जब भी अवसर आए, हम नेकी करें, मुस्कुराएं, और उसे दरिया में डाल दें, क्योंकि जो दरिया में डाल दिया जाता है, वही वास्तव में अमर हो जाता है। अंतत: 'नेकी कर दरिया में डाल' जीवन को जीने की एक ऐसी कला सिखाता है, जिसमें हाथ खुले रहते हैं और मन खाली।
जब हम यह सीख लेते हैं कि अच्छा करके पीछे मुडक़र नहीं देखना है, तब जीवन में एक गहरी शांति उतरती है। तब न किसी ने हमें पहचाना या नहीं पहचाना, यह प्रश्न अर्थहीन हो जाता है। तब हम अच्छे इसलिए नहीं होते कि संसार हमें स्वीकार करे, बल्कि इसलिए कि हम स्वयं अपने भीतर अस्वीकार के बोझ को ढोना नहीं चाहते। नेकी स्मृति से मुक्त होकर जब स्वभाव बन जाती है, तब मनुष्य भीतर से सरल, हल्का और पारदर्शी हो जाता है। ऐसा मनुष्य ही वास्तव में स्वतंत्र होता है, प्रशंसा से भी, निंदा से भी। वह जान लेता है कि जीवन का सौंदर्य संग्रह में नहीं, प्रवाह में है। जो बहने देता है, वही निर्मल रहता है। इसलिए हम नेकी करें, उसे थामें नहीं, उसे याद रखें नहीं, उसे अपना कहें नहीं। बस करें, और दरिया में डाल दें…
भारतीय जीवन-दर्शन का एक अत्यंत सरल, किंतु गहन सूत्र है- 'नेकी कर दरिया में डाल।' यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि आत्म-साधना का मौन विधान है। यह वाक्य मनुष्य को यह सिखाता है कि शुभ कर्म का मूल्य उसकी घोषणा में नहीं, उसकी नि:स्वार्थता में है। जब नेकी का बोझ 'मैंने किया' के अहंकार से मुक्त होकर चेतना में विलीन हो जाता है, तभी वह वास्तव में पुण्य बनता है। नेकी कोई लेन-देन नहीं, नेकी कोई सौदा नहीं, नेकी तो वह मौन प्रार्थना है जो बिना शब्दों के ईश्वर तक पहुंच जाती है। आज का मनुष्य हर कर्म के साथ रसीद चाहता है, कभी प्रशंसा की, कभी मान-सम्मान की, कभी सोशल मीडिया की तालियों की। परंतु नेकी की शर्त यही है कि वह बिना रसीद के की जाए। जैसे नदी अपना जल खेतों को देती है, प्यासों को तृप्त करती है, पर किसी से यह नहीं पूछती कि तू मुझे याद रखेगा या नहीं। जहां अहंकार प्रवेश करता है, वहीं नेकी का स्वरूप बदल जाता है। अहंकार कहता है कि देखो, मैंने क्या किया, जबकि नेकी कहती है कि भूल जाओ, मैंने क्या किया। जब किसी को दिया गया दान, किया गया उपकार, या निभाया गया धर्म, यदि स्मृति में टिक जाए, तो वह धीरे-धीरे अहंकार का पोषण करने लगता है, और अहंकार, चाहे वह कितनी ही अच्छी पोशाक क्यों न पहन ले, अंतत: आत्मा को भारी कर देता है। दरिया में डालने का अर्थ ही यही है कि कर्म को स्मृति से मुक्त कर देना।
नेकी को अपेक्षा से मुक्त कर देना, और स्वयं को कर्तापन के बोझ से मुक्त कर देना। सच्ची नेकी प्राय: गुप्त होती है। जैसे बीज मिट्टी में दबकर अंकुर बनता है, वैसे ही गुप्त नेकी आत्मा में दबकर विवेक बन जाती है। जो नेकी प्रचार चाहती है, वह बाहर से चमकदार होती है, जो नेकी मौन होती है, वह भीतर से उजास भर देती है। संतों ने कहा है कि जिसे धन्यवाद की प्रतीक्षा हो, वह नेकी नहीं, निवेश कर रहा है, और जो बिना धन्यवाद के भी प्रसन्न रहे, वही वास्तव में धर्म के पथ पर है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि नेकी दरिया में डाल दी, तो उसका फल कैसे मिलेगा? यहां भारतीय दर्शन का सूक्ष्म सत्य प्रकट होता है। कर्मफल कोई बैंक खाता नहीं, जहां जमा-निकासी दिखाई दे। कर्मफल चेतना का संस्कार है। नेकी जब अपेक्षा रहित होती है, तो वह मन को हल्का करती है, दृष्टि को करुणामय बनाती है, और जीवन को सहज प्रवाह में ले जाती है।
