'अंधेरे से डरने वाला जीव प्रकाश खोजता है। प्रकाश से डरने वाला जीव उसे नियंत्रित करना चाहता है।' जैसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष के बाद अखिल अंतरराष्ट्रीय कॉकरोच महासभा का अधिवेशन समाप्त हो चुका था।
बारह दिनों तक चली बहसें, प्रस्ताव, घोषणाएं, ठहाके और मौन-सब अपनी-अपनी दरारों में लौट चुके थे। गोदाम फिर पहले जैसा दिखाई देने लगा था। वही दीवारें, वही दरारें, वही रसोई। बदला केवल मैं था। मुझे अब हर दरार किसी इतिहास का द्वार लगती थी। उस रात मैं बहुत देर तक जागता रहा। आधी रात को अचानक रसोई से हल्की सी सरसराहट सुनाई दी। मैंने धीरे से बत्ती जलाई। क्षण भर पहले तक फर्श पर घूमते असंख्य तिलचट्टे एक झटके में गायब हो गए। मानो वे कभी थे ही नहीं। मैं मुस्करा दिया, 'तो सचमुच…रात उजेरी है, छिप गए कॉकरोच।'लेकिन तभी मेरे भीतर किसी ने पूछा, 'क्या सचमुच वे छिपे हैं?' मैंने चारों ओर देखा। दीवार की दरारें वहीं थीं। अलमारी के पीछे वही अंधेरा। सिंक के नीचे वही नमी। कॉकरोच कहीं गए नहीं थे। वे केवल मेरी दृष्टि से ओझल हुए थे। उसी क्षण मुझे तिलचट्टानंद की बात याद आई, 'प्रकाश किसी को समाप्त नहीं करता। केवल उसे देखने का ढंग बदल देता है।' अचानक लगा जैसे कमरे में कोई उपस्थित हो। मुडक़र देखा। वृद्ध कॉकरोच वहीं बैठे थे। पांच महाविनाशों के साक्षी। मैंने पूछा, 'क्या अधिवेशन समाप्त हो गया?' उन्होंने मुस्कराकर कहा, 'अधिवेशन कभी समाप्त नहीं होते। केवल प्रतिनिधि बदलते हैं।' मैंने उनसे प्रश्न किया, 'क्या मनुष्य सबसे अधिक बुद्धिमान है?' वे बोले, 'निश्चित रूप से।' 'फिर वह अधिक संकट में क्यों दिखाई देता है?' वृद्ध ने कहा, 'क्योंकि बुद्धि दिशा नहीं देती, केवल क्षमता देती है।' मैंने पूछा, 'क्या आप मनुष्य से घृणा करते हैं?' वृद्ध ने मेरी ओर देखा। उनकी आंखों में बुद्ध की करुणा थी, 'नहीं।' 'क्यों?' 'क्योंकि वही एकमात्र जीव है जो अपने ही बनाए प्रश्नों में उलझ जाता है।'
कमरे में फिर मौन पसर गया। कुछ देर बाद उन्होंने कहा, 'तुम लोग हमें नष्ट करने में बहुत व्यस्त रहे।' 'और तुम' 'हम केवल जीवित रहने में।' मैंने साहस करके अंतिम प्रश्न पूछा, 'छठे महाविनाश के बाद क्या होगा?' वृद्ध ने उत्तर दिया, 'यदि प्रकृति बचेगी…तो जीवन फिर लौट आएगा।' 'और यदि मनुष्य नहीं बचा?' उन्होंने शांत स्वर में कहा, 'प्रकृति ने कभी किसी एक प्रजाति पर अपना भविष्य नहीं टांगा।' मैंने पूछा, 'तो क्या अंत में कॉकरोच ही बचेंगे?' वृद्ध हंसे, 'मनुष्य को अपनी कहानी का नायक बनने की आदत है।' 'प्रकृति की कहानी में कोई स्थायी नायक नहीं होता।' इतने में पूर्व दिशा में हल्की रोशनी फैलने लगी। सुबह होने वाली थी। वृद्ध कॉकरोच उठे, 'अब हमें चलना चाहिए।' 'कहां?' 'वहींं…जहां मनुष्य की दृष्टि नहीं पहुंचती।' कहते हुए वे धीरे-धीरे दीवार की एक पतली दरार में समा गए। मैं कितनी देर दरार को देखता रहा। फिर मेरी नजऱ बाहर चली गई। शहर जाग रहा था। बाज़ार खुल चुके थे। समाचार चैनल चिल्ला रहे थे। संसद चल रही थी। शेयर बाज़ार खुल चुका था। वैज्ञानिक नई खोज की घोषणा कर रहे थे। कहीं युद्ध की तैयारी थी। कहीं शांति सम्मेलन। कहीं वृक्ष कट रहे थे। कहीं पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा था। मैंने सोचा, 'शायद सभ्यता भी एक बहुत बड़ी दरार है।' उसी समय रसोई से फिर हल्की सी सरसराहट सुनाई दी। मैं केवल सुनता रहा। पहली बार मुझे लगा कि वे केवल तिलचट्टे नहीं थे। वे समय थे। वे इतिहास थे। वे प्रकृति की वह धीमी आवाज़ थे जो मनुष्य के शोर में भी चुपचाप जीवित रहती है। भीतर रोशनी पसर चुकी थी। मैंने चप्पल की ओर देखा। फिर उसे वहीं रहने दिया। मेरे सामने मेज़ पर एक खाली कागज़ रखा था। मैंने उसके ऊपर केवल एक वाक्य लिखा, 'रात उजेरी है, छिप गए कॉकरोच।' बहुत देर तक आगे कुछ नहीं लिख पाया। अंतिम प्रश्न अभी भी अनुत्तरित था, 'मनुष्य बचेगा या नहीं?' उस प्रश्न के नीचे कोई उत्तर नहीं था। केवल एक लंबी खाली जगह थी।
पीए सिद्धार्थ
स्वतंत्र लेखक
