बढ़ता कर्ज, सीमित संसाधन, बढ़ती जन अपेक्षाएं और केंद्र से मिलने वाले अनुदानों की सीमाएं- ये वास्तविकताएं हैं। लेकिन समाधान कर्मचारियों के अधिकारों में कटौती नहीं हो सकता। कर्मचारी शासन की कार्यक्षमता के केंद्र बिंदु माने जाते हैं…
सरकारी सेवा में प्रवेश पाने वाले युवा केवल एक नौकरी नहीं प्राप्त करते, बल्कि वर्षों की कड़ी मेहनत, प्रतियोगी परीक्षाओं की तपस्या, आर्थिक-मानसिक संघर्ष और पूरे परिवार की आशाओं को भी साथ लेकर आते हैं। जब वे लोक सेवा आयोग या चयन आयोग के माध्यम से कठिन परीक्षाएं पार कर चयनित होते हैं, तो उनके मन में एक मजबूत विश्वास जागता है कि अब उनकी सेवा शर्तें स्थिर, न्यायपूर्ण और संवैधानिक संरक्षण के अधीन होंगी। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का हालिया फैसला, जिसमें हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी भर्ती एवं सेवा शर्तें अधिनियम 2024 को पूरी तरह निरस्त कर दिया गया, इसी विश्वास की रक्षा का एक मजबूत प्रतीक है। यह निर्णय केवल एक विधेयक को रद्द करने तक सीमित नहीं है। यह राज्य सरकारों को स्पष्ट संदेश देता है कि कर्मचारियों के वैध अधिकारों को वित्तीय दबाव के नाम पर कुचला नहीं जा सकता। खासकर अनुबंध पर कार्यरत कर्मचारियों की वरिष्ठता, वार्षिक वेतन वृद्धि, वित्तीय लाभ, पदोन्नति और अन्य सेवा शर्तों को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से ही गिनने का सिद्धांत न्यायालय ने फिर से मजबूती से स्थापित किया है।
इस फैसले से प्रदेश के हजारों अनुबंध कर्मचारियों और नियमितीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहे युवाओं को बड़ी राहत मिली है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने वर्ष 2024 के शीतकालीन सत्र में यह अधिनियम पारित कराया था, जिसे फरवरी 2025 में राज्यपाल की सहमति भी मिल गई। विधेयक का मुख्य उद्देश्य अनुबंध कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समकक्ष लाभ प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से देने से इनकार करना था। इसके अनुसार वेतन, वरिष्ठता, वृद्धि, पदोन्नति और पेंशन जैसे लाभ केवल नियमितीकरण की तिथि से ही दिए जाते। इससे अनुबंध पर लंबे समय से सेवा दे रहे हजारों कर्मचारियों को न केवल आर्थिक नुकसान होता, बल्कि उनकी वरिष्ठता, पदोन्नति की संभावनाएं और भविष्य के पेंशनरी लाभ भी गंभीर रूप से प्रभावित होते। सरकार का तर्क था कि इससे राज्य पर वित्तीय बोझ कम होगा और नियमित तथा अनुबंध कर्मचारियों के बीच समानता स्थापित होगी। लेकिन कर्मचारी संगठनों ने इसे कर्मचारी-विरोधी रवैया बताया। उन्होंने कहा कि यह अधिनियम अनुबंध कर्मचारियों की वर्षों की सेवा को नकारने का प्रयास है, जो पहले से ही कम वेतन पर कड़ी मेहनत करते हैं। उच्च न्यायालय ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराया और पूरे कानून को रद्द कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि एक बार अदालत द्वारा दिए गए लाभों या स्थापित कानूनी सिद्धांतों को रेट्रोस्पेक्टिव कानून बनाकर निरस्त नहीं किया जा सकता। न्यायाधीशों की खंडपीठ ने जोर दिया कि अनुबंध सेवा को भी प्रारंभिक नियुक्ति मानते हुए वित्तीय लाभ, वरिष्ठता और परिणामी लाभ नियुक्ति की तिथि से ही दिए जाएं।