दरिया में डाली गई नेकी अंतत: लौटकर सामने आती है, क्योंकि वही दरिया बादलों को जन्म देता है, और वही बादल फिर से अमृत-वर्षा बनकर बरसते हैं। इसका अर्थ यह है कि नेकी वापस आती है, पर अक्सर रूप बदल कर। पर यह तभी संभव है जब हम नेकी करके उसे भूल जाएं। हम भूल गए तो परमात्मा ने याद रख लिया। कर्मों का संविधान ऐसा ही है। हमने कर्म किया, किसी का भला कर दिया, किसी की सहायता कर दी, किसी का मार्गदर्शन कर दिया, किसी के निराश जीवन में आशा का संचार कर दिया, किसी के जीवन में विश्वास भर दिया, या आस्था भर दी, और उसके लिए कैमरे साथ नहीं लिए, सोशल मीडिया पर प्रचार नहीं किया, लोगों को बार-बार नहीं बताया, तो वह नेकी पूजा हो गई, और अगर हम उसका ढिंढोरा पीटते रहे तो वह नेकी प्रचार हो गई। नेकी तो की, पर नीयत का फर्क रह गया। नेकी के साथ नेकनीयती भी जरूरी है, नेकी तभी नेकी है जब उसके साथ प्रचार न हो, नेकनीयत हो। आज का युग प्रदर्शन का युग है। सहायता भी तस्वीर के साथ होती है, सेवा भी पोस्ट के साथ। ऐसे समय में 'नेकी कर दरिया में डाल' एक क्रांतिकारी विचार बन जाता है। यह हमें सिखाता है कि हर अच्छा काम दिखाने के लिए नहीं होता, कुछ अच्छे काम केवल होने के लिए होते हैं। जब हम किसी को क्षमा करते हैं और किसी को पता नहीं चलता, वह नेकी है। जब हम किसी को सहारा देते हैं और नाम नहीं बताते, वह नेकी है। जब हम सत्य पर टिके रहते हैं, भले ही लाभ न मिले, वह नेकी है। आध्यात्मिक दृष्टि से नेकी आत्मा की स्वाभाविक अवस्था है।
जैसे दीपक का धर्म है प्रकाश देना, वैसे ही आत्मा का धर्म है करुणा बरसाना। जब आत्मा अपने स्वभाव में स्थित होती है, तब नेकी कोई प्रयास नहीं रहती, वह स्वत: घटित होती है। सिद्ध परंपरा कहती है कि जब कर्ता मिटता है, तभी करुणा जन्म लेती है और जब करुणा जन्म लेती है, तभी नेकी दरिया बन जाती है। 'नेकी कर दरिया में डाल' अंतत: एक मौन संकल्प है कि मैं अच्छा इसलिए नहीं करूंगा कि लोग मुझे अच्छा कहें, बल्कि इसलिए करूंगा क्योंकि मेरा अंत:करण मुझे ऐसा करने को कहता है। यह संकल्प मनुष्य को हल्का करता है, जीवन को सरल करता है, और मृत्यु को भी निर्भय बना देता है। नेकी कोई उपलब्धि नहीं, नेकी कोई पदक नहीं, नेकी कोई पहचान नहीं, नेकी तो आत्मा की सुगंध है। जो सुगंध फैलती है, वह यह नहीं पूछती कि किसे अच्छी लगी। अत: जब भी अवसर आए, हम नेकी करें, मुस्कुराएं, और उसे दरिया में डाल दें, क्योंकि जो दरिया में डाल दिया जाता है, वही वास्तव में अमर हो जाता है। अंतत: 'नेकी कर दरिया में डाल' जीवन को जीने की एक ऐसी कला सिखाता है, जिसमें हाथ खुले रहते हैं और मन खाली।
जब हम यह सीख लेते हैं कि अच्छा करके पीछे मुडक़र नहीं देखना है, तब जीवन में एक गहरी शांति उतरती है। तब न किसी ने हमें पहचाना या नहीं पहचाना, यह प्रश्न अर्थहीन हो जाता है। तब हम अच्छे इसलिए नहीं होते कि संसार हमें स्वीकार करे, बल्कि इसलिए कि हम स्वयं अपने भीतर अस्वीकार के बोझ को ढोना नहीं चाहते। नेकी स्मृति से मुक्त होकर जब स्वभाव बन जाती है, तब मनुष्य भीतर से सरल, हल्का और पारदर्शी हो जाता है। ऐसा मनुष्य ही वास्तव में स्वतंत्र होता है, प्रशंसा से भी, निंदा से भी। वह जान लेता है कि जीवन का सौंदर्य संग्रह में नहीं, प्रवाह में है। जो बहने देता है, वही निर्मल रहता है। इसलिए हम नेकी करें, उसे थामें नहीं, उसे याद रखें नहीं, उसे अपना कहें नहीं। बस करें, और दरिया में डाल दें। यही जीवन की साधना है, यही मनुष्य होने की पराकाष्ठा है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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