श्रीराम शर्मा
मनुष्य का यह हठ कि वह जिस प्रकार की अवस्थाएं एवं परिस्थितियां अपने लिए चाहता है उसके विपरीत स्थिति उसके सामने न आए, उसके दु:खों का एक विशेष कारण है। संसार का निर्माण किसी एक व्यक्ति के लिए तो हुआ नहीं, जिससे वह उसकी इच्छा के अनुसार ही गतिशील रहे।
केवल वे ही परिस्थितियां सामने लाए जिन्हें वह चाहता है। संसार का निर्माण तो जीवमात्र के लिए हुआ है। सभी प्राणी समान रूप से सुख के अधिकारी हैं। आज की जो परिस्थिति हमारे लिए सुखदायक है, वह किसी अन्य के लिए दु:खदायक हो सकती है। ऐसी अवस्था में उसका बदलना अनिवार्य है। क्योंकि जब तक वह बदलेगी नहीं, दु:खी रहने वाला व्यक्ति सुखी न हो सकेगा। हो सकता है कि जिस परिस्थिति में हमें दु:ख का अनुभव होता है वह किसी दूसरे के लिए सुख देने वाली हो। ऐसी दशा में उसका आना बहुत आवश्यक है। सुख-दु:ख का क्रमिक आवागमन संसार का शाश्वत विधान है। ऐसी दशा में केवल अपने मनोनुकूल परिस्थितियों का आग्रह न केवल स्वार्थ अपितु ईश्वरीय विधान के प्रति अस्वीकृति है, जो एक प्रकार से नास्तिकता, ईश्वर द्रोह एवं भयंकर पाप है। सुख-दु:ख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाए तो उसके लिए चिंता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जाएं। अपने प्रति सुखद परिस्थितियां पाकर जहां कोई प्रसन्न होता है, वहां प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उसे और न कुछ इसी विचार से प्रसन्न होना चाहिए जो परिस्थितियां मेरे लिए दु:ख का हेतु बनी हुई हैं उनमें कहीं न कहीं हमारा कोई दूसरा मानव-बंधु सुख का अनुभव प्राप्त कर रहा है। नि:संदेह वह मनुष्य बहुत ही दयनीय है जो सुख में तो प्रसन्न और अप्रिय परिस्थिति में आंसू बहाता है। वह प्रकृति के इस मोटे से विधान को नहीं समझ पाता कि जब उसे प्रसन्नता प्राप्त हुई है उससे पहले वह प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशान था। दु:ख के कारण दूर हुए और उसे सुख प्राप्त हुआ। आज जब वह दुखंद परिस्थितियों में है तो क्यों रोता है।
दु:ख के पीछे सुख और सुख के पीछे दु:ख संसार का एक अविकल नियम है, न तो यह कभी बदला है और न बदला जा सकता है। तब फिर निरर्थक द्वंद्वात्मक स्थिति को क्यों स्वीकार किया जाए। बड़ी से बड़ी आपत्ति और भयानक से भयानक दु:ख आने पर मनुष्य उससे अभिभूत रहता हुआ भी किसी न किसी समय क्षण भर को उसे भूल ही जाता है और एक शांतिपूर्ण स्वाभाविक अवस्था में आ जाता है तब क्या कारण है कि शांति के उस क्षणिक समय को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। वास्तविक बात तो यह है कि न तो दु:ख हमें हर समय पकड़े रहता है और न उसमें ऐसी कोई शक्ति होती है कि हमारे अनचाहे वह हमें अप्रसन्न अथवा विषादग्रस्त बनाए रहे। यदि ऐसा होता तो एक बार आए हुए दु:ख से मनुष्य कभी न छूट पाता।
आठों याम जीवनभर वह एक ही दुखंद स्थिति में तड़पता रहता। किंतु ऐसा कभी होता नहीं। दु:खद परिस्थितियां आती हैं, मनुष्य परेशान होता है और फिर एक दो दिन में वह स्थिति समाप्त हो जाती हैं। इसका ठीक-ठीक अर्थ यही है कि दु:ख-सुख का अपना कोई अस्तित्व अथवा प्रभाव नहीं है। उसकी वेदना हमारे स्वीकृति, अस्वीकृति पर निर्भर करती है। जिन परिस्थितियों को हम दु:खद स्वीकृत कर लेते हैं वे हमें दु:ख और जिन परिस्थितियों को हम सुखद स्वीकार कर लेते हैं वे हमें सुख देने लगती हैं। मनुष्य की यह स्वीकृति, अस्वीकृति एक मात्र उसके दृष्टिकोण तथा मानसिक स्तर पर निर्भर करती है।
यदि हमारा मानसिक स्तर गिरा हुआ है। हममें मनुष्योचित धीरता गंभीरता और सहिष्णुता की कमी है तो अवश्य ही हम जरा-जरा सी प्रतिकूलताओं में दु:खी होकर रोते कलपते रहेंगे। इसके विपरीत यदि हम अंदर से गंभीर आत्मा से ऊंचे हैं तो कोई भी परिस्थिति हमें प्रभावित नहीं कर सकती।

