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Loan Against Shares Limit: अब शेयरों बदले ₹1 करोड़ तक ही मिलेगा लोन, निवेशकों और बैंकों पर पड़ेगा ये असर

Loan Against Shares Limit: अब शेयरों बदले ₹1 करोड़ तक ही मिलेगा लोन, निवेशकों और बैंकों पर पड़ेगा ये असर

Loan Against Shares Limit: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश की वित्तीय स्थिरता को मजबूत करने और शेयर बाजार में सट्टेबाजी की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने के लिए 'शेयरों के बदले ऋण' (Loan Against Shares - LAS) के नियमों में ऐतिहासिक बदलाव किए हैं।

नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अब कोई भी व्यक्ति पूरे बैंकिंग सिस्टम से शेयरों के बदले कुल मिलाकर अधिकतम ₹1 करोड़ तक का ही कर्ज ले सकेगा।

विशेष बात यह है कि आरबीआई ने इन कड़े नियमों को लागू करने की समयसीमा को थोड़ा आगे बढ़ाते हुए अब 1 जुलाई 2026 कर दिया है, जिससे बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपनी प्रणालियों को दुरुस्त करने के लिए अतिरिक्त समय मिल गया है।

क्या है 'सिस्टम-वाइड' कैप का मतलब?


अब तक के नियमों में एक बड़ी कमी यह थी कि निवेशक अलग-अलग बैंकों से अलग-अलग कर्ज सीमा का लाभ उठा लेते थे। उदाहरण के लिए, यदि एक बैंक की सीमा ₹20 लाख थी, तो निवेशक पांच अलग-अलग बैंकों से ₹20-20 लाख लेकर कुल ₹1 करोड़ जुटा लेता था। आरबीआई के नए 'सिस्टम-व्यापी' (System-wide) नियम ने इस रास्ते को बंद कर दिया है। अब पैन (PAN) आधारित ट्रैकिंग के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि एक व्यक्ति का कुल कर्ज, चाहे वह कितने भी बैंकों से लिया गया हो, ₹1 करोड़ से ऊपर न जाए। यह कदम बाजार में 'लीवरेज' (उधार के पैसे से निवेश) को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया है।

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IPO और ESOP के लिए विशेष नियम


नए सर्कुलर में आईपीओ (IPO) में निवेश के लिए लिए जाने वाले कर्ज पर भी सख्ती बरती गई है।

आईपीओ और एफपीओ: यदि कोई निवेशक नए शेयरों को खरीदने के लिए कर्ज लेता है, तो उसकी सीमा अभी भी सीमित रखी गई है ताकि लिस्टिंग गेन के लिए बैंकों के पैसे का अत्यधिक उपयोग न हो।

ईएसपीओ: कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजनाओं (ESOP) के तहत शेयर खरीदने के लिए भी कर्ज की सीमाओं को स्पष्ट किया गया है।

समयसीमा में विस्तार और कॉर्पोरेट गारंटी


आरबीआई ने पहले इन नियमों को 1 अप्रैल 2026 से लागू करने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) ने डेटा एकीकरण और तकनीकी बदलावों में आने वाली चुनौतियों का हवाला दिया था। इसे ध्यान में रखते हुए, केंद्रीय बैंक ने अब इसे 1 जुलाई 2026 से प्रभावी करने का निर्णय लिया है।

इसके अतिरिक्त, आरबीआई ने Acquisition Finance के मामले में कॉर्पोरेट गारंटी को अनिवार्य कर दिया है। यदि कोई कंपनी किसी दूसरी कंपनी को खरीदने के लिए कर्ज लेती है, तो उसकी पैरेंट कंपनी को गारंटी देनी होगी, जिससे बैंकों की सुरक्षा बढ़ेगी।

शेयर बाजार और निवेशकों पर प्रभाव


विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से अल्पावधि में बाजार में नकदी पर थोड़ा असर पड़ सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह वित्तीय प्रणाली के लिए अच्छा है।

सट्टेबाजी पर लगाम: उधार के पैसे से शेयर बाजार में भारी जोखिम लेने वाले निवेशकों पर नियंत्रण लगेगा।

बैंकों की सुरक्षा: बाजार में अचानक गिरावट आने पर बैंकों का 'डिफ़ॉल्ट' होने का खतरा कम हो जाएगा, क्योंकि उनके पास अब कर्ज की एक निश्चित सीमा होगी।

पारदर्शिता: सिस्टम-वाइड कैप से यह पता लगाना आसान होगा कि बैंकिंग प्रणाली का कितना पैसा शेयर बाजार में लगा हुआ है।

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