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क्या भारत कभी महिलाओं के लिए सुरक्षित हो पाएगा?

क्या भारत कभी महिलाओं के लिए सुरक्षित हो पाएगा?

DW 1 day ago
भारतीय राजधानी नई दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर युवा लड़कियां तख्तियां लेकर उतरी हैं. ये नई पीढ़ी की जरूर हैं लेकिन इनका मुद्दा वही है- महिला सुरक्षा.2016 में भारत के अलग-अलग शहरों के सार्वजनिक पार्कों में अचानक लड़कियां और औरतें सोती हुई दिखती थीं.
एक ऐसे देश में जहां सार्वजनिक जगहों पर औरतों की मौजूदगी आज भी विशेषाधिकार के दायरे में आती है वहां ये नजारे चौंकाने वाले तो थे. इस अभियान की शुरुआत की थी 'ब्लैंक नॉइज' नाम की संस्था ने. मकसद था पब्लिक स्पेस में लड़कियों को सुरक्षित महसूस करवाना. उन्हें यह एहसास दिलाना कि ये जगहें उनकी भी उतनी ही हैं जितनी पुरुषों की.

इस अभियान के करीब एक दशक बाद दिल्ली की सड़कों पर कॉलेज की लड़कियां फिर से पूछ रही हैं कि क्या लड़कियां पब्लिक पार्क में अपनी मर्जी से, अपने तय किए गए वक्त पर नहीं जा सकतीं? अगर सार्वजनिक जगहों पर यौन हिंसा की घटनाएं होती हैं तो क्या इसका उपाय यह है कि लड़कियों को वहां जाने से ही मना कर दिया जाए? ये सलाह और उपाय रेलवे स्टेशन पर लिखी लाइन 'यात्री अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें' जितनी सतही लगती है. जिसके साथ हिंसा हो रही है या होने की संभावना है, उससे बचने की जिम्मेदारी भी क्या उसी की है?

21 सितंबर को राजधानी दिल्ली के एक पब्लिक पार्क आस्था कुंज में खुद को पुलिसकर्मी बताकर तीन पुरुषों ने एक नाबालिग का रेप किया. घटना के बाद स्थानीय प्रशासन डीडीए ने सलाह दी कि सूरज ढलने के बाद पार्क में किसी को जाने की इजाजत नहीं होगी. इस घटना के बाद एक आरोपी को पुलिसिया कार्रवाई में गोली भी लगी. यह सब भारत के जाने-माने लेडी श्री राम कॉलेज के आसपास हुआ.

इसके बाद कॉलेज ने 22 सितंबर को क्लास सस्पेंड कर दी थी. कॉलेज प्रशासन के एक कर्मचारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि घटना के बाद छात्राएं घबरा गई थीं जिसके कारण उन्हें क्लास रद्द करनी पड़ी. वही सवाल, वही मांग इस घबराहट के माहौल को प्रदर्शन के माहौल में बदलने में देर भी नहीं लगी. दिल्ली के लेडी श्रीराम, गार्गी कॉलेज, मिरांडा हाउस समेत कई कॉलेजों की छात्राएं इन घटनाओं के खिलाफ सड़कों पर निकल आईं.

दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन हुए. कई सार्वजनिक पार्कों में लड़कियां और महिलाएं धरने पर बैठीं. ऐसा करने वाला शायद इन कॉलेजों का यह पहला बैच नहीं होगा. देशभर में कई ऐसे मौके आए हैं जहां स्टूडेंट अपनी सुरक्षा की मांग को लेकर सड़कों पर उतरी हैं.

