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मौसम विभाग ने घटाया मानसून का पूर्वानुमान, अब कहा- सामान्य से 90 फीसदी कम होगी बारिश

मौसम विभाग ने घटाया मानसून का पूर्वानुमान, अब कहा- सामान्य से 90 फीसदी कम होगी बारिश

मौसम विज्ञाग विभाग ने 29 मई 2026 को दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान होने वाली बारिश के अपने अनुमान को संशोधित करते हुए इसे दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का 90 प्रतिशत कर दिया है।

मौसम विभाग के अनुसार, इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से कम रहने की संभावना 60 प्रतिशत है।

इसका अर्थ है कि देश के कई क्षेत्रों में सामान्य से काफी कम वर्षा हो सकती है और कुछ इलाकों में सूखे जैसी परिस्थितियां भी पैदा हो सकती हैं। जून में सामान्य से कम बारिश और अधिक तापमान के कारण देश के अनेक हिस्सों में सामान्य से अधिक और तीव्र लू चलने की आशंका है।

जब किसी वर्ष मानसून के दौरान देशभर में होने वाली कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत के 90 से 95 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान होता है, तो उसे 'सामान्य से कम' मानसून कहा जाता है। मानसून का दीर्घकालिक औसत 1971 से 2020 के बीच दर्ज औसत वर्षा के आधार पर तय किया जाता है, जो लगभग 868.6 मिलीमीटर है।

यदि बारिश इस औसत के 90 प्रतिशत से भी कम रहती है, तो उस मानसून को 'अल्पवर्षा' वाला मानसून माना जाता है।

इससे पहले 13 अप्रैल को मौसम विभाग ने अनुमान लगाया था कि 2026 के मानसून मौसम में वर्षा एलपीए का 92 प्रतिशत रहेगी। उस समय अल्पवर्षा वाले मानसून की संभावना 35 प्रतिशत बताई गई थी। अब संशोधित अनुमान में वर्षा का पूर्वानुमान घटाकर 90 प्रतिशत कर दिया गया है और अल्पवर्षा की आशंका बढ़कर 60 प्रतिशत हो गई है।

देश के विभिन्न समरूप क्षेत्रों में केवल पूर्वोत्तर भारत में ही सामान्य वर्षा (दीर्घकालिक औसत का 96-104 प्रतिशत) होने की संभावना है। इसके विपरीत, उत्तर-पश्चिम भारत (औसत के 92 प्रतिशत से कम), मध्य भारत तथा दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत (औसत के 94 प्रतिशत से कम) में वर्षा सामान्य से कम रहने का अनुमान है।

मानसून के मुख्य क्षेत्र, जिसमें मध्य, पश्चिमी और पूर्वी भारत के वे इलाके शामिल हैं जहां कृषि का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा पर निर्भर है, वहां भी सामान्य से कम वर्षा (औसत के 94 प्रतिशत से कम) होने की संभावना जताई गई है। इससे इन क्षेत्रों में पहले से मौजूद कृषि संकट और गहरा सकता है।

मौसम विभाग ने अपने प्रेस वक्तव्य में कहा, 'जून से सितंबर 2026 के दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम मौसमी वर्षा होने की संभावना है। हालांकि उत्तर-पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों, दक्षिणी प्रायद्वीप के पूर्वी हिस्सों तथा पूर्व-मध्य भारत से लगे इलाकों और पूर्वी भारत के कुछ अलग-थलग क्षेत्रों में सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है।'

आईएमडी के अनुसार, 2026 में अल्पवर्षा (डेफिसिएट) वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून की संभावना 60 प्रतिशत है, जबकि सामान्य से कम वर्षा वाले मानसून की संभावना 24 प्रतिशत है। इसका अर्थ है कि कुल मिलाकर 84 प्रतिशत संभावना है कि इस वर्ष मानसून सामान्य से कम या अल्पवर्षा वाला रहेगा।

