नागौर शहर के काठडिय़ों का चौक स्थित प्रसिद्ध नगर सेठ श्री बंशीवाला मंदिर में वार्षिक झूलोत्सव का भव्य शुभारंभ हो गया है। रोजाना भगवान नगर सेठ का विशेष शृंगार किया जाता है। भगवान को करीब 800 वर्ष पुराने स्वर्णमंडित झूले पर विराजमान किया जाता है।
साल में केवल एक बार होने वाले इस विशेष आयोजन को लेकर भक्तों में खासा उत्साह है। मंदिर में भगवान बंशीवाला को जिस झूले पर विराजमान कराया जाता है, वह करीब आठ शताब्दी पुराना बताया जाता है। दुर्लभ लकड़ी से बने इस झूले पर सोने की बेहद बारीक और कलात्मक परत चढ़ाई गई है। इसकी सबसे खास विशेषता इसके दोनों मुख्य खंभों पर बनाए गए 12 छोटे-छोटे उप झूले हैं। इस दौरान मंदिर में भजन-कीर्तन और धार्मिक प्रस्तुतियों का भी आयोजन किया जा रहा है। छोटी तीज से बड़ी तीज तक चलने वाली यह परंपरा श्रद्धालुओं के लिए सालभर में मिलने वाला विशेष अवसर है। इस ऐतिहासिक झूले से जुड़ी सबसे खास बात यह है कि करीब 800 वर्षों के लंबे इतिहास में इसे एक बार भी मरम्मत की आवश्यकता नहीं पड़ी। झूले को पूरे साल सुरक्षा तिजोरी में सुरक्षित रखा जाता है और साल में केवल एक बार विशेष आयोजन के दौरान बाहर निकाला जाता है।
इसे तिजोरी से बाहर निकालने के बाद इसके 100 से अधिक छोटे-बड़े हिस्सों को आपस में जोडक़र व्यवस्थित तरीके से स्थापित किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कारीगरों को करीब डेढ़ घंटे का समय लगता है। झूले को जोडऩे और स्थापित करने की प्रक्रिया बेहद सावधानी से पूरी की जाती है। इसके प्रत्येक हिस्से को निर्धारित क्रम में लगाया जाता है, ताकि सदियों पुरानी संरचना को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे। श्री बंशीवाले मंदिर में भगवान श्री कृष्ण की पत्नी रुकमणि और राधा जी का एक साथ मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर की स्थापना से पहले यहां पर एक चमत्कारिक घटना हुई, जिसके बाद यहां पर बंशीवाला मंदिर की स्थापना हुई। मंदिर के पुजारी बताते है कि करीब 800 साल पहले इस मंदिर की स्थापना हुई थी। यहां पर बंशीवाला मंदिर से पहले पातालेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना हुई। ऐसा बताते हंै कि यहां पर पहले पहाड़ था और गाय चरने के लिए आती थी। लेकिन हमेशा एक गाय अपना दूध खुद से निकाल देती थी, तो इसका पता लगाने के लिए गाय का पीछा किया गया। पता चला कि जिस जमीन में शिवलिंग था, वहां पर गाय अपने आप दूध दे देती थी। इसके बाद पहाड़ की खुदाई की गई और यहां जमीन से शिवलिंग प्रकट हुआ। उसके बाद यहां पर पातालेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की गई।

