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सद्गुरु ही तारणहार - Divya Himachal

सद्गुरु ही तारणहार - Divya Himachal

Divya Himachal 1 day ago

बाबा हरदेवगतांक से आगे…

इसलिए सद्गुरु की शिक्षा, उपदेश, प्रवचन कभी भी विवादास्पद नहीं होते। साथ ही अपने गुरसिखों से भी यही अपेक्षा करता है कि वे भी संसार में मर्यादित, अनुशासित, कत्र्तव्यनिष्ठ, मानवीय मूल्यों से युक्त होकर निष्काम भाव से जीवन जी कर उदाहरण बनें।

मनुष्य जब जन्म लेता है तब से ही गुरु की आवश्यकता प्रारंभ हो जाती है। सर्वप्रथम मां ही प्रथम गुरु बनती है, जो खाना, बोलना, चलना, समझना आदि प्रारंभिक शिक्षा देती है, उसके बाद स्कूल, कालेज में जाकर विद्या ग्रहण करते हैं या कोई हुनर या विशेष कौशलता हेतु उसी प्रकार के गुरु से शिक्षा ली जाती है। परमात्मा ने मानव को पांच तत्वों (धरती, पानी, आग, हवा, आकाश) से बनाया है फिर उस शरीर का संचालन करने के लिए निराकार परमात्मा ने अपना ही अंश आत्मा (चेतन) डाल दी और साथ में मन, चित्त, बुद्धि, सोचने-समझने की शक्ति देकर सभी जीवों को श्रेष्ठ बनाया। साथ में विशाल प्रकृति भी बनाई, जिसके उपयोग की मानव को पूरी छूट दी। परंतु मनुष्य अपने अहंकार के कारण परमात्मा द्वारा दी गई वस्तुओं का ही दुरुपयोग करने लगा और अपने आपको कभी भी ना मरने वाला समझने लगा। जबकि सच्चाई ये है कि राम गयो रावण गयो,जाका बहू परिवार। सपनेहूं कछु नहीं नानका, जेहूं सपनेहू संसार। अर्थात जीवन क्षण भंगुर है। शरीर तो एक न एक दिन जरूर जाएगा। संतों ने बताया कि कई जन्मों के बाद मनुष्य जीवन मिलता है ताकि इसी जीवन में

ही प्रभु भक्ति की जाए। और मैं कौन हंू? मैं कहां आया हूं? मैं कहां जाऊंगा?
इन सभी प्रश्नों के हल खोजने हैं। मैं डाक्टर हूं, इंजीनियर हूं, वकील हूं, क्या ये सत्य है? नहीं। ये तो भौतिक शिक्षाओं की उपलब्धियां हैं और भौतिक शिक्षा तो शरीर के साथ इसी भौतिक संसार में रह जाएंगी। असल में हम आत्मा है, जो निराकार-परमात्मा का अंग है। जिसके बारे में कहा गया है।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।
अर्थात आत्मा न जन्मती है न मरती है, नाश रहित है, नित्य अव्यय, सनातन और पुरातन है। साथ ही इसे न काटा जा सकता है न नष्ट कर सकते हैं। परंतु जब तक पूर्ण सद्गुरु से यह आत्म ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। इस आत्मा का जन्म-मरण होता रहेगा। और आत्म ज्ञान केवल सद्गुरु (पूर्ण संत) ही प्रदान करता है।

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्व दर्शिन:।
अर्थात सभी कर्मों का भोक्ता परमात्मा है परंतु जब पूर्ण सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान (आत्मज्ञान) प्राप्त कर लिया जाता है ,तो मोक्ष संभव है, क्योंकि ब्रह्मज्ञान सभी कर्म-धर्मों के पुण्य-पापों से मुक्त कर देता है और इस ज्ञान को जानने के बाद कोई शेष ज्ञान जानने योग्य नहीं रह जाता है। इसलिए मनुष्य जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण शिक्षा ब्रह्मज्ञान है। जो सद्गुरु से प्राप्त होता है। इसे प्राप्त करने के बाद वह मानव बन जाता है और समझ आ जाता है कि मेरे साथ ये सभी मानव भी परमात्मा के अंश हैं।

हम सब भाई-भाई हैं। ऊंच-नीच, जातिवाद, नफरत का पतन होने लगता है। फिर अमन-चैन, अपनापन, प्यार, मानवता जैसी भावना बन जाती है तथा धरती स्वर्ग बनती चली जाती है। सतगुरु आउदै दुनियां उत्ते सारे ही संसार लई। सतगुरु आउंदै दुनियां उत्ते केवल पर उपकार लई।
वर्तमान में निरंकारी मिशन आज सारे संसार को प्यार, मानवता, अपनापन, दीवार रहित संसार के सिद्धांत के आधार पर जीवन जीने की शिक्षा दे रहा है। -क्रमश:


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