सडक़ पर आम नागरिक की सुरक्षा के इंतजाम इतने ढीले हैं कि वाहन सीधे खाई में पहुंच रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में ही सडक़ दुर्घटनाओं का विवरण भले ही मानवीय गलतियों का पिटारा खोल दे, लेकिन सडक़ निर्माण में बरती गई लापरवाही भी काफी हद तक हानिकारक साबित हुई है।
आनी में वाहन पर गिरे पेड़ ने स्कूल से लौट रहे चार शिक्षक लील दिए, तो इस सफर में जंगल को कातिल क्यों न मानें। साल भर का आंकड़ा निकालें, तो वन विभाग के अडिय़ल कानूनों की फेहरिस्त और काम का ढर्रा यह बताता है कि सडक़ों के किनारे कितने ही खूनी पेड़ खड़े हैं और जहां कानून का नंगा नाच मौत का सबब बनता है। बेशक हमने जंगल के कानून से लांघना मुश्किल कर दिया, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि कुछ घातक पेड़ सडक़ों, बस्तियों और जीवन के हर दस्तूर के खिलाफ दैत्य बने रहें। आनी का पेड़ अगर कातिल साबित हुआ, तो न्याय की दरकार किससे करें। बात मुआवजे की नहीं, बल्कि जिंदगी को उखाड़ फेंकने की है। हमारे जंगल वहां हैं, जहां से जीवन की राहें गुजरती हैं। सडक़ों के किनारे हर साल कितने ही पेड़ अनेक कारणों से ढह कर नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन ऐसी कोई योजना नहीं जो ऐसे खतरों से जान-माल को बचा ले। अगर कहीं पेड़ टूट या सूख जाते हैं, तो भी विभाग इन्हें हटाने में वर्षों लगा देता है। ऐसे में झुके, सूख गए, सडक़ की ढलान या बीचोंबीच खड़े पेड़ न हटाए गए, तो हर जगह आनी जैसा मातम पसर सकता है। सडक़ों पर जिंदगी की सुरक्षा के दाग केवल वन विभाग पर ही नहीं, बल्कि बिजली के पोल और जलापूर्ति की पाइपें भी कम दोषी नहीं। अब तो सडक़ों की मरम्मत भी काल बन रही है। नवनिर्माण की सामग्री, वाहनों की पार्किंग और मलबे के ढेर यातायात को जोखिम से भर रहे हैं।
भले ही माननीय हाई कोर्ट ने बरसात के मलबे को हटाने के निर्देश पीडब्ल्यूडी को दिए थे, लेकिन सडक़ें आज भी इससे खचाखच भरी नजर आती हैं। सडक़ों पर गति सीमा नियंत्रण तथा तकनीकी तौर पर इंजीनियरिंग की खामियां भी नजरअंदाज हो रही हैं। नतीजतन मौत की कमोबेश हर छलांग में स्पीड, ओवरटेक और आगे निकलने की जल्दबाजी सामने आ रही है। चालकों के लिए पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप ड्राइविंग स्किल का न होना भी एक बड़ा कारण है, लेकिन पर्यटक सीजन में अभियान के जरिए ऐसा संदेश देने में हिमाचल अभी पीछे है। चिंतपूर्णी से देहरा मार्ग के बीच ढलियारा के खतरनाक मोड़ अब चीखने-चिल्लाने की यातना बने हैं, तो न इंजीनियरिंग और न ही ड्राइविंग के लिए कोई पहरे तैयार हुए। ड्राइविंग के साथ शारीरिक क्षमता तथा ड्राइवर सीट पर बैठे व्यक्ति के स्वास्थ्य का परीक्षण भी एक जरूरत है। अगर चालकों के स्वास्थ्य परीक्षण के शिविर लगें या सडक़ों पर उनकी फिटनेस का समय-समय परीक्षण हो जाए, तो कम से कम नूरपुर जैसी घटनाओं से बचा जा सकता था। सडक़ पर चालक को आए हार्ट अटैक ने चंबा से ऊना जा रही निजी बस की सवारियों की जिंदगी खतरे में डाल दी थी। शुक्र यह कि चोटिल सवारियां बच गईं वरना यह सफर गमगीन हो सकता था। कहना न होगा कि हिमाचल की सडक़ों पर बढ़ता वाहन दबाव अब सफर के खतरे बढ़ा रहा है। वाहनों की दौड़ में ड्राइवर से लेकर सडक़ों की फिटनेस भी जरूरी है और यातायात प्रबंधन में हर यात्री के जीवन की सुरक्षा का हर पहलू अब पुख्ता करना पड़ेगा। हर दुर्घटना केवल एक टीस, हजारों सबक देती है, लेकिन ढर्रा वहीं का वहीं खड़ा है।
