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क्या वाकई प्रेत आत्माओं को देखकर रोते हैं कुत्ते? वैज्ञानिकों ने किया बड़ा खुलासा

क्या वाकई प्रेत आत्माओं को देखकर रोते हैं कुत्ते? वैज्ञानिकों ने किया बड़ा खुलासा

Doon Horizon 1 week ago

ई दिल्ली, 04 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। इंसान और कुत्तों का रिश्ता सदियों पुराना है, जहाँ कुत्ते को वफादारी का सबसे बड़ा मानक माना जाता है। इसके विपरीत, बिल्लियों को अक्सर उनके स्वतंत्र और कई बार अवसरवादी स्वभाव के लिए देखा जाता है, जहाँ एक दिन की नाराजगी उनके व्यवहार को पूरी तरह बदल सकती है।

लेकिन इन सबके बीच एक सवाल हमेशा से अनसुलझा रहा है कि आखिर कुत्ते रात के अंधेरे में रोते क्यों हैं?

भारतीय समाज में बुजुर्गों के बीच यह धारणा गहरे तक पैठी है कि कुत्ते का रोना किसी अनहोनी या मृत्यु का पूर्वाभास है। कई लोग इसे इस बात से भी जोड़ते हैं कि कुत्ते अपनी विशेष इंद्रियों की मदद से उन प्रेत आत्माओं को देख सकते हैं, जिन्हें नग्न आंखों से देखना इंसान के लिए संभव नहीं है। जब कोई कुत्ता आधी रात को अचानक कराहने या रोने जैसी आवाजें निकालता है, तो उसे अक्सर नकारात्मक ऊर्जा की मौजूदगी का संकेत माना जाता है।

हालांकि, विज्ञान इन मान्यताओं को पूरी तरह सिरे से खारिज करता है। जूलॉजिस्ट और पशु व्यवहार विशेषज्ञों के अनुसार, कुत्तों के इस शोर को ‘हाउल’ (Howl) कहा जाता है। अनुवांशिक रूप से कुत्ते भेड़ियों के वंशज हैं और उनकी कई आदतें आज भी अपने जंगली पूर्वजों से मिलती-जुलती हैं। जिस तरह भेड़िए जंगल में अपने समूह के सदस्यों को बुलाने या अपनी लोकेशन बताने के लिए हाउलिंग करते हैं, गली के कुत्ते भी वही तकनीक अपनाते हैं।

कुत्तों में अपने इलाके (Territory) को लेकर जबरदस्त स्वामित्व की भावना होती है। हर गली का कुत्ता अपने क्षेत्र को चिह्नित करके रखता है। जब कोई बाहरी कुत्ता उस सीमा में घुसने की हिमाकत करता है, तो वहां मौजूद कुत्ता हाउल करके अपने पूरे कुनबे को आगाह कर देता है। यह एक तरह का ‘वॉर सायरन’ होता है, जो दूसरे साथियों को घुसपैठिए पर नजर रखने के लिए अलर्ट करता है।

इसके अलावा, कुत्तों की सुनने की क्षमता इंसानों से कहीं अधिक संवेदनशील होती है। घरों में बर्तनों के गिरने की आवाज, तेज संगीत या किसी मशीन का शोर उन्हें विचलित कर सकता है। इस शोर के प्रति अपना विरोध दर्ज कराने के लिए भी वे रोने जैसी आवाजें निकालते हैं। कभी-कभी यह उनकी शारीरिक पीड़ा, चोट या अकेलेपन की हताशा का भी इजहार होता है। अतः इसे महज अंधविश्वास से जोड़ना उनकी स्वाभाविक संचार प्रक्रिया को नजरअंदाज करने जैसा है।

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