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अगस्त से अक्टूबर 2026 तक दुनिया के मौसम पर रहेगा अल नीनो का असर: डब्ल्यूएमओ

अगस्त से अक्टूबर 2026 तक दुनिया के मौसम पर रहेगा अल नीनो का असर: डब्ल्यूएमओ

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने कहा है कि अल नीनो लगातार मजबूत हो रहा है और अगस्त से अक्टूबर 2026 के दौरान दुनिया के मौसम पर इसका बड़ा असर देखने को मिलेगा। इसके कारण दुनिया के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक गर्मी पड़ने का अंदेशा है।

साथ ही कई क्षेत्रों में बारिश के पैटर्न में भी बड़े बदलाव हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बार अल नीनो के साथ हिंद महासागर में बनने वाला सकारात्मक इंडियन ओशन डाइपोल भी मौसम को प्रभावित करेगा।

कई देशों में बढ़ेगी गर्मी

डब्ल्यूएमओ के अनुसार, आने वाले महीनों में दुनिया के अधिकांश भूभाग पर सामान्य से अधिक तापमान रहने के आसार हैं। अफ्रीका, दक्षिणी यूरोप, अरब प्रायद्वीप, भारतीय उपमहाद्वीप, पूर्वी एशिया, मध्य अमेरिका, कैरेबियन, दक्षिणी अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका के बड़े हिस्से और न्यूजीलैंड में गर्मी सामान्य से ज्यादा रह सकती है। समुद्रों का तापमान भी पहले से काफी अधिक बना हुआ है, जिससे मौसम की चरम घटनाएं बढ़ सकती हैं।

बारिश के पैटर्न में होगा बदलाव

अल नीनो का असर केवल तापमान तक सीमित नहीं रहेगा। इससे कई क्षेत्रों में बारिश का स्वरूप भी बदल सकता है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार, पूर्वी अफ्रीका, मध्य एशिया, दक्षिणी यूरोप, पश्चिमी उत्तरी अमेरिका और दक्षिण-पूर्वी दक्षिण अमेरिका में सामान्य से अधिक बारिश होने की आशंका है। वहीं भारत सहित पूरे भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिणी और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया, मध्य अमेरिका के दक्षिणी भाग, कैरेबियन के कुछ हिस्सों, उत्तर-पश्चिमी दक्षिण अमेरिका और उत्तरी यूरोप में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है।

सूखा, बाढ़ और जंगलों में आग का खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत अल नीनो और सकारात्मक इंडियन ओशन डाइपोल मिलकर कई क्षेत्रों में सूखा, बाढ़ और जंगलों में आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ा सकते हैं। लंबे समय तक चलने वाली गर्मी से खेती, जल संसाधनों और लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है। कई देशों में पानी की कमी और फसलों को नुकसान होने की आशंका भी जताई गई है।

संयुक्त राष्ट्र ने जताई चिंता

रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के हवाले से कहा गया है कि अल नीनो अब केवल आने वाला खतरा नहीं है, बल्कि इसका असर शुरू हो चुका है। उन्होंने कहा कि दुनिया पहले ही बढ़ती गर्मी, समुद्रों के रिकॉर्ड तापमान और भीषण जंगलों की आग जैसी घटनाओं का सामना कर रही है। ऐसे में जीवाश्म ईंधन का लगातार उपयोग इस संकट को और गंभीर बना रहा है। उन्होंने देशों से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तेजी से कदम उठाने की अपील की।

समय रहते तैयारी की जरूरत

रिपोर्ट में डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा कि अल नीनो दुनिया की सबसे अधिक निगरानी की जाने वाली जलवायु घटनाओं में से एक है। हालांकि केवल मौसम का पूर्वानुमान देना ही पर्याप्त नहीं है। सबसे जरूरी बात यह है कि सरकारें, संस्थाएं और आम लोग समय रहते तैयारी करें। यदि पहले से सही जानकारी मिल जाए तो प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

क्या होता है अल नीनो

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। यह घटना आमतौर पर हर दो से सात साल के बीच होती है और करीब नौ से बारह महीने तक बनी रह सकती है। इसका असर केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। हर बार इसका प्रभाव अलग-अलग हो सकता है क्योंकि यह अन्य जलवायु प्रणालियों के साथ मिलकर काम करता है।

देशों की मदद करेगा डब्ल्यूएमओ

डब्ल्यूएमओ ने कहा है कि वह दुनिया भर के देशों को समय पर मौसम संबंधी जानकारी और चेतावनी उपलब्ध करा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, मानवीय संगठनों और विभिन्न देशों की सरकारों के साथ लगातार बैठकें और तकनीकी चर्चा की जा रही हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि होने वाले खतरों की जानकारी पहले से मिल सके और आवश्यक तैयारी की जा सके।

सतर्क रहने की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम का यह पूर्वानुमान संभावनाओं पर आधारित है, इसलिए हर क्षेत्र में एक जैसा असर नहीं होगा। फिर भी आने वाले महीनों में बढ़ती गर्मी और बदलते बारिश के पैटर्न को देखते हुए सरकारों और लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है। समय पर योजना और तैयारी से अल नीनो के होने वाले दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Down to Earth Hindi