New Delhi: भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। केरलम में विजयन सरकार के पतन के साथ ही देश में वामपंथी दलों की सत्ता का पूरी तरह अंत हो गया है। 1977 के बाद यह पहला अवसर है जब भारत के किसी भी राज्य में वाम दलों की सरकार नहीं बची है।
कभी मजबूत पकड़ रखने वाली वाम राजनीति अब अपने सबसे कमजोर दौर में दिखाई दे रही है।
केरल: आखिरी गढ़ भी हाथ से निकला
केरल को लंबे समय से वामपंथी विचारधारा का मजबूत केंद्र माना जाता रहा है। यहां वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) के बीच सत्ता का लगातार बदलाव होता रहा। पिछले 10 वर्षों से एलडीएफ की सरकार थी और उसे लगातार तीसरी बार जीत की उम्मीद थी, लेकिन इस बार यूडीएफ ने बाजी मार ली। गौरतलब है कि केरल वामपंथी दलों का अंतिम किला था, जिसके गिरने के बाद अब देश में उनका कोई भी राज्य सरकार में प्रतिनिधित्व नहीं बचा है।
1957 से शुरू हुआ सफर
केरलम में 1957 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने पहली बार सरकार बनाई थी। ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में बनी यह सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई दुनिया की पहली वामपंथी सरकार मानी जाती है। यह भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के लिए भी एक ऐतिहासिक घटना थी।
पश्चिम बंगाल: तीन दशक का लंबा शासन
पश्चिम बंगाल वामपंथी राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ रहा है। 1977 से 2011 तक यहां वाम दलों का लगातार शासन रहा। ज्योति बसु और बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे नेताओं के नेतृत्व में वाम दलों ने राज्य की राजनीति पर गहरी पकड़ बनाए रखी। हालांकि 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने 34 साल पुराने इस शासन को खत्म कर दिया। औद्योगीकरण और भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों ने वाम दलों के जनाधार को कमजोर कर दिया।
त्रिपुरा: 25 साल का सफर खत्म
त्रिपुरा में भी वाम दलों ने 1977 से अपनी पकड़ मजबूत की थी। माणिक सरकार के नेतृत्व में वाम सरकार ने लंबे समय तक शासन किया, लेकिन 2018 में भाजपा के उभार के साथ ही यहां भी वामपंथ का अंत हो गया। युवाओं में रोजगार और वेतन से जुड़े मुद्दों ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वैश्विक स्तर पर भी घटती पकड़
वामपंथी राजनीति का प्रभाव केवल भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी घट रहा है। आज रूस, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे कुछ ही देश हैं जहां वाम विचारधारा की सरकारें बची हैं। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन जरूर है, लेकिन उसकी नीतियों में पूंजीवाद का प्रभाव साफ दिखाई देता है।

