पर कर्म में बंधते नहीं। तब हम लक्ष्य रखते हैं, पर लक्ष्य हमें गुलाम नहीं बनाते। हम ऐसा करेंगे तो जीवन का दृष्टिकोण ही बदल जाता है। तब सफलता असफलता का डर नहीं बनती, और असफलता आत्मग्लानि का कारण नहीं रहती। तब उपलब्धि एक उत्सव होती है, पर अनिवार्यता नहीं। हम जो करते हैं, उसे पूरे मन से करते हैं, पर परिणाम को अपने अस्तित्व का प्रमाण नहीं बनाते। यही दृष्टि मनुष्य को हल्का करती है, मुक्त करती है। खुशी कोई मंजिल नहीं, बल्कि यात्रा का ढंग है। यदि यात्रा बेचैनी में कटे, तो मंजिल भी बेचैनी ही देगी।
और यदि यात्रा सजगता, स्वीकार और संतुलन में कटे, तो रास्ता ही आनंदमय हो जाता है। तब मंजिल चाहे मिले या न मिले, भीतर कोई कमी नहीं रहती। यही वह अवस्था है जहां मनुष्य पहली बार सच में जीना शुरू करता है। अंतत:, यह बोध गहरा होगा कि भविष्य की उपलब्धियां हमें वही देंगी, जो अतीत की उपलब्धियों ने दिया, क्षणिक तृप्ति। यदि हमें स्थायी खुशी चाहिए, तो दिशा बदलनी होगी। बाहर से भीतर की ओर। पाने से समझने की ओर। दौड़ से ठहराव की ओर। जब यह परिवर्तन घटता है, तब जीवन अपने आप सरल, सहज और अर्थपूर्ण हो जाता है। और तब हमें किसी उपलब्धि की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती क्योंकि हम जहां हैं, जैसे हैं, वहीं पूर्ण होते हैं। आज हमारे सामने प्रश्न यह नहीं है कि भविष्य की उपलब्धियां हमें खुश करेंगी या नहीं। प्रश्न यह है- क्या हम अभी सजग हैं? क्या हम इस क्षण को पूरी तरह जी रहे हैं? क्योंकि जो इस क्षण में खुश नहीं हो सकता, वह किसी भी भविष्य में खुश नहीं हो पाएगा। और जो इस क्षण में आनंदित है, उसके लिए भविष्य अप्रासंगिक हो जाता है। आनंद तब आता है जब हम लक्ष्य को नहीं, यात्रा को जीते हैं। जब हम परिणाम को नहीं, प्रक्रिया को महसूस करते हैं। जब हम होने को प्राथमिकता देते हैं, पाने को नहीं। उसी क्षण जीवन का सारा बोझ गिर जाता है और तब, बिना किसी उपलब्धि के भी, मनुष्य पहली बार सच में समृद्ध हो जाता है। ऐसे में हम वर्तमान में जीते हैं, आज को जीते हैं, आज का आनंद लेते हैं, आने वाले कल की चिंता में आज को फना नहीं करते। कल की उम्मीद में आज को गंवा देना ही दुख का कारण है और कल की चिंता में घुलते रहने के बजाय आज को जी लेना खुशियों का मूलमंत्र है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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