सरकार को इन लाभों को लागू करने की प्रक्रिया तीन माह के भीतर शुरू करने का निर्देश भी दिया गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार और अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता कर्मचारियों के अधिकारों की मजबूत गारंटी हैं। उच्च न्यायालय ने इस फैसले में पुष्टि की कि राज्य कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को केवल भाषणों और चुनावी घोषणाओं तक सीमित नहीं रख सकता। जब सरकारें वित्तीय संकट का हवाला देकर कर्मचारियों के अधिकारों में कटौती करती हैं, तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप संवैधानिक संतुलन बनाए रखने के लिए अनिवार्य हो जाता है। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह रेट्रोस्पेक्टिव कानून के दुरुपयोग को रोकता है। विधायिका कानून बना सकती है, लेकिन न्यायालय के फैसलों को प्रभावहीन बनाने या कर्मचारियों के हक को छीनने के लिए नहीं। इससे लोकतंत्र में शक्ति विभाजन का सिद्धांत और मजबूत होता है। हिमाचल उच्च न्यायालय ने पहले भी कई मामलों में अनुबंध सेवा को गिनने का सिद्धांत स्थापित किया है, जैसे दैनिक वेतनभोगी या अनुबंध कर्मचारियों की नियमितीकरण नीति में प्रारंभिक तिथि से सेवा गिनने के मामले। आज सरकारी नौकरियों में चयनित होने वाले युवा दो मुख्य श्रेणियों में आते हैं। पहली वे जो सीधे लोक सेवा आयोग या चयन आयोग के माध्यम से नियमित रूप से आते हैं। दूसरी वे जो अनुबंध पर शुरुआत करते हैं लेकिन वर्षों तक बिना किसी सुरक्षा के सेवा देते हैं। दोनों ही श्रेणियों में मेहनत समान है। अनुबंध कर्मचारी अक्सर कम वेतन, बिना पेंशन और अन्य सुविधाओं के लंबे समय तक काम करते हैं, फिर भी वे शिक्षा, स्वास्थ्य, वन, पर्यटन, राजस्व और अन्य विभागों में शासन व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी की तरह काम करते हैं। यदि उनकी सेवा अवधि को केवल नियमितीकरण की तिथि से गिना जाए, तो यह उनके साथ दोहरा अन्याय होगा- पहले कम वेतन पर काम करवाना, फिर वरिष्ठता और लाभों से वंचित रखना। उच्च न्यायालय का फैसला इस दोहरे मापदंड को अस्वीकार करता है। यह जोर देता है कि यदि प्रारंभिक नियुक्ति नियमों के अनुसार हुई है और सेवा निरंतर रही है, तो पूरी सेवा अवधि वरिष्ठता, वेतन वृद्धि और अन्य लाभों के लिए गिनी जाए। इसके अलावा प्रतियोगी परीक्षाओं से आए कर्मचारियों का मनोबल बनाए रखना बहुत जरूरी है।
वर्षों की तैयारी के बाद नौकरी पाने वाले युवा अगर सेवा शर्तों में अस्थिरता महसूस करते हैं, तो न केवल उनका उत्साह घटता है, बल्कि भ्रष्टाचार और कम कार्यक्षमता जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं। कई अध्ययनों और अनुभवों से पता चलता है कि सुरक्षित सेवा शर्तें कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ाती हैं और जनसेवा की गुणवत्ता सुधारती हैं। कोई भी राज्य सरकार वित्तीय चुनौतियों से अछूती नहीं है। बढ़ता कर्ज, सीमित संसाधन, बढ़ती जन अपेक्षाएं और केंद्र से मिलने वाले अनुदानों की सीमाएं- ये वास्तविकताएं हैं। लेकिन समाधान कर्मचारियों के अधिकारों में कटौती नहीं हो सकता। कर्मचारी शासन की कार्यक्षमता के केंद्र बिंदु हैं। यदि उनका मनोबल गिरता है, तो प्रशासनिक दक्षता, नीतियों का क्रियान्वयन और अंतत: जनसेवा दोनों प्रभावित होती हैं। सरकार को वैकल्पिक रास्ते अपनाने चाहिए। कर्मचारी हित सुरक्षित होने चाहिएं।
सिकंदर बंसल
शिक्षाविद
