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अमेरिका ने वेनेजुएला के 65 अरब बैरल तेल पर कब्जा जमाने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाए

अमेरिका ने वेनेजुएला के 65 अरब बैरल तेल पर कब्जा जमाने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाए

New Delhi: वेनेजुएला की जमीन के नीचे दबे अरबों बैरल तेल ने एक बार फिर दुनिया की राजनीति में भूचाल ला दिया है। आरोप और दावे ऐसे हैं कि अगर इन्हें एक साथ जोड़कर देखें तो पूरा मामला किसी बड़े जियोपॉलिटिकल ऑपरेशन से कम नहीं लगता।

दावा है कि अमेरिका ने वेनेजुएला के करीब 65 अरब बैरल प्रमाणित तेल भंडार पर प्रभाव बढ़ाने के लिए सैन्य दबाव से लेकर आर्थिक प्रतिबंध और कानूनी बदलाव तक कई मोर्चों पर रणनीति अपनाई। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से इस समझौते को इतिहास की सबसे बड़ी तेल डील बताए जाने की बात भी सामने आई है।

मामला सिर्फ तेल का नहीं, पूरी ताकत का है

वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित कच्चा तेल भंडार है। यही वजह है कि लंबे समय से अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तेल सिर्फ कारोबारी मुद्दा नहीं रहा, बल्कि दोनों देशों की विदेश नीति और सत्ता की राजनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। दावा है कि अमेरिका की रणनीति का मकसद सिर्फ तेल खरीदना नहीं, बल्कि वेनेजुएला के तेल उत्पादन और उसके आर्थिक ढांचे पर अपना प्रभाव बढ़ाना है। इसके लिए सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंध, तेल निर्यात पर रोक और निजी कंपनियों के लिए रास्ता खोलने जैसे कदमों का इस्तेमाल किए जाने की बात कही जा रही है।

ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व का दावा

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गंभीर दावा अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से जुड़ा है। दिए गए विवरण के मुताबिक जनवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के निर्देश पर वेनेजुएला में एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया गया, जिसे 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व' नाम दिया गया। दावे के अनुसार इस अभियान का सबसे बड़ा लक्ष्य तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलास मादुरो थे। कहा गया कि अमेरिकी बलों ने उन्हें और उनकी पत्नी को उनके परिसर से गिरफ्तार कर अमेरिका पहुंचाया। इसके बाद मादुरो के खिलाफ नार्को-टेररिज्म और मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े आरोप लगाए गए।

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मादुरो के बाद सत्ता का समीकरण बदला

मादुरो के सत्ता से हटने के बाद वेनेजुएला में डेल्सी रोड्रिग्ज के नेतृत्व में अंतरिम व्यवस्था बनने की बात कही गई है। इसके बाद दोनों देशों के बीच बातचीत और तेल कारोबार को लेकर नया समीकरण तैयार होने का दावा किया जा रहा है। आलोचकों का आरोप है कि इस बदलाव के बाद वेनेजुएला के आर्थिक और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में अमेरिकी प्रभाव बढ़ गया। दूसरी तरफ अमेरिका की तरफ से इसे वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने और तेल उद्योग में निवेश लाने की रणनीति के तौर पर पेश किया जा सकता है।

तेल उद्योग में सबसे बड़ा कानूनी बदलाव

दावे के मुताबिक डेल्सी रोड्रिग्ज के नेतृत्व में वेनेजुएला ने अपने तेल क्षेत्र में बड़े कानूनी बदलाव किए। इसका मकसद विदेशी और निजी कंपनियों को तेल उद्योग में ज्यादा भूमिका देना बताया जा रहा है। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ह्यूगो शावेज के दौर में वेनेजुएला ने तेल उद्योग पर सरकारी नियंत्रण मजबूत किया था। विदेशी कंपनियों और खास तौर पर अमेरिकी तेल कंपनियों की भूमिका को सीमित करने की नीति अपनाई गई थी।

प्रतिबंधों से तेल कारोबार पर दबाव

अमेरिका ने लंबे समय से वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA पर प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों का असर देश के तेल निर्यात और अर्थव्यवस्था पर पड़ा। वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था पहले से ही आर्थिक संकट, उत्पादन में गिरावट और निवेश की कमी जैसी समस्याओं से जूझती रही है। दिए गए विवरण में कैरेबियन क्षेत्र में तेल टैंकरों पर अमेरिकी दबाव और जहाजों को जब्त किए जाने जैसे दावे भी किए गए हैं। अगर किसी व्यापक नौसैनिक नाकेबंदी की बात की जा रही है तो इसके लिए स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि जरूरी होगी।

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100 साल की डील ने बढ़ाया सस्पेंस

अब आते हैं इस पूरे मामले के सबसे बड़े दावे पर। बताया जा रहा है कि वेनेजुएला के प्रमुख तेल क्षेत्रों में एक नई पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए लंबे समय के लिए तेल उत्पादन का अधिकार दिया गया है। दावे के मुताबिक यह अवधि 100 साल तक हो सकती है और साझेदारी में अमेरिका को उत्पादन का 55 फीसदी प्रभावी हिस्सा हासिल होगा। इसके साथ ही लागत मूल्य पर तेल खरीदने का अधिकार और तेल से मिलने वाले फंड पर प्रभाव की बात भी कही जा रही है।

65 अरब बैरल यानी कितना बड़ा खजाना?

65 अरब बैरल का आंकड़ा अपने आप में चौंकाने वाला है। भारत हर साल बड़ी मात्रा में कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में 65 अरब बैरल का भंडार भारत की दशकों की तेल जरूरत के बराबर बैठ सकता है। यही वजह है कि वेनेजुएला का तेल अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। अगर वहां उत्पादन बढ़ता है और अमेरिकी कंपनियों को बड़े पैमाने पर निवेश का मौका मिलता है तो अमेरिका अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर सकता है।

क्या तेल की कीमतों पर पड़ेगा असर?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका असर भारत जैसे तेल आयातक देशों पर क्या होगा। अगर वेनेजुएला का उत्पादन आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अतिरिक्त तेल पहुंचता है तो सप्लाई बढ़ सकती है। लेकिन इससे तुरंत पेट्रोल-डीजल सस्ता हो जाएगा, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर OPEC के फैसले, रूस और मध्य-पूर्व के उत्पादन, वैश्विक मांग, युद्ध और समुद्री व्यापार जैसे कई कारकों का असर पड़ता है।

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