कम वर्षा का असर जून से ही दिखाई देना शुरू हो सकता है। जून महीने में वर्षा औसत के 92 प्रतिशत से कम रहने का अनुमान है। इसके साथ ही दिन और रात दोनों समय तापमान सामान्य से अधिक रहने तथा देश के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक और अधिक तीव्र लू चलने की आशंका व्यक्त की गई है। इससे कृषि, जल संसाधनों और जनस्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

जून 2026 में अधिकतम तापमान (दिन का तापमान) के संदर्भ में जम्मू और बिहार के कई हिस्सों तथा पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मिजोरम और त्रिपुरा के कुछ क्षेत्रों में तापमान सामान्य से कम रह सकता है। हालांकि देश के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।

न्यूनतम तापमान (रात का तापमान) की बात करें तो केवल दक्षिणी ओडिशा, छत्तीसगढ़ और उत्तरी आंध्र प्रदेश के कुछ इलाकों में सामान्य से कम तापमान रहने की संभावना है। इसके विपरीत, देश के बाकी अधिकांश हिस्सों में जून 2026 के दौरान रात का तापमान सामान्य या सामान्य से अधिक रह सकता है।

सामान्य से कम वर्षा और दिन-रात दोनों समय बढ़े हुए तापमान के कारण देश के विभिन्न भागों में लू (हीटवेव) और रातें गर्म रहने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

मौसम विभाग ने अपने बयान में कहा है कि जून 2026 के दौरान उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, गुजरात और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक लू वाले दिन दर्ज किए जा सकते हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ अलग-थलग क्षेत्रों में भी लू की स्थिति सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।

हालांकि राजस्थान और झारखंड में सामान्य से कम लू वाले दिनों का अनुमान लगाया गया है।

मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि जून 2026 में लू की बढ़ती आशंका का सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल उपलब्धता, बिजली की खपत और आवश्यक सेवाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों, खुले में काम करने वाले श्रमिकों और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों पर अत्यधिक गर्मी का जोखिम अधिक रहेगा।

मौसम एजेंसी ने यह भी कहा कि लगातार उच्च तापमान से बुनियादी ढांचे और संसाधन प्रबंधन प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। संभावित परिस्थितियों को देखते हुए राज्य सरकारों और जिला प्रशासनों को आवश्यक तैयारियां करने की सलाह दी गई है। इनमें शीतलन केंद्रों (कूलिंग शेल्टर) को संचालित रखने, सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने, स्वास्थ्य निगरानी को मजबूत करने और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र को सक्रिय रखने जैसे कदम शामिल हैं।

अल नीनो का बढ़ता खतरा

आईएमडी के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो परिस्थितियों के विकसित होने की संभावना 92 प्रतिशत है। दूसरी ओर, भारतीय महासागर द्विध्रुव (आईओडी) के सकारात्मक चरण के विकसित होने की संभावना अपेक्षाकृत कम आंकी गई है।

अल नीनो, साउथर्न ऑसकिलेशन (ईएनएसओ) का गर्म चरण होता है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का समुद्री सतह तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। अतीत में कई बार अल नीनो की स्थिति भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा को कमजोर करने से जुड़ी रही है।

इसके विपरीत, जब इंडियन ओसियन डायपोल का सकारात्मक चरण सक्रिय होता है और भारतीय महासागर का पश्चिमी भाग पूर्वी भाग की तुलना में अधिक गर्म होता है, तब भारत में मानसूनी वर्षा को बढ़ावा मिलता है। सकारात्मक आईओडी, एल नीनो के कुछ नकारात्मक प्रभावों की भरपाई भी कर सकता है।

इस बार यदि अल नीनो मजबूत होता है और सकारात्मक आईओडी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं होता, तो मानसून पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे वर्षा में कमी, कृषि पर असर, जल संकट और गर्मी की घटनाओं में वृद्धि की आशंका और प्रबल हो जाएगी।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Down to Earth Hindi