मिरांडा हाउस की छात्रा रह चुकी आशिका शिवांगी कहती हैं, "ये सिर्फ मेरे अनुभव नहीं रहे हैं. कॉलेज के गेट से बाहर निकलते ही ज्यादातर लड़कियों को अनचाहे कॉमेंट्स तो सुनने को मिल ही जाते थे. खासकर कपड़ों पर तो ना जाने कितने कॉमेंट्स होते थे. अभी की स्थिति देखकर लगता है तीन चार साल बाद भी सब वैसा ही है.” 2026 में भारतीय राजधानी की युवा लड़कियां पार्क में, कॉलेज के रास्ते में सुरक्षित महसूस करने की मांग कर रही हैं.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर दिन करीब यौन हिंसा के करीब 80 मामले दर्ज होते हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि देश के 90 फीसदी ऐसे मामले तो कभी दर्ज ही नहीं होते. ऐसे में सुरक्षा सुनिश्चित करने में देश कहां चूक रहा है? संसद में महिला सुरक्षा पर विशेष सत्र की मांग महिला अधिकार कार्यकर्ता और नई दिल्ली में छात्राओं के साथ प्रदर्शनों को लीड कर रही योगिता भयाना डीडब्ल्यू से कहती हैं, "यह कहना दरअसल गलत होगा कि हम फिर से वहीं वापस लौट आए हैं महिला सुरक्षा के मुद्दे पर.

सच्चाई यह है कि हम कभी आगे बढ़े ही नहीं थे. पेपर पर लगता है कि आगे बढ़े हैं लेकिन निर्भया केस के बाद हम आगे नहीं बढ़े हैं. सिर्फ कानून बदले हैं, बयान दिए गए हैं. महिला सुरक्षा के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चलाया गया है लेकिन हालात नहीं बदले.

मैं कहूंगी कि यहां महिला सुरक्षा पर जीरो एक्शन लिया गया है.” दिल्ली की घटना के एक दो दिन पहले ही बिहार के जमुई जिले में एक नाबालिग का उत्पीड़न कर, सोशल मीडिया पर उसका वीडियो वायरल कर दिया गया था. उस घटना के बाद कई ऐसे वीडियो भी सामने आए जहां आरोपियों के गांव वाले उनके पक्ष में दलील देते दिखे. उन्होंने कहा कि गलती उस लड़की की थी जो अंधेरे में एक लड़के के साथ घूम रही थी. योगिता कहती हैं, "महिला सुरक्षा पर कानून कौन लागू कर रहे हैं वही लोग जिनकी सोच एक जैसी है.

हमने महिला विरोधी सोच को बदलने पर काम नहीं किया. हमारे समाज के अधिकतर पुरुषों की सोच कहती है कि औरतें एक ‘ऑब्जेक्ट' हैं, जो उनके लिए हैं. क्या हमने इस सोच को बदलने के लिए कुछ किया. निर्भया केस के बाद हमने सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी कि हमें लैंगिक संवेदनशीलता को शिक्षा में शामिल करने की जरूरत है लेकिन ना पहले की सरकारों ने इस पर काम किया न ही मौजूदा सरकार ने.” सिर्फ महिलाओं का मुद्दा नहीं है महिला सुरक्षा बात जब भी महिलाओं की सुरक्षा की आती है तो इसे ‘महिला मुद्दे' तक ही सीमित रखा जाता है.

लेकिन जो विषय देश की 71 करोड़ आबादी को प्रभावित करे, वह सिर्फ महिलाओं और लड़कियों का मुद्दा नहीं हो सकता. रोजमर्रा के जीवन में सुरक्षित महसूस करना सिर्फ एक लैंगिक मुद्दा नहीं है बल्कि एक नागरिक के बुनियादी अधिकारों में भी शामिल है. पब्लिक स्पेस में सुरक्षा का ना होना महिलाओं और लड़कियों को आम जीवन से दूर करता है. उदाहरण के तौर पर बलात्कार की घटना पर क्लास का रद्द होना.

लेकिन यह सिर्फ क्लास रद्द होने भर तक सीमित नहीं होता. ‘कहीं कुछ हो ना जाए' का डर भारत में लाखों लड़कियों की पढ़ाई छोड़ने की वजह बनता है. दिल्ली में जारी प्रदर्शन में शामिल छात्राओं की मांग है कि महिला सुरक्षा को लेकर बने कानूनों को लागू करने पर जोर हो. इसके साथ ही योगिता ने बताया कि उन लोगों ने यह भी मांग रखी है कि संसद में इस मुद्दे पर दो दिनों का विशेष सत्र बुलाया जाए.
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